Art of Argument: मनुष्य हमेशा एक ही भाव में मुश्किल से ही दिखता है। वह कभी खुश कभी नाखुश है। कभी मुखर तो कभी मौन। कभी चुस्त-दुरुस्त तो कभी आलसी और सुस्त। कभी स्वस्थ तो कभी अस्वस्थ। कभी कंजूस तो कभी खर्चीला। यह इंद्रधनुषी रंग हर जगह देखने को मिल जाते हैं। इसे हर कोई स्वीकार भी कर लेता है।
एक कहावत भी है कि इंसान अपने वातावरण के जैसा ही बन जाता है। रोजाना महसूस हो रही जीवनशैली की उजली-धुंधली चित्रकारी आदमी के मन में बैठकर उसका व्यवहार बनने लगती है।
इसीलिए एक आदत आजकल के लोगों में बहुतायत से देखने को मिल रही है। वह है बात-बात पर बहस और नाहक वाद-विवाद। हर बात पर तकरार का संस्कार सब पर हावी होता जा रहा है।
अगर आभासी दुनिया की बात की जाए, तो वहां भी हालात इसी तरह के हैं। एक ने सोशल मीडिया पर अपनी वाल कुछ लिखा, तो दूसरे को अखर जाता है। तीसरा उस पर खुलेआम अपशब्द लिख देता है। चौथा तो पांच, छह, सात अपनी ही मानसिकता वालों को आवाज देकर बुलाता है। उसके बाद गरमागरम बहस और तानेबाजी चल पड़ती है।
जमीन के जगत में आप रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे हों, तो चार लोग बिना बात के ऊल-जलूल बोलने लगते हैं। आभासी दुनिया का ज्ञान उलीचने लगते हैं। चारों तरफ से बहस ही बहस हो रही होती है। सड़क पर, बस, मेले, जुलूस में या किसी सामाजिक समारोह में, हर जगह यह आम बात होती जा रही है।
वहीं ऐसे भी लोग हैं जो अपने घर में मौनी साधक बनकर चुप बैठे रहते हैं, लेकिन घर की चारदिवारी से बाहर निकलकर वे लोग भी अपने दिमाग का तरकश लेकर तैयार रहते हैं और फिर बातों के तीर चलाने से जरा भी बाज नहीं आते हैं। यानी हर जगह हर किसी को बहस करना तथा उलझना मजेदार लगने लगा है।
दरअसल, टीवी बहसों ने भी लोगों को झगड़ालू-सा बना दिया है। आजकल चैनलों की बाढ़ इस कदर आ गई है कि कोई व्यक्ति इनकी भाषा और बोली से अछूता नहीं रहा है। परिणाम यह है कि अब हर किसी को औरों से तीखी बात करने में अपने सामने वाले से नोकझोंक करने में ही बहुत रस आने लगा है। न जाने यह कौन-सा तनाव है, उलझन है, बेचैनी है कि लोग बात-बात पर बहस करने लगते हैं।
एक दिन तो एक चौराहे पर एक कूरियर वाला संबंधित पते पर गया। उसने पार्सल देते हुए बस इतना ही कहा कि ‘ओटीपी’ दीजिए। इस पर पार्सल लेने वाले ने कहा कि हां-हां, मुझे भी मालूम है… ज्यादा मत बोलो। और बस इसी बात पर देखते ही देखते दोनों की गरमागरम बहस शुरू हो गई और आखिर ओटीपी कूरियर वाले को नहीं मिला।
कूरियर वाला पार्सल वापस लेकर चला गया। इसी तरह, एक कस्बे की बारात में एक नकचढ़े बाराती की पसंद का गीत न बजाने पर इतनी बहस हुई कि गाली-गलौज से नाराज और रूठे हुए बैंडवाले वापस चलते बने। मुहूर्त चला जा रहा था, दूसरे बैंडवाले खाली नहीं थे, तो बाकी बारात ऐसे ही खामोश होकर गई। जरा-सी बात ने यह हालत कर दी। फिर बहस इस बात पर खड़ी हो गई कि यह भी क्या कोई बहस वाली बात थी!
देखा जाए तो बहस करना इतना बुरा नहीं है। कितनी ही बार चिकित्सक से समुचित बात करने के बाद कितने ही लोग अनावश्यक सर्जरी से खुद को बचा पाए हैं। वे चिकित्सीय रिकार्ड के साथ यह सार्वजनिक रूप से बताते भी हैं कि उस संवेदनशील पल में तकरार और झगड़ा न किया होता, तो आठ-दस लाख का आपरेशन हो जाता, जिसकी वास्तव में इतनी भी जरूरत नहीं थी।
घर-परिवार में कोई प्रतिभावान बालक या बालिका अगर बहस न करे, तो अपनी इच्छानुसार करिअर नहीं चुन सकता। रोजमर्रा की जिंदगी में भी देख सकते हैं कि मनमानी करने वाले दुकानदार से बराबर बहस करनी होती है, तब जाकर उचित मूल्य पर मनचाही वस्तु खरीदी जाती है। मगर साथ ही यह भी सच है कि बेकार और बेमतलब की बहस या तकरार का कोई हासिल नहीं होता।
बहस करने वाला अपनी ऊर्जा भी खर्च करता है और बेवकूफ भी साबित होता है। खासतौर पर अगर बहस खुद को बाकी लोगों से बढ़कर दिखाने की भूख न हो। बहस अगर सफाई अभियान के लिए, नशामुक्ति के लिए हो, निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए हो, अपने अवगुण खत्म करने के लिए हों, तब बहस का कोई मतलब समझ में भी आता है। हम बेमानी बहसों में उलझने के बजाय सार्थक मुद्दों और सही समय का चुनाव कर सकते हैं, जिसमें बहस करने के बाद कुछ हासिल हो।
मगर बेवजह की बहस में उलझना हमेशा ही नुकसानदेह ही साबित होता है। महान दार्शनिक सोफोक्लीज अपने अनुयायियों को वाद-विवाद और बहस से बचने का पाठ हमेशा पढ़ाया करते थे। सोफोक्लीज के मुताबिक, बहस का असली कारण अपनी कमजोरी छिपाना और दूसरे को अपराधी या दोषी ठहराना होता है। महात्मा गांधी सही मामले के लिए उपयुक्त बहस के पक्षधर थे। बहस को शुरू करना अंगारों पर चलने के बराबर है, इसलिए जुबान खोलते समय सतर्क और जागरूक रहना चाहिए।
अगर इतिहास के पन्नों को खंगाला जाए तो मुल्ला नसरुद्दीन, अकबर के प्रिय बीरबल और तेनालीराम लचीली बहस करने में माहिर थे। यानी बहस ऐसी हो कि बात-विचार भी हो जाए और बिना विवाद के मसले का हल भी निकल आए। यानी सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
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मानव सभ्यता का अतीत जितना संघर्षों का इतिहास है, उतना ही परोपकार और सहानुभूति से भी भरा हुआ है। मनुष्य के भीतर एक स्वाभाविक करुणा का भाव होता है, जो उसे दूसरों के दुख में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करता है। यही भाव समाज को जोड़ता है, मनुष्यता को अर्थ देता है और जीवन को गरिमा प्रदान करता है। पढ़िए पूरा लेख…
