Bee Corridor in Highways: भारत में विकास की कहानी अक्सर सड़कों की लंबाई और गति से मापी जाती है। एक्सप्रेस-वे, चौड़ी होती राष्ट्रीय राजमार्गों की पट्टियां और तेज रफ्तार यातायात- ये सब मिलकर आधुनिक भारत के बुनियादी ढांचे की पहचान बन चुके हैं। हजारों किलोमीटर लंबे राजमार्गों ने व्यापार, पर्यटन और क्षेत्रीय संपर्क को नई गति दी है, लेकिन इसके साथ ही प्राकृतिक आवासों की क्षति, पेड़ों की कटाई और जैव-विविधता पर दबाव भी बढ़ा है।
परागणकर्ता, विशेषकर मधुमक्खियां इस बदलाव से सबसे अधिक प्रभावित जीवों में शामिल हैं। वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर मधुमक्खियों की संख्या लगातार घटती रही, तो खाद्य सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है, क्योंकि बड़ी संख्या में दुनिया की फसलें परागण पर निर्भर हैं। वैश्विक खाद्य उत्पादन का लगभग (एक-तिहाई) हिस्सा सीधे तौर पर मधुमक्खियों और अन्य परागणकों पर निर्भर करता है। एक अध्ययन के अनुसार, परागण करने वाले कीटों की आबादी में काफी गिरावट आई है।
इस बात की गंभीरता को देखते हुए देश के राजमार्ग अब केवल तेज रफ्तार यातायात की रेखाओं के समांतर धीरे-धीरे जैव विविधता के जीवित गलियारों में बदलने की दिशा में बढ़ रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे ‘मधुमक्खी गलियारे’ (बी-कारिडोर) विकसित करने की पहल जैव विविधता के संरक्षण की सोच का संकेत है। इस महत्त्वाकांक्षी योजना के तहत 2026-27 तक लगभग चालीस लाख पेड़ और फूलदार पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है।
इसका उद्देश्य केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं के लिए सुरक्षित आवास बनाकर पारिस्थितिकी संतुलन को मजबूत करना है। बी-कारिडोर का मतलब है राजमार्गों के किनारे पेड़ों और फूलों की ऐसी हरित पट्टी, जो मधुमक्खियों के लिए खाद्य और आवास मार्ग का काम करे। यह पहल नीतिगत सोच में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है, जहां बुनियादी ढांचा केवल उपयोगिता नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन का हिस्सा भी माना जा रहा है।
पहले जहां सड़क किनारे पौधरोपण का उद्देश्य मुख्य रूप से सजावटी या धूल नियंत्रण तक सीमित रहता था, वहीं अब ध्यान स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल प्रजातियों के चयन पर दिया जा रहा है। राजमार्गों के किनारे सतत् हरित पट्टियां कई पर्यावरणीय लाभ देती हैं। पेड़-पौधे तापमान को नियंत्रित करते हैं, धूल और प्रदूषण को कम करते हैं तथा मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर हरित पट्टियां सड़क किनारे सूक्ष्म जलवायु को संतुलित करती हैं, जिससे आसपास के क्षेत्रों में तापमान का प्रभाव कम होता है।
दूसरी ओर, मधुमक्खी गलियारे का प्रभाव वास्तव में एक बहुस्तरीय परिवर्तन की संभावना को जन्म देता है, क्योंकि भारत में बड़ी संख्या में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग कृषि परिदृश्य से होकर गुजरते हैं। जब इन सड़कों के किनारे परागणकर्ता के अनुकूल पौधों और वृक्षों का रोपण किया जाता है, तो यह केवल हरियाली बढ़ाने का कार्य नहीं करता, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करता है, जो आसपास के खेतों से सीधे जुड़ जाता है।
सबसे पहला प्रभाव कृषि उत्पादकता पर दिखाई देता है। मधुमक्खियां और अन्य परागणकर्ता पौधों के प्रजनन की प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाते हैं, जिससे फसलों में दानों का भराव, फल का आकार, बीज की गुणवत्ता और कुल उपज बढ़ती है। सरसों, सूरजमुखी, सेब, आम, टमाटर, कद्दू वर्गीय सब्जियां और कई तिलहन फसलें ऐसी हैं, जिनकी उत्पादकता परागण की उपलब्धता से सीधे प्रभावित होती है। जब परागणकर्ता लगातार उपलब्ध रहते हैं, तो किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों को बढ़ाने की आवश्यकता कम पड़ती है और प्राकृतिक उत्पादकता चक्र मजबूत होता है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू गुणवत्ता का है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि पर्याप्त परागण होने पर फलों का आकार अधिक समान होता है, उनका पोषण मूल्य बेहतर होता है और बाजार में उनकी कीमत भी अधिक मिलती है। इस तरह मधुमक्खी गलियारा अप्रत्यक्ष रूप से किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकता है। तीसरा आयाम ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। अगर इस पहल को योजनाबद्ध तरीके से मधुमक्खी-पालन से जोड़ा जाए, तो यह दोहरी आय का ढांचा बन सकता है।
राजमार्ग के किनारे विकसित पुष्प संसाधन मधुमक्खियों के लिए निरंतर भोजन उपलब्ध कराते हैं, जिससे शहद उत्पादन बढ़ सकता है। स्थानीय किसान या स्वयं सहायता समूह शहद, मधुमोम और अन्य मधुमक्खी उत्पादों के माध्यम से अतिरिक्त आमदनी अर्जित कर सकते हैं। इसके अलावा, यह पहल पारिस्थितिकी की स्थिरता को भी मजबूत करती है। परागणकर्ताओं की संख्या बढ़ने से जैव विविधता में वृद्धि होती है, क्योंकि इनके साथ-साथ पक्षी, तितलियां और अन्य कीट भी आकर्षित होते हैं। इससे खेतों और आसपास के परिदृश्य में प्राकृतिक संतुलन बेहतर होता है और कीट प्रबंधन में भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलता है।
व्यापक सामाजिक-आर्थिक महत्त्व के लिहाज से देखें तो मधुमक्खी गलियारा पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ कृषि, ग्रामीण रोजगार और जैव विविधता- इन चारों को जोड़ने वाला एक समेकित ढांचा बन सकता है, जो भविष्य की हरित अवसंरचना की दिशा भी तय करता है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं को निरंतर भोजन और आश्रय उपलब्ध कराना है। इसके लिए राजमार्गों के किनारे ऐसी वनस्पति लगाई जाएगी जिसमें साल भर फूल आते रहें।
इस योजना में नीम, पलाश, जामुन और अन्य स्थानीय फूलदार पौधों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसमें फूलदार पौधों को लगभग पांच सौ मीटर से एक किलोमीटर की दूरी पर लगाया जाएगा, ताकि मधुमक्खियों की उड़ान दूरी के भीतर लगातार भोजन स्रोत उपलब्ध रहे। हालांकि, मधुमक्खी गलियारे की सफलता केवल पौधे लगाने से तय नहीं होगी। इसकी असली चुनौती दीर्घकालिक रखरखाव में है। सड़क किनारे पौधों की नियमित देखभाल, सिंचाई, चराई से संरक्षण और कीटनाशकों के सीमित उपयोग जैसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करनी होंगी।
इसके अलावा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्त्वपूर्ण है। अगर ग्रामीणों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय प्रशासन को इस पहल से जोड़ा जाए, तो इसकी स्थिरता और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। यह पहल दरअसल एक महत्त्वपूर्ण विचार की ओर संकेत करती है। ऐसा विकास प्रारूप, जिसमें प्रकृति और बुनियादी ढांचा, आपस में विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी हों। तेज रफ्तार वाहनों के बीच अगर सड़क किनारे फूलों पर मंडराती मधुमक्खियां दिखाई दें, तो वह दृश्य केवल सुंदर नहीं होगा। वह इस बात का संकेत होगा कि विकास की दिशा में हम एक अधिक संतुलित और टिकाऊ रास्ता चुन रहे हैं।
आने वाले वर्षों में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि मधुमक्खी गलियारे की पहल कितनी व्यापक रूप से लागू होती है और इसके परिणाम कितने सकारात्मक और प्रभावी होते हैं। अगर इसे वैज्ञानिक योजना, स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी के साथ लागू किया जाए, तो यह भारत में हरित बुनियादी ढांचे का एक उदाहरण बन सकता है। इस पहल का असली मूल्य पर्यावरणीय आंकड़ों से आगे उस दृष्टि में है, जिसमें सड़कें केवल शहरों और बाजारों को नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्रों को भी जोड़ती हैं। राजमार्गों की गूंज के बीच मधुमक्खियों की भनभनाहट इस ओर इंगित करती है कि प्रगति का सबसे टिकाऊ रास्ता वही है, जिसमें जीवन के सभी रूपों के लिए जगह हो।
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