जिस झूठ पर बहुमत यकीन करने लगे वह उस समाज का पाखण्ड बन जाता है। ऐसे पाखण्ड उस समाज को प्रभुत्वशाली वर्ग को नहीं दिखते मगर दूसरों को आँख में पड़े कंकड़ की तरह चुभते हैं। कुछ ऐसा ही हाल बांग्लादेश के ताजा आम चुनाव का है। 12 फरवरी को मतदान हुआ। 13 फरवरी को चुनाव परिणाम आया। 17 फरवरी को 17 सालों से ब्रिटेन में निर्वासित जीवन जी रहे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) नेता तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बन गये।
बीएनपी और तारिक रहमान की प्रचण्ड जीत की दुंदुभी के शोर में यह सत्य दब सा गया है कि देश में महज 18 महीने पहले 2024 में भी आम चुनाव हुए थे। उस चुनाव में शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को प्रचण्ड बहुमत मिला था। बीएनपी ने धांधली का आरोप लगाते हुए उस चुनाव का बहिष्कार किया था।
अब जब बीएनपी को दो-तिहाई बहुमत मिला है तो अवामी लीग को धांधली का आरोप लगाने का भी अवसर नहीं मिला। शेख हसीना की अवामी लीग पर मोहम्मद यूनुस की कार्यवाहक सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। लोकतंत्र के इतिहास में शायद यह पहला अवसर होगा जब पिछले चार आम चुनाव जीतने वाल पार्टी पर प्रतिबंध लगाकर चुनाव कराए गये हों और उसे फ्री एंड फेयर भी बताया गया हो।
शेख हसीना की अवामी लीग सरकार को छात्रों, युवाओं और जमाते इस्लामी से जुड़े संगठनों के उग्र विरोध प्रदर्शन के बाद सत्ता छोड़नी पड़ी थी। प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत में राजनीतिक शरण ली। शेख हसीना सरकार के तख्तापलट में विदेशी ताकतों का भी हाथ बताया गया। मगर ज्यादा अहम बात ये है कि जिन ताकतों ने शेख हसीना का तख्तापलट आन्दोलन का नेतृत्व किया था, वे बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह गये।
बांग्लादेश में कुल 300 सीटों के लिए चुनाव होने थे। एक सीट पर उम्मीदवार के निधन के बाद चुनाव टल गये। 299 सीटों के नतीजे आ चुके हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) गठबन्धन को 211 सीटों पर जीत मिली है। जमाते-इस्लामी को 68 सीटों पर जीत मिली।
शेख हसीना सरकार का तख्तापलट करने में सबसे आगे रहे छात्रों-युवाओं द्वारा बनाए गये दल नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) को महज छह सीटों पर जीत मिली। वह भी तब जब एनसीपी और जमाते इस्लामी मिलकर चुनाव लड़ रहे थे। छात्र-युवा आन्दोलन के नेताओं द्वारा बनायी पार्टी से ज्यादा संख्या में सात निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीते हैं। चुनाव परिणाम से साफ है कि जिन लोगों ने सड़क पर उतरकर सत्ता पलट किया उनके पास देश में बहुमत नहीं था।
जब शेख हसीना का तख्तापलट हुआ तो तारिक रहमान की माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया जेल में सजा काट रही थीं। कार्यवाहक यूनुस सरकार ने उन्हें रिहा किया। चुनाव से पहले उनका बीमारी से निधन हो गया। खालिदा जिया के बाद उनके पुत्र तारिक रहमान पार्टी के सबसे बड़े नेता थे। दिसम्बर में तारिक ब्रिटेन से वापस आए और फरवरी में जनता ने उन्हें देश का नया प्रधानमंत्री चुन लिया। यानी शेख हसीना का तख्तापलट करने वाले अग्रणी नेताओं में कोई ऐसा नहीं था जिसे पूरे देश की अवाम नये रहनुमा की तरह देखती हो।
अवामी लीग पर प्रतिबंध सामान्य मामला नहीं है। बांग्लादेश का इतिहास अवामी लीग के बिना अधूरा है। अवामी लीग के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान ने बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम का नेतृत्व किया था। जमाते इस्लामी ने बांग्लादेशियों के दमन में पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था। देश को स्वतंत्रता दिलाने वाली पार्टी पर प्रतिबंध और आक्रांताओं का समर्थन देने वालों को मुख्य विपक्षी दल बन जाना लोकतंत्र की जीत नहीं बल्कि आँखों में धूल झोंकना है।
अवामी लीग और बीएनपी दोनों ही अतीत में चुनाव का बहिष्कार करते रहे हैं। मगर ये बहिष्कार स्वैच्छिक थे। जबरन प्रतिबंध लगाने से इनकी तुलना नहीं की जा सकती। शेख हसीना सरकार के खिलाफ उग्र प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले एनसीपी और जमाते इस्लामी को चुनाव में बहुमत न मिलना क्या कहता है? क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि देश की जनता ने उन दलों को नकार दिया है जिन्होंने हसीना का तख्तापलट किया था!
शेख हसीना का तख्तापलट करने वालों ताकतों के खिलाफ जनता के पास एक ही विकल्प था, बीएनपी। 51 प्रतिशत वोट उसी दल को मिले। मेरी नजर में इस जनादेश का संदेश साफ है कि शेख हसीना के देश वापसी के बिना बांग्लादेश में सही मायनों में लोकतंत्र की बहाली सम्भव नहीं हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद तारिक रहमान को शेख हसीना को क्षमादान देना चाहिए और अगले चुनाव में अवामी लीग को स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का अवसर देना चाहिए। तभी बांग्लादेश में सही मायनो में लोकतंत्र बहाल हो पाएगा। जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक इसे लोकतंत्र का छलावा ही माना जाएगा।
