मन की भावनाओं और व्याधियों के बारे में हम चर्चा चाहे जितनी कर लें, वे अपर्याप्त ही रह जाती हैं। शैक्षिक पाठ्यक्रम के विषय विज्ञान, गणित और भाषा पर केंद्रित रहते हैं, लेकिन इनमें मन की भावनाओं को समझने-समझाने को अधिक महत्व नहीं दिया जाता। जीवन में इन अपरीक्षित भावनाओं की नासमझी और असंतुलन से कई तकलीफें पैदा होती हैं। यह हमें अभी ठीक से समझ नहीं आया है। स्कूलों में शिक्षक और घरों में भी अभिभावक इन पर संवाद करने की आवश्यकता नहीं समझते। मन में होने वाली न जाने कितनी वेदनाओं का सीधा संबंध भावनाओं और उनकी अपर्याप्त तथा गलत समझ से ही है, इस सच्चाई से मुंह मोड़ना बड़ा नुकसानदेह है।
भावनाओं की फेहरिस्त में क्रोध की जगह बहुत ऊपर है और हर आयु-वर्ग के लोगों के लिए यह एक विकट समस्या है। आपसी संबंधों में क्रोध, सड़क पर मामूली बातों पर हिंसा, प्रेम संबंधों में और महत्त्वाकांक्षाएं पूरी न होने पर पैदा होने वाला क्रोध, इम्तिहान में सफलता और नौकरी में प्रोन्नति न मिलने से उपजने वाला क्रोध। सड़क दुर्घटना, घरेलू हिंसा या आत्महत्या के रूप में यह अक्सर जानलेवा भी हो जाता है। पर इनकी तरफ निहारने की कोई जरूरत ही महसूस नहीं होती। या तो हम इन्हें बेलगाम व्यक्त करते चले जाते हैं, या फिर इनका दमन करते रहते हैं। दोनों के कुपरिणाम भी भुगतते रहते हैं। इस पर सोचने की जरूरत है कि दमन और अनियंत्रित अभिव्यक्ति के अलावा क्रोध से निपटने का कोई मध्य मार्ग भी है क्या।
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लगता तो ऐसा है जैसे क्रोध अचानक कभी भी, कहीं भी उमड़ पड़ता है। किसी पर बहुत अधिक चीखने और उसे आहत करने का मन करता है। पढ़े-लिखे, संभ्रांत लोग इसे बारीक, चालाक तरीकों से व्यक्त करने की कला सीख लेते हैं। अरस्तू कहते थे—“सही व्यक्ति पर, सही मात्रा में, सही समय पर, सही उद्देश्य और ढंग से क्रोध करना चाहिए, पर यह हर किसी के वश की बात नहीं।” जब मन में क्रोध का विस्फोट होता है, तो सही मात्रा, जगह और समय का भान ही किसे रह जाता है। क्या इसके कारण सिर्फ बाहरी परिस्थितियों में हैं या इसकी जड़ें मन की ऐसी गहराइयों में छिपी हैं, जहां पहुंचना संभव नहीं।
संभवतः क्रोध का पहला कारण है किसी इच्छा का पूरा न होना। जब संसार हमारे खुद के कथानक के विरुद्ध चलता है, सारी योजनाएं टूटकर बिखर जाती हैं, तो मन बौखला उठता है। हम अपेक्षा करते हैं कि जीवन हमारे अपने रंग में ही रंग जाए। जब ऐसा नहीं होता, तब गुस्सा भड़क उठता है। जितनी अधिक ताकत के साथ हम अपनी अपेक्षाओं को थामते हैं, उनके अपूरित होने पर उतनी ही गहरी चोट लगती है और उतना ही गुस्सा आता है। अपूरित इच्छाओं के नीचे अक्सर भय भी छिपा रहता है। भय को क्रोध के वस्त्र पहनना भाता है। जब भी हानि, अपमान, असुरक्षा या फिर अज्ञात का भय सताता है, तब मन क्रोध का कवच ओढ़ लेता है। भय के पीछे दुबक जाता है। घायल पशु भयभीत होकर ही सबसे अधिक गुर्राता है। भय हमें असुरक्षित भी महसूस कराता है। आकार में छोटे पशु अक्सर बहुत आक्रामक हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें बड़ी असुरक्षा महसूस होती है। असुरक्षा, भय और क्रोध के बीच का सीधा और स्पष्ट संबंध होता है।
अहंकार क्रोध के लिए उर्वर भूमि है। सम्मान पर चोट, अपमान का अंदेशा, अपनी छवि पर मंडराता खतरा—ये सभी क्षण भर में क्रोध की आग भड़का देते हैं। सबसे खतरनाक होता है संचित पीड़ाओं से जन्मा क्रोध। मौन में पाला गया रोष, बरसों पुराने जख्म, जंग लगी रंजिशें राख के नीचे अंगारों की तरह सुलगती रहती हैं। हवा का एक हल्का झोंका काफी होता है उन्हें भड़काने के लिए। यही वह क्रोध है जो परिवारों और राष्ट्रों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जहर भरता रहता है, उन्हें भीतर और बाहर से तोड़ देता है। गौर से देखें तो क्रोध एक झटके में हमें आसपास के वातावरण से बिल्कुल अलग कर देता है। हम पूरी तरह भूल जाते हैं कि हमारा चिल्लाना-चीखना, हमारे हाव-भाव बाकी लोगों को कितने हास्यास्पद और अनावश्यक भी लग रहे होंगे।
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सवाल उठता है कि क्रोध का मुकाबला हम कैसे करें। शायद पहला उपचार है जागरूकता। जब क्रोध उमड़ता है, तो क्या उसे थोड़ा ठहर कर देखा जा सकता है। यूनानी दार्शनिक एपिक्टेटस कहते हैं—“तुम्हारे साथ जो होता है, वह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि तुम उसका प्रत्युत्तर कैसे देते हो।” क्रोध को तुरंत व्यक्त न करके उसे सिर्फ देखते रहने से आवेग और प्रतिक्रिया के बीच एक अंतराल बनता है। यह अंतराल ही समझ के लिए जगह बना सकता है। जब क्रोध आए, तो क्या उसी समय हम बिल्कुल शांत बैठ सकते हैं और यह देख सकते हैं कि मन में क्या चल रहा है। शांत अवलोकन की ऊर्जा अक्सर क्रोध की आग को शांत करने का काम करती है। प्रयोग के तौर पर यह जरूर किया जाना चाहिए।
क्षमा करना भी एक कारगर उपाय है, पर इसके लिए गहरी आत्मिक दृढ़ता की आवश्यकता है। क्षमा करना अपराध को स्वीकार करना नहीं। इसका अर्थ यह है कि हम दूसरों के प्रति द्वेष को बोझ के रूप में ढोना नहीं चाहते। कृतज्ञता भी क्रोध की एक कारगर औषधि है। कृतज्ञ हृदय के पास कटुता के लिए जगह कम रह जाती है। कृतज्ञता शांत है, क्रोध उग्र।
क्रोध सभी के जीवन में कभी अतिथि और कभी स्थायी पारिवारिक सदस्य की तरह आता है। पर वह बस एक संकेत या लक्षण है, किसी गहरे उद्वेलन का, जो आगे चलकर किसी व्याधि का रूप भी ले सकता है। क्रोध की सही समझ नए दरवाजे भी खोल सकती है। जिद्दु कृष्णमूर्ति कहते हैं कि क्रोध को अपनी हथेलियों में एक आभूषण की तरह रखो और उसे निहारो। उसकी जड़ों तक पहुंचने की कोशिश करो। शायद ऐसा करने पर यह भी दिख सकता है कि क्रोध की ऊर्जा प्रेम की ऊर्जा से अलग नहीं।
