अंतरिक्ष हमेशा से इंसान के लिए जिज्ञासा का केंद्र रहा है। इसके रहस्यों का पता लगाने के लिए अब तक तमाम प्रयास हुए हैं, लेकिन तकनीकी उन्नति के बावजूद आज भी इसकी राह बेहद कठिन है। अगर ऐसा न होता, तो वर्ष 1969 में चांद पर मानव भेजने के बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा को अपना अगला चंद्र मिशन भेजने में साढ़े पांच दशक का वक्त नहीं लगता। अभी भी जिस आर्टेमिस-2 नामक चंद्र अभियान के तहत चार अंतरिक्ष यात्री गए थे, वे चंद्रमा पर उतरने के बजाय उसकी परिक्रमा ही कर पाए हैं। मगर इसे भी एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है, क्योंकि इससे आर्टेमिस के अगले चरणों में वर्ष 2030 तक चंद्रमा पर इंसान को फिर से उतारने की नासा की योजनाओं को पंख लग सकते हैं। मगर क्या चांद पर इंसान को एक बार फिर भेजना जरूरी है? उस चांद पर, जिसके करीब नब्बे फीसदी हिस्से को दूरबीनों, अंतरिक्षयानों और भारत-अमेरिका समेत कुछ देशों के चंद्र अभियानों के जरिए खंगाला जा चुका है।

नासा की ओर से हाल में भेजे गए चंद्र मिशन आर्टेमिस-2 की बात की जाए, तो यह इस बात की मुनादी था कि चंद्रमा हमारा इंतजार कर रहा है। मगर यह एक चुनौती है ब्रह्मांड को समझने की, उसके उपहारों का जिम्मेदारी से उपयोग करने की और यह सुनिश्चित करने की कि हमारी भावी पीढ़ियां चंद्रमा और उसके परे सुदूर अंतरिक्ष को न सिर्फ लालसा से देखें, बल्कि यह दृष्टिकोण रखे कि वह हमारे सतत उत्थान की प्रेरणा बने और विकास की नई राहें खोले। वर्ष 1969 में नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन ने पहली बार सभ्यता की लंबी छलांग चंद्रमा की सतह पर लगाई थी, तो आखिरी बार दिसंबर 1972 में यूजीन सेर्नन और हैरिसन श्मिट ने चांद पर अपने जूतों के निशान छोड़े थे। उसके बाद दशकों तक सन्नाटा कायम रहा। कई देशों की ‘रोबोटिक खोज’ ने सपने को जिंदा रखा, लेकिन चंद्रमा पर इंसानी उपस्थिति गायब हो गई।

11 अप्रैल 2026 को इस सन्नाटे के टूटने की आहट सुनाई दी है। आर्टेमिस-2 से चार अंतरिक्ष यात्री चांद की परिक्रमा के नौ दिनों के साहसिक सफर के बाद सुरक्षित पृथ्वी पर लौट आए। इस दौरान उन्होंने इंसानों द्वारा चांद के इर्द-गिर्द तय की गई अब तक की सबसे बड़ी दूरी 2,52,756 मील (लगभग 4,06,771 किलोमीटर) का सफर किया। उन्होंने चांद की परिक्रमा की, उसके दूर वाले हिस्से के पीछे पहुंचे, नियोजित 40 मिनट की संवादहीनता का सामना किया, अंतरिक्ष से पूर्ण सूर्यग्रहण देखा और ऐसे आंकड़े लेकर लौटे, जिनसे चांद की प्रकृति को गहराई से समझने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों की मंशा चांद पर मानव बस्ती बसाने और इसे बेस (आधार) बनाकर मंगल ग्रह तक पहुंचने की है। सवाल यह भी है कि आखिर जब मशीनें इतना कुछ कर सकती हैं, तो इंसानों को चंद्रमा या मंगल तक भेजने की जरूरत ही क्या है? जवाब अपोलो कार्यक्रम की ऐतिहासिक उपलब्धियों और बाद में भारत-चीन के चंद्र अभियानों में मिलता है।

इस पूरे संदर्भ में आर्टेमिस-2 की उपलब्धि के पैमाने को समझने के लिए अपोलो के बाद के लंबे अंतराल को याद करना जरूरी है। वर्ष 1969 से 1972 के बीच नासा ने छह सफल मानवयुक्त चंद्र अभियान (अपोलो-11, 12, 14-17) भेजे, जिनमें 12 अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री चांद की सतह पर उतरे। यह कार्यक्रम शीतयुद्ध की प्रतिद्वंद्विता से जन्मा था, लेकिन इसमें सच्ची वैज्ञानिक समृद्धि निहित थी। इनसे चंद्रमा की भूगर्भीय सक्रियता के प्रमाण मिले, वहां की मिट्टी के नमूने हासिल किए गए, जो इसकी उम्र और संरचना बताते थे, और पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में स्थित किसी अन्य पिंड की पहली करीबी तस्वीरें मिलीं। हालांकि, इसके बाद वियतनाम संकट, कमजोर आर्थिक स्थिति और बदलती राष्ट्रीय प्राथमिकताओं ने वर्ष 1960 के दशक के अपोलो कार्यक्रम को प्राथमिकताओं की सूची से हटा दिया। वैज्ञानिक समुदाय ने भी मान लिया कि चंद्रमा की सतह सूखी एवं निर्जीव है, और अब सिर्फ रोबोटिक अभियानों की ही जरूरत है। मगर इक्कीसवीं सदी के आगमन के साथ ये धारणाएं टूटने लगीं।

वर्ष 2008 में भेजे गए भारत के चंद्रयान-1 आर्बिटर ने रेगोलिथ (चंद्रमा की मिट्टी) में पानी के अणुओं का पता लगाया और दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ के सबूत दिए। चंद्रयान-3 ने अगस्त 2023 में दक्षिणी ध्रुव के पास ऐतिहासिक ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ कर विश्व कीर्तिमान बनाया और स्थायी रूप से छायादार गड्ढों में बर्फ की पुष्टि की। चीन के ‘चांग ई’ कार्यक्रम ने भी इसी तरह की उपलब्धियां हासिल कीं। जैसे- चांग ई-4 के तहत वर्ष 2019 में चांद के दूर वाले हिस्से पर यान उतरा और चांग ई-6 ने जून 2024 में दूर वाले हिस्से से नमूने लाकर इतिहास रचा। बीजिंग ने 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतारने और 2040 तक इसके दक्षिणी ध्रुव पर अध्ययन केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इस बीच, रूस के चंद्र कार्यक्रम लूना-25 का वर्ष 2023 में दुर्घटनाग्रस्त होना अंतरिक्ष अभियानों की जटिलता को दर्शाता है। इसके अलावा, इजराइल का ‘बेरेशीट’ और जापान का ‘स्लिम’ भी चांद पर उतरने की कोशिश कर चुके हैं।

इन रोबोटिक सफलताओं ने चंद्रमा पर मानव को फिर से भेजने के सपने को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत किया है। इनसे साबित हुआ कि चंद्रमा के संसाधन वास्तविक और रणनीतिक रूप से मूल्यवान हैं। साथ ही उन्होंने दूरस्थ अन्वेषण की सीमाएं भी उजागर कीं। मगर कोई रोबोट अभी तक प्रशिक्षित भूवैज्ञानिक की क्षेत्रीय अंतरदृष्टि या रचनात्मक समस्या-समाधान से मेल नहीं खा सकता। जैसे- आर्टेमिस-2 के चालक दल ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के छायादार क्षेत्रों, विकिरण वातावरण और सतह रसायन विज्ञान से संबंधित आंकड़े जुटाए हैं, जो किसी रोबोटिक मिशन के जरिए संभव नहीं थे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि चंद्रमा के ध्रुवों पर करीब साठ करोड़ टन पानी की बर्फ मौजूद है। इसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करने से सांस लेने योग्य हवा, पीने का पानी और सबसे महत्वपूर्ण रॉकेट ईंधन मिलेगा। पृथ्वी से अंतरिक्ष यान को भेजने में गुरुत्वाकर्षण और वायुमंडल पार करने में ही बहुत ऊर्जा खर्च होती है, जबकि चंद्रमा पर दोबारा ईंधन भरने से इस लागत को कम किया जा सकता है। इससे चंद्रमा को मंगल तथा बाहरी सौरमंडल की यात्राओं के बेस स्टेशन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा।

हीलियम-3, जो पृथ्वी पर दुर्लभ है लेकिन चंद्र रेगोलिथ में प्रचुर मात्रा में मौजूद है, भविष्य में फ्यूजन रिएक्टर के लिए ईंधन बन सकता है। टाइटेनियम समेत अन्य दुर्लभ खनिज भी चंद्रमा पर भरपूर मात्रा में हैं, जिनका उपयोग आने वाले समय में संभव है। ये केवल कल्पनाएं नहीं, बल्कि चंद्र अभियानों से मिले ठोस आंकड़ों पर आधारित आकलन हैं। माना जाता है कि चंद्रमा पर मौजूद हीलियम-3 का एक चौथाई हिस्सा भी पृथ्वी पर लाया गया, तो सैकड़ों वर्षों की ऊर्जा जरूरतें पूरी हो सकती हैं। अंतरिक्ष के इन रहस्यों में मानव कल्याण की अपार संभावनाएं छिपी हैं, लेकिन यह सब तकनीकी प्रगति और निरंतर अन्वेषण पर निर्भर करता है।

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लगभग आधी सदी के लंबे अंतराल के बाद इंसान ने एक बार फिर चंद्रमा की दिशा में उड़ान भरी और इस बार सुरक्षित वापसी कर नई मिसाल कायम की। यह उपलब्धि केवल एक अंतरिक्ष मिशन तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह मानव जिज्ञासा, साहस और अत्याधुनिक तकनीक के अद्भुत संगम का प्रतीक बन गई। नासा (NASA) के आर्टेमिस II (Artemis II) मिशन के तहत चार अंतरिक्ष यात्री रीड वाइसमैन (Reid Wiseman), विक्टर ग्लोवर (Victor Glover), क्रिस्टीना कोच (Christina Koch) और जेरेमी हैनसन (Jeremy Hansen) एक ऐतिहासिक अभियान पर रवाना हुए। उन्होंने पृथ्वी से लगभग 4 लाख किलोमीटर से अधिक दूरी तय की और चंद्रमा के निकट पहुंचकर सफलतापूर्वक पृथ्वी पर लौट आए। इसे अब तक की सबसे लंबी मानव अंतरिक्ष यात्राओं में गिना जा रहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक