दशकों से दुनिया भर के खगोल विज्ञानी इस पहेली को हल करने के लिए आकाश-पाताल एक करते रहे हैं कि क्या इस ब्रह्मांड में हमसे भी अधिक बुद्धिमान कोई सभ्यता मौजूद है! हाल में, इसकी चर्चा एक बातचीत में शामिल हुए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Barack Obama की एक टिप्पणी से उठी है, जिसमें उन्होंने एलियंस, यानी परग्रही सभ्यता के अस्तित्व को स्वीकार किया। हालांकि बाद के स्पष्टीकरण में उन्होंने साफ किया कि अंतरिक्षीय दूरियों के कारण पृथ्वी पर एलियंस के आने की संभावना कम है, लेकिन ब्रह्मांड की विशालता यह संभावना जगाती है कि पृथ्वी के पार दूसरी कोई दुनिया अवश्य हो सकती है।

सत्ता प्रतिष्ठानों और विज्ञानियों की ओर से पहले भी परग्रही जीवन या एलियंस की संभावनाओं को लेकर काफी कुछ कहा-सुना जाता रहा है। इस संबंध में हमारी जिज्ञासाओं का कोई अंत इसलिए नहीं है, क्योंकि हमारे पास अभी इसका कोई जवाब नहीं है कि इस ब्रह्मांड में कोई दूसरी सभ्यता है या नहीं। इसीलिए नए दावों, नई खोजों के साथ विशाल सौरमंडल में कहीं और जीवन की संभावनाओं को लेकर अक्सर चर्चा और बहस छिड़ जाती है। करीब तीन वर्ष पहले मैक्सिको की संसद में सुनवाई के दौरान जब दो ‘गैर इंसानी जीव’ के शवों को दिखाया गया था, तो सोशल मीडिया पर इन्हें लेकर काफी हंगामा मच गया।

यह पहला अवसर था, जब परग्रही सभ्यताओं के कथित सबूतों के साथ एक देश की संसद में आधिकारिक रूप से धरती के बाहर जीवन की संभावना का उल्लेख किया गया। सलेटी-भूरे रंग के ममीकृत इन शवों का चेहरा-मोहरा काफी हद तक इंसानों जैसा था। इन शवों के 1800 साल पुराने होने का खुलासा National Autonomous University of Mexico द्वारा किए गए रेडियो कार्बन डेटिंग विश्लेषण से हुआ था। इस विश्वविद्यालय के भौतिकी संस्थान ने बयान जारी कर पुष्टि की थी कि वहां इन शवों की उम्र का पता लगाने के तो परीक्षण किए, लेकिन इसका कोई परीक्षण नहीं हुआ कि इन जीवों की उत्पत्ति कहां हुई। यानी इस बारे में पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ये शव एलियंस के ही हैं। शायद यही वजह रही कि बहुत से वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने मैक्सिको में किए गए दावों को सिरे से खारिज कर दिया।

यह आश्चर्य ही है कि आम लोगों से हटकर वैज्ञानिक, अंतरिक्ष इंजीनियर और NASA-ISRO जैसे प्रतिष्ठित संगठनों के शीर्ष अधिकारी और ब्रिटिश भौतिकशास्त्री दिवंगत Stephen Hawking जैसे विचारक भी परग्रही सभ्यताओं के अस्तित्व को स्वीकारते रहे। मुश्किल यह है कि एलियंस के वजूद से जुड़ी गुत्थियों को ब्रह्मांड के अनंत विस्तार और इसके एक छोर से दूसरे छोर की सदियों लंबी दूरियों को देखते हुए सुलझाना आसान नहीं है। कई बार दावे के साथ कहा गया कि एलियंस या उनके यानों को देखा गया, उनके विचरण को रिकार्ड किया गया। फिर भी दावों पर यकीन करना मुश्किल रहा है।

ऐसा क्यों है कि परग्रही सभ्यता और यूएफओ के बारे में कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पा रहा है? इसका एक जवाब दस साल पहले वर्ष 2016 में शोध पत्रिका ‘एस्ट्रोबायोलाजी’ में प्रकाशित हुआ था। इसमें भारतीय मूल के अंतरिक्ष विज्ञानी आदित्य चोपड़ा और प्रो चार्ली लाइनवीवर ने यह निष्कर्ष दिया था कि पृथ्वी से परे अन्य ग्रहों पर जीवन के लायक हालात ही नहीं हैं। लिहाजा उन पर एलियंस तो क्या, कैसा भी जीवन संभव नहीं है। यहां तक कि सौरमंडल के ही ग्रह मंगल और शुक्र पर 400 करोड़ साल पहले जीवन लायक स्थितियां बनी थीं, पर वहां भी पर्यावरण इतना अनुकूल नहीं रहा कि एलियंस पैदा होकर पनप पाएं।

ये नतीजे सामने आने के बाद सवाल यह है कि क्या अब अंतरिक्ष में ऐसी खोजों का कोई महत्त्व रह गया है? खासतौर से इसरो जैसे भारतीय संगठनों को अब क्या करना चाहिए, क्योंकि उसके चंद्र और मंगल अभियानों को ही खर्चीला बताकर उनकी आलोचना होती रही है।

यह सच है कि बीते कई दशकों में एलियंस की खोज कहीं नहीं पहुंची है, लेकिन कई विशेषज्ञ इस धारणा के धुर समर्थक रहे कि ब्रह्मांड में कहीं न कहीं इंसानों जैसी या उससे भी ज्यादा बुद्धिमान सभ्यता मौजूद है। करीब एक दशक पहले एक टेलीविजन चैनल (डिस्कवरी) पर प्रसारित एक शृंखला में कहा गया था कि अन्य ग्रहों पर भी बुद्धिमान प्राणी हो सकते हैं और संभव है कि वे संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करें। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर एलियंस पृथ्वी पर आते हैं तो उसका वैसा ही परिणाम होगा, जैसा कोलंबस के अमेरिका पहुंचने पर वहां के मूल निवासियों का हुआ था। अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी- नासा भी हाकिंग की राह पर चलती रही है। उसने इसके लिए पहले ‘सेटी’ (सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस) जैसा व्यापक अभियान चलाया। उससे जब कुछ नहीं मिला तो 2015 से नेक्सस (नेक्सस फॉर एक्सोप्लैनेट सिस्टम साइंस) नामक अभियान की शुरुआत की थी।

एलियंस के वजूद में भरोसा रखने वालों के नजरिए से देखें, तो कहा जा सकता है कि इस ब्रह्मांड में असंख्य आकाशगंगाएं हैं, इसलिए यह सोचना सांख्यिकीय तर्क के हिसाब से सही हो सकता है कि उनमें कहीं न कहीं जीवन हो। मगर पिछले कई दशकों से दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इस सवाल का जो जवाब खोजा था, वह यही है कि ब्रह्मांड में इंसान अकेला है।

इस उत्तर को मुकम्मल नहीं मानने की एक वजह यही रही कि इस काम में तकनीकी सीमाएं कायम रही हैं। पहले दुनिया के पास न तो बेहद ताकतवर टेलीस्कोप थे और न ही वैसे संकेत पकड़ने वाले यंत्र, जो अंतरिक्ष से आने वाली हर सूक्ष्म आहट को एक अलग प्रकार के जीवन की तरफ से संवाद की कोशिश के रूप में दर्ज कर सकें। दूसरी बड़ी खामी इस मान्यता से जकड़े रहना रहा कि दूसरी दुनिया भी हमारी पृथ्वी जैसी होगी और उस पर इंसान जैसे जीव ही बसते होंगे। यह अवधारणा परग्रही जीवन खोजने में बाधक बनी।

मगर आधुनिक तकनीक के सहारे भी हमारे ही सौरमंडल में मौजूद दो ग्रहों यानी मंगल और शुक्र पर अभी तक न तो जीवन के कोई संकेत मिले और न ही इसकी कोई संभावना नजर आई है कि इन पर भविष्य में भी जीवन संभव हो सकता है। इसका कारण है इन ग्रहों का तापमान, वायुमंडलीय दबाव और सूर्य से इनकी दूरी। कहीं बेहद ऊंचे या अत्यधिक कम दाब व तापमान, तो कहीं जहरीली गैसों की मौजूदगी ने जीवाणु आधारित जीवन की संभावनाओं को पलीता लगा रखा है।

चूंकि अब तक का तकनीकी ढांचा पृथ्वी से परे किसी भी जीवन संकेत को खोज नहीं पाया है, लिहाजा बेहतरी इसी में है कि एलियंस की खोज और संपर्क का काम छोड़ दिया जाए और इसे उन्हीं के हवाले छोड़ा जाए कि वे बताएं कि उनका कोई वजूद है। कम से कम इसरो जैसे भारतीय संगठनों और हमारे वैज्ञानिकों को इस खोज से परहेज ही करना चाहिए। इनके बजाय स्वदेशी जीपीएस तंत्र को कारगर बनाने और देश के दुर्गम इलाकों को बाढ़ और सूखे से बचाने की जानकारियां दिलाने में कारगर उपग्रहों की तैनाती पर जोर देना चाहिए। ये बुनियादी चीजें ही अंतरिक्ष में हमारी जानकारी के हिसाब से ज्यादा महत्त्व रखती हैं।