दूसरों को बदलना किसी के हाथ में नहीं होता, लेकिन अपने स्तर पर खुद को तो बदला ही जा सकता है। इस तरह की सोच-समझ रखने वालों को किसी के विचार और रवैये बुरे या भले नहीं लगते। महात्मा बुद्ध ने कभी नहीं कहा कि कोई काम बुरा है और कोई काम अच्छा है। वे केवल कहते हैं कि बोधपूर्वक किया गया काम अच्छा है, जबकि बोधहीनता के असर में किया गया काम बुरा है। बड़े-बुजुर्गों की भी अमूमन यही राय होती है कि हर बुराई में किसी न किसी तरह की अच्छाई छिपी होती है। बस उस अच्छाई को भांपने-समझने की जरूरत होती है। दूसरे शब्दों में, बुरा करने वाला भी कभी अच्छी सीख दे सकता है।

इसी संदर्भ में एक वाकये को उदाहरण के तौर पर याद किया जा सकता है। मूसलाधार बारिश या पाले में भी दूध की थैली पहुंचाने वाले भैया सुबह-सवेरे समय पर अखबार देना कभी नहीं चूकते हैं। एक रविवार सुबह दस बजे के आसपास वह भैया अपने एक ग्राहक के घर गए। उस परिवार के मुखिया बाऊजी कहे जाते थे। वे बरामदे में नाश्ता कर रहे थे। स्वागत-नमस्कार के बाद भैया ने पेपर का महीने भर के पैसे का हिसाब थमा दिया। बाऊजी ने रुपए दिए और बिल फाड़ दिया।

फिर हफ्ते भर बाद एक शाम दरवाजे की घंटी बजी। घर में बुजुर्ग दादी थीं। उन्होंने दरवाजा खोला, तो सामने दूध की थैली पहुंचाने वाले भैया थे। बोले कि माताजी, अखबार के पैसे लेने हैं। दादी अपने सफेद दुपट्टे के एक कोने में गांठ बांध कर रुपए रखती थीं। उन्होंने गांठ खोली और रुपए गिन कर थमा दिए। घर में बारहवीं में पढ़ रहा उनका किशोर पोता भी था। वह गौर से यह सब देख-सुन रहा था। वह अपने संदेह के बावजूद चुप रहा, क्योंकि वह जानता था कि संदेह के आधार पर किसी को गलत या कसूरवार ठहराना नाइंसाफी है। वह तोल-मोल और बोल की कला से भी भली-भांति वाकिफ था। इसीलिए उसने अपने संदेह के बारे में किसी से जिक्र नहीं किया।

दरअसल, यह एक सामान्य आकलन है कि संदेह जब हमारे दरवाजे की घंटी बजा रहा हो, तब केवल हम ही निर्णय ले सकते हैं कि इसे दिमाग की घंटी भी बजाने देनी है या नहीं। वही दुनियादारी को बढ़िया ढंग से निभा सकता है, जो इस तथ्य को स्वीकार करने की कला में पारंगत है। इसलिए बच्चे ने बस अपनी दादी, माता, पिता और भाई को हिदायत दी कि जब भी पेपर वाले भैया महीने के पैसे लेने आएं, तो भुगतान करने से पहले बिल लेना न भूलें। साथ ही बिल को संभाल कर किसी खास दराज में रखते जाएं।

अगले महीने की दो-चार तारीख को भैया आए, मां को बिल देकर रुपए ले गए। मां ने बिल दराज में रख दिया। करीब दस दिन बाद वह फिर उसी महीने का बिल लेकर आ गए। इस दफा भाई मिला। उसने हैरानी जताते हुए उस भैया से पूछा कि अभी तक आपने महीने का हिसाब नहीं लिया… इस बार तो बड़ी देर से ले रहे हैं आप। ऐसा कहते-कहते उसने भी पैसे दे दिए।

करीब हफ्ते बाद एक सुबह दूध देने के बाद वह व्यक्ति फिर से बिल लेकर आ गया। इस दफा यही किशोर मिल गया। वह बिल लेकर अंदर गया। उसने वही दराज खोला, तो देखा कि उसमें बीते महीने के पहले से दो बिल रखे हुए थे। बाहर आकर दोनों बिल उस व्यक्ति की तरफ बढ़ाते-बढ़ाते नम्रतापूर्वक शिकायत की कि शायद आपसे कुछ गलती हो गई है। आप पिछले महीने का बिल तीसरी बार लेने ला गए हैं!

दूध पहुंचाने वाला झुंझलाहट के साथ अपनी सफाई देते हुए बोला, ‘कोई नहीं, गलती हो गई होगी। अग्रिम भुगतान समझिए। अगले महीने में कट जाएंगे।’ किशोर को समझते देर नहीं लगी कि उसका कसूर था या नहीं, लेकिन उनके घर-परिवार की व्यवस्था में चूक थी। कम रकम होने की वजह से परिवार का हर सदस्य भुगतान कर देता, यह मान कर कि देना ही होगा। यह हैरानी की बात जरूर है कि पैसे देने के बाद इस बारे में उनकी आपस में बात तक नहीं होती थी।

मगर इस बार पकड़ में आने के बाद उसी रोज से परिवार ने घर का कायदा दुरुस्त कर दिया कि पेपर, दूध, राशन, फल-सब्जी, कपड़े या बर्तन धोने वाले घरेलू सहायक—सभी का हिसाब-किताब अलग-अलग तयशुदा सदस्य ही किया करेंगे। इससे किसी पर संदेह नहीं होगा और कोई दूसरा नाजायज फायदा नहीं उठा पाएगा।

निश्चित तौर पर उस व्यक्ति की तरह सभी ऐसा नहीं करते। ऐसे मामले बहुत कम और अपवाद हो सकते हैं। मगर इससे समझा जा सकता है कि हर इंसान बाहरी तत्त्वों, हालात और स्थितियों को बदलने में जुटा रहता है, बावजूद इसके कि वह शायद ही कामयाब हो पाए। वास्तव में ज्यादा जरूरी यह है कि पहले अपने आप में बदलाव किया जाए, ताकि ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होने की नौबत ही न आए।

अपने भीतरी बदलाव के बगैर कोई बाहरी दुनिया को सुधार ही नहीं सकता। ओशो की मानें, तो इस तरह कभी-कभी बिना चेष्टा किए परिस्थितियां जीने की बड़ी समझ और सबक सिखा देती हैं। जो कुछ घटित हो रहा है, उसे शांत और तटस्थ होकर बस देखते रहना चाहिए। ब्रिटिश प्रकृतिवादी चार्ल्स डार्विन ने अपने पिता से बचपन में मिली सलाह को ताउम्र गांठ बांधे रखा कि जब तक तुम भ्रम में हो और तुम्हारे पास पूरे सबूत न हों, तब तक तुम्हें चुप ही रहना है। सच है कि जिसने यह समझ-जान लिया, वह खुद भी अपनी गलतियों का सुधार कर लेगा और दूसरों की भी।