इसमें कोई दोराय नहीं है कि कृत्रिम बुद्धि यानी एआइ एक दोधारी तलवार है, जिसे सही नियमों और नैतिक दिशा-निर्देशों के साथ इस्तेमाल किया जाए, तो मानवता के लिए वरदान है। दूसरी तरफ इसकी अनियंत्रित वृद्धि सामाजिक और नैतिक ताने-बाने के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। क्या मानव समाज में एआइ की सच में इतनी जरूरत है?

मनुष्य ने मशीनों का आविष्कार किया अपने काम को सरल बनाने और कम समय में अधिक काम पूरा करने के लिए, ताकि बचे हुए समय में अपनों के साथ एक खुशहाल जीवन जी सके। मगर यह नहीं सोचा गया होगा कि एक दिन मशीनें ही मनुष्यों का स्थान लेने लगेंगी और उनके अस्तित्व के समक्ष चुनौती उत्पन्न हो जाएगी। जब तक मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चल रहा था, एक खुशहाल जीवन जी रहा था। जैसे ही उसने विकसित तकनीक का प्रयोग करके प्रकृति के नियम को तोड़ने और तकनीकी व आभासी वातावरण बनाने की कोशिश शुरू की, समाज अनेक तरह के जोखिमों का सामना करने लगा।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक डेमिस होसाबिस का तर्क है कि जहां एआइ के विकास से संभावनाएं बढ़ी हैं, वहीं उसके खतरे भी उभरे हैं। एआइ की दौड़ में कुछ देश या कंपनियां सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज कर सकती हैं। ऐसा करने पर यह तकनीक मानवता के लिए विनाश का कारण बन सकती है। उनका तर्क है कि एआइ को बच्चों की तरह ही नैतिकता और इंसानियत सिखाने की जरूरत है। वे चाहते हैं कि ऐसी एआइ विकसित हो, जो न सिर्फ बुद्धिमान हो, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार भी हो।

माना जा रहा है कि 2030 तक इतना सोचने वाली मशीन आ जाएगी, जो इंसानी क्षमता से अधिक तेज और ज्ञानवान होगी। वह हमारे आसपास की दुनिया को गहराई से समझेगी और हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में घुलमिल जाएगी। यह भी कहा जा रहा है कि एआइ अगले दस साल में बीमारियों को खत्म कर देगा। सवाल यह है कि प्राकृतिक वातावरण में इतनी बीमारियां तो नहीं थीं, जितनी आज के डिजिटल वातावरण में विकसित हुई हैं, तो क्या ये बीमारियां विकसित तकनीक के अधिक उपयोग के कारण ही उभर रही हैं?

पहले मशीन एक सहायक के रूप में प्रयुक्त होती थी और मुख्य भूमिका मनुष्य की होती थी, लेकिन अब मुख्य भूमिका में एआइ (विकसित मशीन) है और मनुष्य केवल सहायक की भूमिका निभा रहा है। ऐसे में मनुष्य का शरीर और दिमाग, दोनों ही शिथिल पड़ने लगते हैं और अनेक तरह की बीमारियों का घर बन जाते हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि 2030 तक करोड़ों नौकरियां चली जाएंगी, क्योंकि एआइ मनुष्य से अधिक कुशलता से काम कर सकती है। ऐसे में समाज में एक नए प्रकार का विभाजन उभरेगा—श्रेष्ठ बौद्धिक जनसंख्या और कम बौद्धिक जनसंख्या। मशीन मनुष्य से अधिक संपूर्णता से काम करती है, इसलिए लोग उस पर ज्यादा विश्वास करने लगते हैं। इस कारण से हर क्षेत्र के विशेषज्ञों और उनके कौशल को चुनौती मिल रही है।

डाक्टर की जगह एआइ बहुत गहनता से मेडिकल रपट की जांच करती है और बीमारी का कारण व निदान बताने लगी है। शिक्षकों की जगह एआइ से पढ़ने में विद्यार्थी अधिक रुचि लेने लगे हैं। वास्तुविद, काउंसलर, फैशन, प्रशिक्षक, कोच, व्यायाम—सभी क्षेत्रों में एआइ ने अपना प्रभुत्व जमाना शुरू कर दिया है। ऐसे में युवाओं को लगता है कि अब उन्हें परिवार, मित्र या अन्य किसी की जरूरत नहीं है। सभी की कमी एआइ से पूरी की जा सकती है।

एआइ युवा पीढ़ी की विश्लेषण करने और अलग तरह से सोचने की क्षमता को प्रभावित कर रही है। मसलन, पहले कुछ भी लिखने के लिए सोचना और पढ़ना पड़ता था, लेकिन अब अधिकांश विद्यार्थी और युवा चैट-जीपीटी पर विषय लिख देते हैं और वह कुछ ही सेकंड में उत्तर तैयार करके दे देता है। यहां तक कि पसंद न आने पर अनेक अन्य विकल्प भी देता है। सवाल यह भी है कि क्या उसके द्वारा प्रस्तुत सूचनाएं सौ फीसद सही होंगी। यह एक कृत्रिम यंत्र ही है, जो मनुष्य द्वारा निर्मित है।

फिर इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यहां यह स्पष्ट हो जाता है कि एआइ का शिक्षा के क्षेत्र पर सबसे खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है। विशेष रूप से समाज विज्ञान के क्षेत्र में इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। एआइ ने ‘उपयोग के लिए तैयार सामग्री’ उपलब्ध कराकर बच्चों को बंधक मस्तिष्क (कैप्टिव माइंड) में बदल दिया है। चाहे कोई ‘प्रोजेक्ट’ बनाना हो, आवेदन लिखना हो, लेख लिखना हो या फिर किसी शोधार्थी को कोई शोध कार्य करना हो, सभी चैट-जीपीटी और अन्य एआइ ऐप के माध्यम से अपने कार्य को करने लगे हैं।

इससे समय की बचत तो होती है, लेकिन विद्यार्थियों की विश्लेषणात्मक क्षमता और आलोचनात्मक समझ भी प्रभावित हो रही है। समय अगर किसी उचित काम के लिए बचाया जाना है, तो कुछ हद तक इसे सही कहा जा सकता है, लेकिन बच्चे और युवा उस समय को स्मार्टफोन स्क्रॉल करने, रील बनाने या ऑनलाइन गेम खेलने और यहां तक कि कुछ अपराध में लगा रहे हैं। परिणामस्वरूप छोटी-सी उम्र में ही बच्चे अनेक गंभीर शारीरिक तथा मानसिक बीमारियों का शिकार बन रहे हैं। ऐसा लगने लगा है कि स्मार्टफोन तक ही लोगों का जीवन विश्व सिमट कर रह गया है।

हाल ही में इसरो के एक सेवानिवृत्त वैज्ञानिक ने इसलिए अपनी पत्नी की हत्या कर दी कि “मेरे मरने के बाद इसकी देखभाल कौन करेगा।” उनकी इकलौती बेटी अमेरिका में बस गई थी, जिससे उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। इसी तरह मुंबई के एक संभ्रांत इलाके में एक बुजुर्ग दंपति की सड़ी हुई लाश उनके आलीशान बंगले में मिली थी, जिनके दोनों बेटे विदेश में बसने के कारण अपने बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल करने में असमर्थ थे। उनके पास अकूत धन-दौलत थी, लेकिन समय नहीं था।

इन घटनाओं में परिवार हर दृष्टि से समृद्ध और संपन्न थे, लेकिन परिवार के सदस्यों में भावनात्मक लगाव और संवादहीनता की स्थिति थी। ऐसी भौतिक संपन्नता और तकनीकी विकास दृष्टि किस काम की, जब बुजुर्ग माता-पिता का अंतिम संस्कार लावारिस की तरह अनजान लोगों द्वारा किया जाए? क्या इसी दिन के लिए लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाते हैं, उनका भविष्य बनाने के लिए अपने जीवन की हर इच्छा को त्याग देते हैं?

एआइ निर्देशित मशीन से काम के घंटे कम हो सकते हैं, जिससे लोगों के पास अधिक समय रहता है और जिसे वे अपने परिवार के साथ बिताने में खर्च कर सकते हैं। मगर यह कितना संभव हो पा रहा है? एआइ के तंत्र ने व्यक्तिगत डेटा को सार्वजनिक कर दिया है, जिससे गोपनीयता की समस्या उभर रही है। समाज में आर्थिक असमानताओं में वृद्धि के कारण एआइ तंत्र का लाभ उठाने के लिए लोगों को तकनीकी ज्ञान और संसाधनों की आवश्यकता होती है, जिससे समाज में अन्य प्रकार की असमानताएं बढ़ सकती हैं।

इसलिए लोगों को एआइ और नवीन तकनीकी ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ इससे होने वाले खतरों से अवगत करना होगा। सरकार या प्रशासन को भी एआइ प्रणालियों के उपयोग को नियंत्रित करना होगा, ताकि वे सुरक्षित और न्यायसंगत बन सके। तकनीक कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती।

प्राकृतिक (वास्तविक) बुद्धि में कृत्रिम बुद्धि को विकसित करने की क्षमता है, लेकिन कृत्रिम बुद्धि कभी भी वास्तविक बुद्धि को उत्पन्न नहीं कर पाएगी और न ही उसे विस्थापित कर सकेगी, लेकिन मानव जीवन के समक्ष खतरे और चुनौतियां जरूर उत्पन्न कर सकती है। इस पर समय रहते नियंत्रण करने की जरूरत है।