बढ़ता वायु प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल बनता जा रहा है। वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, जीवाश्म ईंधनों का उपयोग और फसलों के अवशेष जलाना इसके प्रमुख स्रोत हैं, जो फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग और मस्तिष्काघात जैसी जानलेवा बीमारियों का जोखिम बढ़ा देते हैं। यह समस्या न केवल स्वास्थ्य, बल्कि आर्थिक उत्पादकता और कृषि को भी प्रभावित कर रही है। मगर सवाल यह है कि भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को दर्ज करने के लिए क्या मृत्यु प्रमाणपत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख होना जरूरी है और यदि ऐसा है, तो इसके लिए माकूल व्यवस्था का अभाव क्यों है? यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार का कहना है कि देश में ऐसा कोई राष्ट्र-स्तरीय डेटा उपलब्ध नहीं है, जो बीमारियों या मौतों को वायु प्रदूषण से सीधे तौर पर जोड़ता हो।

किसी भी महामारी से निपटने के विज्ञान में ‘एक्सपोजर-रिस्पॉन्स मॉडल’, अतिरिक्त मृत्यु दर का अनुमान और जनसंख्या-स्तरीय जोखिम आकलन जैसे तरीकों का उपयोग किया जाता है। भारत स्वयं तंबाकू-संबंधी कैंसर और व्यावसायिक जोखिमों से जुड़ी बीमारियों के आकलन में इन तरीकों को स्वीकार करता है। यदि वायु प्रदूषण कोई वायरस होता, तो संभवतः भारत अब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर चुका होता। पिछले वर्ष सरकार की ओर से राज्यसभा में दिए गए एक लिखित उत्तर में कहा गया था कि देश में ऐसा कोई निर्णायक राष्ट्र-स्तरीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो मौतों या बीमारियों को केवल वायु प्रदूषण से सीधे तौर पर जोड़ता हो।

वर्ष 2007 में भी सरकार ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में विश्व स्वास्थ्य संगठन और आईजीआईडीआर के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया था कि घर के भीतर वायु प्रदूषण के कारण लगभग 4.07 लाख भारतीयों की समय से पहले मौत हो गई थी, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे। हालांकि, सरकार ने यह भी कहा था कि इन मौतों और वायु प्रदूषण के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए कोई निर्णायक डेटा उपलब्ध नहीं है।

इस संदर्भ में यह कहना गलत नहीं होगा कि देशव्यापी मृत्यु प्रमाणपत्रों के अभाव को तकनीकी रूप से सही ठहराया जा सकता है, लेकिन यह चिकित्सकीय सत्य को पूरी तरह नहीं दर्शाता। सार्वजनिक स्वास्थ्य में जिम्मेदारी केवल एक कारण वाले मृत्यु प्रमाणपत्रों से नहीं मापी जा सकती। अधिकांश प्रदूषण-जनित मौतें हृदय और श्वसन संबंधी रोगों के बढ़ने के कारण होती हैं, जहां वायु प्रदूषण एक जोखिम कारक के रूप में काम करता है, न कि अकेले कारण के रूप में। सरकार का तर्क संभवतः तकनीकी पहलू पर आधारित है – अर्थात सार्वजनिक स्वास्थ्य रिकार्ड या ऐसे गहन अध्ययनों का अभाव, जिनमें प्रत्येक मौत को स्पष्ट रूप से ‘वायु प्रदूषण-जनित’ के रूप में दर्ज किया गया हो।

यह कहना कि ‘निर्णायक राष्ट्रीय डेटा’ उपलब्ध नहीं है, कुछ हद तक तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वायु प्रदूषण मौतों का कारण नहीं बन रहा।

उत्तर भारत के शहरों, विशेषकर दिल्ली में, वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव अब किसी से छिपा नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय और अनेक अध्ययनों ने बार-बार यह दिखाया है कि सूक्ष्म कणों से होने वाला वायु प्रदूषण मानव जीवन पर गंभीर प्रभाव डालता है। लांसेट पत्रिका में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी’ के अनुसार, भारत में वर्ष 2019 में दस लाख से अधिक मौतें वायु प्रदूषण के कारण हुईं, जो देश में कुल मौतों का लगभग 18 प्रतिशत है।

अध्ययन से यह भी पता चला कि वर्ष 1990 से 2019 के बीच सूक्ष्म कणों से होने वाली मृत्यु दर में 115 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि घरेलू वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्यु दर में कमी आई। चिंताजनक तथ्य यह है कि वायु प्रदूषण से होने वाला नुकसान बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के एक विश्लेषण से पता चलता है कि विषाक्त वायु भ्रूण में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों के प्रवाह को बाधित करती है, जिससे समय से पहले जन्म, नवजात का कम वजन, फेफड़ों के विकास में रुकावट और बाल्यावस्था में दीर्घकालिक श्वसन समस्याओं की आशंका बढ़ जाती है।

पिछले कुछ दशकों में औद्योगिकीकरण, वाहनों की संख्या में तेजी और कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण पर्यावरण को इस कदर नुकसान पहुंचा है कि इसके विषैले तत्व अब हर सांस और भोजन के साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। नीति-प्रतिक्रियाएं अधिकांशतः अल्पकालिक रही हैं, जबकि यह स्वास्थ्य संकट दीर्घकालिक और अंतर-पीढ़ीगत प्रभाव डालता है।

हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट में दिल्ली के छह प्रमुख सरकारी अस्पतालों के रिकार्ड का हवाला देते हुए बताया गया कि पिछले तीन वर्षों में इन अस्पतालों में दो लाख से अधिक गंभीर श्वसन रोगों के मामले दर्ज किए गए, जिन्हें वायु प्रदूषण से जोड़ा गया। बच्चों, बुजुर्गों और अन्य संवेदनशील समूहों में अस्थमा, सांस फूलने और श्वसन संबंधी समस्याओं के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि यह दर्शाती है कि वायु प्रदूषण का प्रभाव केवल सांख्यिकीय अनुमान नहीं, बल्कि रोजमर्रा की चिकित्सकीय वास्तविकता बन चुका है।

विभिन्न शोध यह भी संकेत देते हैं कि वायु प्रदूषण केवल श्वसन रोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोगजनकों के प्रसार को भी प्रभावित कर सकता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में दिल्ली के कुछ घनी आबादी वाले इलाकों की हवा में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीवाणुओं की मौजूदगी पाई गई। इससे संकेत मिलता है कि सूक्ष्म कण (पीएम 2.5 और पीएम 10) जीवाणुओं के लिए वाहक की तरह काम कर सकते हैं, जिससे वे हवा में लंबे समय तक बने रहते हैं और मानव शरीर तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है।

यह एक ऐसा पहलू है, जो वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य नीति को अब भी अलग-अलग खांचों में देखने की प्रवृत्ति को उजागर करता है। स्वास्थ्य आपातकाल को केवल डेटा की श्रेणियों पर तकनीकी बहस तक सीमित नहीं किया जा सकता। अस्पतालों में हर दिन वायु प्रदूषण के गंभीर प्रभाव देखे जा रहे हैं, लेकिन इन्हें आधिकारिक रूप से स्वास्थ्य संकट नहीं माना जाता, क्योंकि इस तरह की मौतें ‘वायु प्रदूषण-जनित’ की स्पष्ट श्रेणी में दर्ज नहीं होतीं।

यह चक्रीय तर्क डेटा अंतराल के माध्यम से जवाबदेही में देरी करता है। लाखों भारतीयों के लिए यह संकट रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है – बच्चे और युवा सर्दियों की धुंध भरी हवा में सांस लेने के लिए संघर्ष करते हैं, बुजुर्ग मरीजों से अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है और श्रमिक वर्ग विषाक्त हवा में बिना पर्याप्त सुरक्षा के काम करने को मजबूर है।

ऐसे में भारत को वायु प्रदूषण को केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का एक संरचनात्मक निर्धारक मानना चाहिए। राष्ट्रीय निगरानी प्रणालियों में वैज्ञानिक साक्ष्यों को एकीकृत करने, आंकड़ों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने और नीति विमर्श में प्रदूषण-जनित मृत्यु दर को स्पष्ट मान्यता देने की आवश्यकता है। ये केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी हैं, जो स्वच्छ हवा में सांस लेने के नागरिक अधिकार से जुड़ी हुई हैं।