बीते साढ़े तीन वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने दुनिया के कामकाज का तरीका बदल दिया है। मगर इस कारण पैदा होने वाली चुनौतियों के बीच यह सवाल उठा है कि आखिर इसे कैसे अपनाया जाए। शुरू में एआई को एक सहायक शक्ति के रूप में देखा गया। धीरे-धीरे यह लगने लगा कि यह नई तकनीक कहीं लोगों से उनके काम न छीनने लगे, क्योंकि नौकरियों में लगातार की जा रही छंटनियों ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है।
सबसे ज्यादा असर तो उन कंपनियों पर पड़ा है, जिनका सीधा संबंध इस तकनीक को पैदा करने वाले क्षेत्र यानी ‘कंप्यूटिंग’ और सूचना प्रौद्योगिकी से है। कई कंपनियों ने अपने कार्यबल में कटौती भी की है। लगभग हर बार तर्क दिया गया कि भविष्य एआई का है, इसलिए संगठनों को अधिक चुस्त, अधिक उत्पादक और प्रतिस्पर्धी बनाना जरूरी है।
फिलहाल इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं है। मगर इस सच्चाई से हम मुंह नहीं चुरा सकते कि एआई ने कार्यस्थलों को बदलना शुरू कर दिया है। दोहराए जाने वाले कार्य, प्रारंभिक विश्लेषण, ग्राहक सहायता, दस्तावेज तैयार करना, कोड लिखना और डेटा प्रसंस्करण जैसे अनेक काम पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से एआई से लैस मशीनें कर रही हैं।
दूसरी ओर, यह भी उतना ही सच है कि अनेक कंपनियां उन वित्तीय और प्रबंधकीय निर्णयों को भी एआई के खाते में डाल रही हैं, जिनकी जड़ें महामारी कोविड-19 के बाद की आर्थिक परिस्थितियों, निवेशकों के दबाव और लागत घटाने की रणनीतियों में हैं। यही कारण है कि श्रम बाजार के विशेषज्ञ अब ‘एआई-वाशिंग’ जैसी अवधारणा पर गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं। यानी जहां तकनीक को वास्तविक कारण से अधिक बड़ा कारण बता कर पेश किया जाता है।
हाल के महीनों में यह बहस और तेज हुई है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने छंटनी के साथ-साथ एआई निवेश बढ़ाने की घोषणा की है। अनेक कंपनियां समांतर रूप से एआई विशेषज्ञों, इंजीनियरों, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और डेटा वैज्ञानिकों की नई भर्तियां भी कर रही हैं। इसका अर्थ यह है कि नौकरियां पूरी तरह खत्म नहीं हो रही हैं, बल्कि उनका स्वरूप बदल रहा है।
विश्व आर्थिक मंच की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट-2025’ इस बदलाव का अधिक संतुलित चित्र प्रस्तुत करती है। इसके अनुसार 2030 तक वैश्विक स्तर पर लगभग 22 फीसद नौकरियां किसी न किसी रूप में प्रभावित होंगी। इस अवधि में लगभग 17 करोड़ नई भूमिकाओं वाली नौकरियां पैदा होंगी, जबकि लगभग 9.2 करोड़ पुरानी भूमिकाओं वाली नौकरियां समाप्त होंगी।
यानी कुल मिला कर रोजगार में वृद्धि की संभावना बनी हुई है। इससे साफ है कि असली चुनौती रोजगार की संख्या नहीं, बल्कि कौशल का परिवर्तन है। दुनिया के कुछ विकसित देशों के लिए कौशल परिवर्तन शायद ज्यादा बड़ी समस्या न हो, लेकिन भारत के लिए यह चुनौती कहीं अधिक जटिल है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी और विशाल आइटी क्षेत्र वाले देश के रूप में भारत वैश्विक तकनीकी बदलावों से सीधे प्रभावित होता है। असल में समस्या यह है कि आइटी और एआईका भारतीय परिदृश्य काफी हद तक दुनिया के विकसित देशों से मिलने वाले कामकाज पर आश्रित है। एआई पर होने वाली वैश्विक बहस भारत के लिए केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सवालों से भी जुड़ी है।
एआई की वास्तविक क्षमताओं को लेकर कई बार अतिशयोक्तिपूर्ण बातें की जाती हैं। यह समझना होगा कि इसका सबसे प्रचलित रूप- ‘जेनरेटिव एआई’ किसी सवाल या जिज्ञासा के समाधान के रूप में एक उत्कृष्ट प्रारूप तैयार कर सकता है, विशाल मात्रा में डेटा का विश्लेषण कर सकता है और नियमित कार्यों को स्वचालित बना सकता है। मगर जटिल निर्णय, नैतिक विवेक, नेतृत्व, मानवीय संवाद, संकट प्रबंधन, रचनात्मक रणनीति और संदर्भ आधारित निर्णय अभी भी मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है।
यही कारण है कि अनेक संस्थानों को कुछ क्षेत्रों में पूरी तरह मशीनों पर निर्भर रहने के बाद दोबारा अनुभवी कर्मचारियों की जरूरत महसूस हुई। हाल में, इसकी मिसाल अमेरिकी वाहन निर्माता कंपनी फोर्ड में दिखी, जिसने अपने करीब 350 पुराने कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर बहाल किया। इन कर्मचारियों को एआई से स्वचालित कार्यों की बढ़ोतरी और लागत घटाने के बड़े दावों के दबाव में नौकरी से निकाल दिया गया था। इस अनुभव ने यह स्पष्ट किया कि एआई से तकनीकी दक्षता तो बढ़ सकती है, लेकिन यह तकनीक संस्थागत अनुभव और मानवीय समझ का विकल्प अभी नहीं बन सकी है।
एक और अहम पहलू यह है कि एआई के कारण सबसे अधिक दबाव शुरुआती स्तर की नौकरियों पर दिखाई दे रहा है। पहले जिन भूमिकाओं में नए स्नातकों को प्रशिक्षण मिलता था, उनमें अब स्वचालन बढ़ रहा है। यदि कंपनियां प्रवेश स्तर की भर्तियां घटाती हैं, तो भविष्य में अनुभवी नेतृत्व कहां से आएगा? यही चिंता हाल में कई श्रम विशेषज्ञों और मानव संसाधन संस्थाओं ने भी व्यक्त की है।
उनका कहना है कि एआई के कारण शुरुआती नौकरियों का स्वरूप बदलना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें पूरी तरह समाप्त करना भविष्य की प्रतिभा शृंखला को कमजोर कर सकता है। भारतीय विश्वविद्यालयों और पेशेवर शिक्षण संस्थानों के लिए इससे बड़ा संदेश शायद ही कोई हो। आज भी बड़ी संख्या में संस्थान ऐसे पाठ्यक्रम पढ़ा रहे हैं, जिनका उद्योग की बदलती जरूरतों से सीमित संबंध है।
अगर विद्यार्थी केवल पारंपरिक प्रोग्रामिंग, प्रबंधन या लेखांकन सीख कर निकलेंगे, तो वे तेजी से बदलते रोजगार बाजार में पिछड़ सकते हैं। अब हर क्षेत्र में एआई साक्षरता, डेटा विश्लेषण, डिजिटल नैतिकता, मानव-एआई सहयोग, साइबर सुरक्षा और समस्या समाधान जैसी क्षमताओं को मुख्यधारा का हिस्सा बनाना होगा।
ऐसे में अगर भारत केवल वैश्विक कंपनियों के लिए ‘आउटसोर्सिंग’ का केंद्र बना रहता है, तो हर वैश्विक तकनीकी पुनर्गठन का झटका भारतीय युवाओं को झेलना पड़ेगा, लेकिन देश एआई अनुप्रयोग, चिप डिजाइन, डेटा सेंटर और रोबोटिक्स पर काम करने के साथ विश्वसनीय डिजिटल अवसंरचना विकसित करता है, तो इन बदलावों को रोजगार के नए अवसरों में बदल सकता है। यह तकनीकी निवेश के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी प्रश्न है।
इतिहास बताता है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति ने कुछ नौकरियां समाप्त की हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। कंप्यूटर, इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ भी यही हुआ था। एआई भी उसी क्रम की अगली कड़ी है। फर्क केवल इतना है कि इस बार बदलाव की गति कहीं अधिक तेज है।
सवाल यह नहीं है कि एआई कितनी नौकरियां समाप्त करेगा। सवाल यह है कि क्या हम अपने युवाओं को ऐसे कौशल दे रहे हैं जो मशीनों के साथ मिल कर काम कर सकें? अगर उत्तर नहीं है, तो समस्या एआई नहीं, हमारी नीति, शिक्षा और प्रशिक्षण व्यवस्था है। यदि उत्तर ‘हां’ है, तो यही तकनीक भारत को वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में नई ऊंचाई पर भी पहुंचा सकती है। भविष्य का विजेता वह समाज होगा जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग मानव बुद्धिमत्ता को प्रतिस्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि उसे और अधिक सक्षम बनाने के लिए करेगा।
