‘जब समझौता करना था, तो हमला क्यों?’ लीजिए, अमेरिका-ईरान ‘युद्धविराम’ गया तेल लेने। होर्मुज फिर जाम। तेल के चढ़े दाम और दुनिया के बाजार धड़ाम। इस बीच अंकल सैम ‘विश्वकप’ भी खेल आए। रेफरी ने दिखाया एक अमेरिकी खिलाड़ी को ‘लाल कार्ड’, तो अंकल जी ने अपने रुतबे से उसे वापस करा दिया! अब करते रहो हाय-हाय!
अयोध्या का ‘चढ़ावा चोरी कांड’ पीछा नहीं छोड़ रहा और अब तो चैनलों में कोरस-सा उठता दिखता है कि बड़ी मछलियां कब अंदर जाएंगी? गजब का ‘चढ़ावा चोरी कांड’ है, जिसे हुए इतने दिन हो गए, लेकिन अब तक नहीं मालूम कि कुल कितने की चोरी हुई है, क्योंकि किसी के पास रिकॉर्ड नहीं कि हर रोज कितना चढ़ावा आता था। कोई कहता है कि दो हजार करोड़ की चोरी हुई, कोई कहता है चार हजार करोड़ की चोरी हुई, कोई छह हजार करोड़ बताता है।
बचाव पक्ष के एक बाबा कहिन- निचले कर्मचारियों ने चोरी की। आठ पकड़े गए, बाकी की खोज विशेष जांच दल कर रहा है। चाहे कोई हो, किसी को बख्शा नहीं जाएगा। जल्द ही ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ होगा। मगर जब दूध के नाम पर पानी ही पानी हो, तो दूध कैसे अलग होगा? इसे देख हमें तो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की यह कविता याद आती है- ‘पहले दाल में कुछ काला था, अब काले में दाल है/ सारी दुनिया जीम रही है, हमको यही मलाल है!’
किस शीर्ष ‘ट्रस्टी’ की नाक के नीचे ये सब हुआ? वह क्या कर रहा था? उसे भी क्यों न अपराध का हिस्सेदार माना जाए? उस पर अब तक प्राथमिकी क्यों नहीं? उसे क्यों नहीं गिरफ्तार किया जा रहा? कौन बचा रहा है उसे? हजार सवाल और संतोषजनक उत्तर एक नहीं!
एक बचाव पक्ष के बाबा- सब जानते हैं वे पहुंचे हुए भक्त हैं। जीवन खपा दिया है मंदिर के लिए… वे ऐसा अनर्थ नहीं कर सकते..! आप किसी की गारंटी कैसे ले सकते हैं? ये कैसा तर्क हुआ? जिसकी देखरेख में सब हुआ, उसे निर्दोष कैसे माना जाए? पक्ष के भक्त- जो राम का अस्तित्व तक नहीं मानते थे, आज राम का नाम ले रहे हैं… वही जांच की मांग कर रहे हैं..!
भक्ति की कसौटी कौन तय करेगा?
विपक्षी भक्त- हम भी राम भक्त हैं। हमें हक है कि हम जांच की मांग करें और मंदिर का नाम बदनाम करने वालों को सजा दिलाएं। पक्ष के भक्त- ये तो ‘कल के भक्त’ हैं… असली भक्त वे थे, जिन्होंने राम मंदिर के लिए पांच सौ साल लंबा संघर्ष चलाया और कुर्बानियां दीं..! एक और भक्त- एक होता है जानबूझकर किया अपराध, एक होता है अनजाने में हुआ अपराध। फिर उन्हीं ने तो पहले खबर दी कि चोरी हुई है..!
विपक्षी भक्त- लेकिन बिना जांच के कैसे तय कर सकते हैं कि किसी के ‘अनजाने’ सब हुआ..! उन्होंने ‘एसआईटी’ बिठाई, ‘एफआईआर’ क्यों नहीं की?
विपक्ष के सतत हमलों के आगे कई एंकर, जो अक्सर ‘भक्तों’ का पक्ष लेते रहे हैं, अब खुद पूछने लगे हैं कि बड़ी मछली को क्यों बचाया जा रहा है? उन पर प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की जा रही? उन्हें अंदर क्यों नहीं किया जा रहा? सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान क्यों नहीं ले रहा? एक भक्त ने कहा- भई ट्रस्ट स्वायत्त संस्था है, उसके नियम ही ऐसे हैं..!
विपक्ष के एक नेता- नहीं, सरकार चाहे तो ट्रस्ट के नियम बदल सकती है। किसी भी ट्रस्ट को अपने मातहत कर सकती है। सरकार क्यों नहीं मंदिरों का प्रबंध अपने हाथ में ले लेती है? ‘चौर्यकला’ का यह ‘सौंदर्यशास्त्र’ है प्यारे कि चोरी होगी और चोर को चोर ही पकड़ेगा… क्योंकि ‘चोर मचाए शोर’। अयोध्या का ‘चौर्य कांड’ खत्म नहीं हुआ था कि ‘बद्रीनाथ’ से खबर आने लगी कि उधर भी एक ‘चौर्य कांड’ हुआ है और उत्तराखंड की सरकार ने तीन अधिकारियों की एक समिति जांच के लिए बिठा दी है।
चुनावी मौसम से पहले बदला मिजाज: कहीं खौफ, कहीं दबाव तो कहीं नई रणनीति | राजपाट
फिर आया फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर नया विवाद। फिल्म ‘सतलुज’ सेंसर की सनद के बाद दो दिन तक ओटीटी पर दर्शकों को उपलब्ध रही, फिर अचानक सरकार ने हटवा दिया और विवाद शुरू।
सत्ता पक्ष कहिन कि ऐसी फिल्म से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है… यह आतंकवादी हिंसा का ‘महिमामंडन’ करती है… पंजाब की समस्या को दिखाना है तो आतंकवाद का सारा इतिहास दिखाओ। यह पंजाब के इतिहास को बेहद ‘चयनात्मक’ तरीके से दिखाती है..!
फिल्म के पक्ष में कई कहिन कि ये सिख धर्म में हस्तक्षेप की तरह है… कि फिल्म में सच्चाई दिखाई गई है… कि मैं जानता था कि ऐसा होगा, लेकिन ये रुकने वाली नहीं… कि आज की तकनीकी दुनिया में पाबंदी लगाने से कुछ नहीं होता। फिल्म और ज्यादा देखी जाती है।
इसी बीच प्रधानमंत्री इंडोनेशिया के सर्वोच्च सम्मान से ‘सम्मानित’ हुए, उधर उनके ‘स्पर्धी’ जलने लगे! मगर ‘मेटा’ की शैतानियों को कोई क्या कहे कि उसके ‘इंस्टाग्राम’ ने सरकार द्वारा ‘हटाने’ की कहने पर भी बारह वर्ष की एक लड़की की ‘प्रताड़ना’ की तस्वीर नहीं हटाई। इसे देख एक एंकर ने तो लाइन ही दे दी कि ‘क्रैश मेटा’, यानी ‘मेटा’ को ध्वस्त करो। लेकिन ‘मेटा’ वाला फिर भी कहता रहा, ‘हम जिम्मेदार मंच हैं’!
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दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को मिली जानकारी के अनुसार, एक सरकारी पैनल ने फिल्म की समीक्षा के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सिफारिश की है कि इसे भारत में जनता के लिए ब्लॉक रखा जाए। 3 जुलाई को रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटा दी गई थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
