यह लेख एक गांव में बैठकर लिख रही हूं। यहां से देखा मैंने पिछले सप्ताह दिल्ली में हो रहे एआइ समिट का तामझाम। सच पूछिए तो अजीब-सा लगा। यहां बैठकर जब समाचार चैनलों पर सुने मैंने एआइ के महारथियों के भाषण, तो लगा जैसे ये लोग किसी दूसरे ग्रह से बातें कर रहे थे। ऐसा लगा जैसे इन महारथियों को जानकारी नहीं है कि भारत के सरकारी स्कूलों का हाल क्या है। जानते नहीं हैं कि अभी तक इन स्कूलों में कंप्यूटर भी इतने थोड़े आए हैं कि इंटरनेट से वास्ता जोड़ना हो, तो सेलफोन से होता है।
यह गांव महाराष्ट्र में है। यहां एक बड़ा निजी स्कूल ऐसा है, जिसको सरकारी स्कूलों के हिसाब से देखा जाए, तो काफी अच्छा है। यहां थोड़ी बहुत फीस लगती है, लेकिन अध्यापक आते हैं रोज और बच्चों को वाणिज्य और विज्ञान से लेकर साहित्य तथा अंग्रेजी भाषा तक पढ़ाने का इंतजाम है। बच्चे अच्छी-सी वर्दी पहन कर आते हैं साइकिलों पर। लड़कियों की वर्दी है नीली कमीज, सफेद सलवार और बालों में लाल रंग के फीते। लड़कों की वर्दियां विदेशी पैंट-शर्ट हैं, वही नीले सफेद रंगों में।
मैं इस गांव में आती रही हूं पिछले कोई तीन दशकों से, इसलिए जानती हूं कई लोगों को, जिनकी पढ़ाई इस स्कूल में हुई है। लिख-पढ़ लेते हैं सब, लेकिन इतना नहीं कि कोई अच्छी नौकरी हासिल कर सकें। इसलिए मुंबई से यहां बसे धनवानों के घरों में नौकर बनते हैं। कोई ड्राइवर है, कोई सुरक्षा गार्ड का काम करता है और बहुत तरक्की जो करते हैं, उनको मैनेजर या ‘हाउसकीपर’ की नौकरी मिलती है। इनमें से एक भी नहीं मिला है मुझे जो अंग्रेजी बोल सकता हो या बुनियादी गणित से आगे बढ़ चुका हो। कंप्यूटर की समझ है, लेकिन एआइ के बारे में कोई नहीं जानता है।
देहात के हिसाब से अध्यापकों का वेतन अच्छा
यहां गरीबों की बस्ती में एक दूसरा स्कूल है, जहां बच्चे नंगे पांव आते हैं स्कूल में घिसे, पुराने कपड़ों में। स्कूल को एक पुराने किस्म के सरकारी बंगले में बनाया गया है, जिसकी छत में से बरसात के मौसम में पानी इतना गिरता है कि स्कूल को बंद किया जाता है इस मौसम में। यहां दो अध्यापकों के आने का इंतजाम है, लेकिन वे आती हैं इस गांव से कई किलोमीटर दूर एक छोटे शहर से। देहात के हिसाब से इनका वेतन अच्छा है, लेकिन पढ़ाने तभी आती हैं, जब आना जरूरी हो। जब चुनाव होते हैं, तो इनकी ड्यूटी कहीं और लग जाती है। बच्चों की पढ़ाई में जो नुकसान होता है, इसकी कोई परवाह नहीं करता है। यहां जो बच्चे पढ़ने आते हैं, उनके माता-पिता इतने गरीब हैं कि इनके झुग्गीनुमा घरों में कोई सुविधा नहीं होती है बिजली-पानी की।
समंदर किनारे इस गांव की तस्वीर को मैंने आपके लिए विस्तार से खींचा है, इसलिए कि ऐसे गांव भारत के हर राज्य में आपको मिलेंगे। महाराष्ट्र भारत के विकसित राज्यों में गिना जाता है, तो आप कल्पना कीजिए कि बिहार और उत्तर प्रदेश में क्या हाल होता होगा गांवों के सरकारी स्कूलों का। स्वास्थ्य सेवाएं इस गांव में न होने के बराबर है। एक कस्बा है कुछ दूरी पर जहां मरीजों को ले जाया जाता है, लेकिन बीमारी गंभीर हो तो कम से कम तीस किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। बहुत गंभीर हो तो मुंबई जाना पड़ता है, जो इस गांव से सौ किलोमीटर दूर है। एआइ के विशेषज्ञ कहते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में एआइ बहुत काम आएगा। यह बात सच भी है।
पिछले सप्ताह मेरे घुटने में थोड़ी तकलीफ थी, तो मैंने चैटजीपीटी से सलाह ली और बड़े ध्यान से उसने मेरी तकलीफ के बारे में जानकारी ली तथा इलाज बताया। घुटना ठीक हो गया है मेरा बिना डाक्टर से सलाह लेने के। मेरी जानकारी के कई लोग हैं, जो छोटा-मोटा इलाज करवाना हो, तो चैटजीपीटी से करवा लेते हैं। यानी एआइ वास्तव में अपने देश के देहातों में कई लाभ ला सकता है। समस्या यह है कि एआइ को चलाने के लिए बिजली बहुत चाहिए होती है और अपने देहातों में बिजली आती-जाती है अपनी मर्जी से।
इसलिए इस गांव में बैठकर जब मैंने देखे एआइ इम्पैक्ट समिट के दृश्य, जिनमें अपने प्रधानमंत्री को देखा दुनिया के सबसे बड़े राजनेताओं से गले मिलते हुए, तो बहुत अच्छा लगा। और भी अच्छा लगा जब देश के सबसे प्रसिद्ध पत्रकार भी इस सम्मेलन में दिखे। वे न होते, तो शायद गलगोटिया विश्वविद्यालय का वह झूठ न पकड़ा जाता, जिसमें एक चीन में बनाए हुए रोबोट कुत्ते को विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने अपने छात्रों का बनाया हुआ बताने की कोशिश की।
इन पत्रकारों में से कुछ ऐसे भी हैं, जो चुनावों के मौसम में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में घूमने आते हैं, लेकिन अजीब समस्या हमारी यह है कि हम जब वापस दिल्ली और मुंबई जाते हैं, तो भूल जाते हैं कि जब तक शहरी इंडिया और ग्रामीण भारत के तार जोड़ने का काम नहीं होता है, तब तक एआइ बेमतलब रहेगा, बिल्कुल वैसे जैसे 2047 तक भारत का विकसित होना बेमतलब लगता है।
सुनहरा सपना है, लेकिन देश के यथार्थ से बहुत दूर लगता है इस गांव से। जब देखती हूं मुंबई और दिल्ली में होते इस तरह के सम्मेलनों को, तो वास्तव में ऐसा लगता है जैसे किसी दूसरे ग्रह के नजारे देख रही हूं। इसलिए दिल से उम्मीद करती हूं कि एआइ जल्दी से जल्दी भारत के देहातों में फैले, ताकि हम उन बुनियादी समस्याओं का समाधान ढूंढ़ पाएं, जो मानव बुद्धि से सुलझे नहीं हैं अभी तक। बदहाल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की समस्याएं। बिजली, पानी की समस्याएं। गरीबी, गंदगी की समस्याएं। क्या एआइ इन सारी समस्याओं के समाधान ढूंढ़ सकेगा? ऐसे सवाल मन में आते रहे एआइ सम्मेलन को दूर से देखते समय।
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कृत्रिम मेधा (एआइ) का दौर शुरू हो चुका है। यह सच है कि एआइ मानव क्षमताओं और उत्पादकता को कई गुना बढ़ा देगा। भारत के पास मानव संसाधनों की विशाल और लगातार बढ़ती संपदा है (कम से कम 2050 तक)। हालांकि, इसकी गुणवत्ता विकसित देशों के मानव संसाधनों से काफी अलग है। एक विकसित देश में व्यावहारिक रूप से हर कोई स्कूली शिक्षा प्राप्त करता है और विद्यार्थियों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कालेज तक की शिक्षा ग्रहण करता है। वहां जीवन भर सीखने और नए कौशल हासिल करने का अवसर होता है। भारत में जनसांख्यिकीय लाभांश के साथ इसका बोझ भी आता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
