कानून की भाषा और आम नागरिक के बीच की दूरी कम करने में कृत्रिम मेधा नई संभावनाएं खोल रही है। समाज में कानून को लेकर जो धारणा वर्षों से बनी हुई है, वह किसी को भी असहज कर देने वाली है। अदालतों की लंबी तारीखों और मोटी फाइलों से आम आदमी विचलित होता है। लोग अक्सर कहते भी हैं कि कानून के फेर में न पड़ो, वरना जिंदगी कोर्ट-कचहरी में निकल जाएगी। जब कोई नोटिस या कानूनी कागज घर पहुंचता है, तो सबके चेहरे पर तनाव की रेखाएं खिंच जाती हैं।

देश में न्याय और नागरिक के बीच सबसे ऊंची दीवार यदि कोई है, तो वह है कानून की जटिल भाषा। अदालतों में दायर याचिकाओं से लेकर बैंक-कर्ज के दस्तावेजों, करायेदार से संबंधित समझौतों और बीमा-पॉलिसी की शर्तों तक हर जगह ऐसी भाषा दिखाई देती है, जिसे पढ़ने मात्र से आम आदमी भ्रम में पड़ जाता है।

न्याय व्यवस्था तकनीक और डिजिटलीकरण के साथ बदल रही है, लेकिन भाषा की जटिलता आज तक कम नहीं हुई है। कानून जनता के लिए बना है, लेकिन उसकी भाषा जनता से कोसों दूर है। ऐसे में कृत्रिम मेधा यानी एआई एक नए युग की शुरुआत कर रही है, जहां कानूनी शब्दावली और आम नागरिक के बीच की दूरी कम हो सकती है।

कानूनी भाषा के कठिन होने का एक बड़ा कारण उसकी सटीकता है। विधि-निर्माता इस बात की कोशिश करते हैं कि शब्दों का ऐसा इस्तेमाल हो, जिससे किसी अर्थ-भ्रम की संभावना न बचे। इसलिए लंबे वाक्य, जटिल उपवाक्य, विशिष्ट परिभाषाएं और बहुस्तरीय शर्तें दस्तावेजों का हिस्सा बनती हैं। मगर यही सटीकता आम आदमी को कानून की समझ से दूर कर देती है। वह समझना तो चाहता है, लेकिन शब्दों की दीवार उसे पीछे धकेल देती है।

कई नागरिक कभी-कभी अपने हस्ताक्षर किए हुए दस्तावेज भी पूरी तरह नहीं पढ़ते, क्योंकि वे यह मान लेते हैं कि वे इसे समझ ही नहीं पाएंगे। मौजूदा दौर में एआई अब वकीलों और उनके मुवक्किल के बीच एक सेतु बन रही है। आज ऐसी तकनीक विकसित हो रही है, जो जटिल कानूनी दस्तावेजों को सरल भाषा में बदल सकती है। यह अनुवाद मात्र शब्दों का नहीं, अभिप्राय का होता है।

इस तरह के परिवर्तन से न सिर्फ जानकारी साफ होती है, बल्कि भय-भाव कम होता है, जो वर्षों से कानून के साथ जुड़ा रहा है। ऐसी ही स्थिति किरायेदारी-समझौते, बीमा-दावे, बैंक-कर्ज और सरकारी नोटिस में भी दिखाई देती है। जब किसी समझौते में लिखा होता है कि ‘किराएदार को संपत्ति को पूर्ववत स्थिति में लौटाना अनिवार्य होगा’, तो बहुत-से लोग इसका वास्तविक अर्थ नहीं समझते।

यही वाक्य जब सीधे शब्दों में बदल कर आता है कि ‘जगह जैसे मिली थी वैसे ही वापस करनी है’, तो उसकी स्पष्टता ही उसका अधिकार बनती है। इस अंतर की वजह से तकनीक की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि जानकारी तभी शक्ति बनती है, जब उसे समझा जा सके। कृत्रिम मेधा के माध्यम से कानूनी दस्तावेजों की व्याख्या, सार, सरल-भाषा और प्रश्न-उत्तर आधारित स्पष्टीकरण संभव होने लगे हैं। कई एआई आधारित मंच यह सुविधा दे रहे हैं कि नागरिक किसी दस्तावेज का अर्थ पूछे और वह आसान भाषा में मिल जाए।

नागरिक यदि पूछे ‘क्या इस क्लॉज में मेरे लिए कोई जोखिम है?’ तो एआई उत्तर दे सकती है- यदि आप नियम तोड़ते हैं, तो कंपनी आप पर जुर्माना लगा सकती है। यह परिवर्तन न केवल सुविधा है, बल्कि न्याय को जनता तक ले जाने का माध्यम है। डिजिटल युग ने प्रक्रियाओं को सरल किया है, भाषा को नहीं। अब ई-फाइलिंग से बहस तक ऑनलाइन हो रही है। दस्तावेज डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध हैं, लेकिन भाषा वही पहेली बनी हुई है। ऐसी स्थिति में एआई की भूमिका तकनीकी प्रगति के साथ न्यायिक लोकतंत्र की आवश्यकता भी है।

दुनिया के कई देशों में कानून की भाषा को सरल और नागरिक-अनुकूल बनाने के लिए एआई का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका में न्यायालयों और विधि-फर्मों में एआई आधारित उपकरण का इस्तेमाल न सिर्फ कानूनी दस्तावेजों का विश्लेषण करने के लिए, बल्कि उन्हें साधारण भाषा में रूपांतरित करने के लिए भी किया जा रहा है।

ब्रिटेन में सरकार ने इस अभियान को एआई-सहयोग से और मजबूत किया है, ताकि नागरिकों को अदालतों और प्रशासनिक आदेशों की भाषा आसान रूप में मिल सके। कनाडा में भी न्याय-अभिगम कार्यक्रम के तहत एआई व्यवस्था अदालतों से जुड़े दस्तावेजों को आम नागरिक की भाषा में समझा कर उपलब्ध कराती है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में स्थानीय न्यायालयों ने उन क्षेत्रों के लोगों के लिए एआई-आधारित अनुवाद और सरलीकरण प्रणाली शुरू की है, जहां अंग्रेजी मातृभाषा नहीं है।

इन देशों के अनुभव बताते हैं कि भाषा-सरलीकरण के बाद न्यायिक प्रक्रियाओं में आम जनता की भागीदारी बढ़ी है और विवादों की संख्या में कमी आई है। यूरोप के कई देशों में भी न्याय-व्यवस्था में इसे शामिल किया जा रहा है और विशेष रूप से फ्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देशों में कानून की जटिल शब्दावली को नागरिक-अनुकूल रूप में बदलने की दिशा में संगठित पहल दिखाई देती है।

फ्रांस में न्याय मंत्रालय एआई-सहायता से अदालतों के आदेशों का सहज भाषा में सार उपलब्ध करा रहा है। जर्मनी में ‘लीगल टेक’ जैसे नवउद्यम किरायेदारी विवाद, बीमा दावे और कर संबंधी दस्तावेजों को आम आदमी की भाषा में समझाने में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। एस्टोनिया ने तो कृत्रिम मेधा-आधारित ‘डिजिटल जज’ शुरू किया है, जो छोटे मामलों में तकनीक-सहायता से निर्णय प्रक्रिया को सरल करता है।

भारत में भी कानून की भाषा को सरल बनाने और तकनीकी माध्यम से आम नागरिक तक पहुंचाने की दिशा में उल्लेखनीय काम हो रहा है। एक अनुवाद मंच ने बाईस भारतीय भाषाओं में चालीस हजार से अधिक कानूनी दस्तावेजों का अनुवाद किया है, जिससे अंग्रेजी-भाषी कानूनी दस्तावेजों का लाभ हिंदी-भाषी और अन्य भाषाई समूहों तक पहुंचने लगा है। इसके साथ ही, कई ‘लीगल-टेक’ कृत्रिम मेधा का उपयोग कर कानूनी शोध, दस्तावेज विश्लेषण और समझ-सार तैयार करने में लगे हैं। इसके नतीजे सामने आ रहे हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इस दिशा में संस्थाएं, न्यायालय, विश्वविद्यालय और प्रशासन मिलकर काम करें। जैसे हम शिक्षा में डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराते हैं, वैसे ही कानून की भाषा को सरल बनाने का भी सार्वजनिक तंत्र विकसित होना चाहिए। कानून तभी लोगों का साथी बन सकता है, जब उसकी भाषा लोगों की भाषा हो।

आज भी अनेक नागरिक अपने अधिकारों से इसलिए दूर रह जाते हैं, क्योंकि कानूनी शब्दावली उन्हें जटिल लगती है। जब तकनीक, विशेष रूप से कृत्रिम मेधा, इस भाषा को सरल, स्पष्ट और समझने योग्य बनाने का कार्य करेगी, तब न्याय केवल अदालतों तक सीमित अवधारणा नहीं रहेगा, बल्कि आम नागरिकों के जीवन का हिस्सा बन जाएगा।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को आठ दिनों तक गैर-कानूनी रूप से पुलिस कस्टडी में रखने के मामले को गंभीरता से लिया है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह उसे 6 हफ़्ते के अंदर दो लाख रुपये का मुआवज़ा दे। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि राज्य सरकार यह रकम प्रयागराज के बारा इलाके के असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (ACP) से वसूलेगी, लेकिन इसके लिए पहले उनके ख़िलाफ़ तीन महीने के अंदर अनुशासनात्मक जांच करनी होगी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक