आधुनिक तकनीक से बदलते विश्व की रफ्तार आज थोड़ी ज्यादा हो चली है। कल्पना कीजिए कि चुनाव के बीच किसी के मोबाइल पर एक छोटा-सा वीडियो आता है। उसमें देश के किसी बड़े नेता का चेहरा होता है। हूबहू उसी नेता की आवाज में एक ऐसा विवादास्पद बयान होता है, जिसे सुनकर लोग स्तब्ध रह जाते हैं। कोई ऐसा भी होता है, जो उसे आगे भेज देता है और देखते ही देखते वह हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। अगले दिन पता चलता है कि वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से तैयार किया गया फर्जी वीडियो था। मगर इस बीच उसका राजनीतिक असर हो चुका होता है।
फिर कुछ समय बाद उसी नेता का कोई वास्तविक विवाद सामने आता है और उसका प्रामाणिक वीडियो प्रसारित होता है। इस बार नेता के समर्थक उसे देखते ही कह देते हैं कि यह भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाया गया होगा।
इसी में आधुनिक डिजिटल लोकतंत्र का सबसे गहरा संकट छिपा है। समस्या केवल यह नहीं कि झूठ पहले से कहीं अधिक तेजी और विश्वसनीयता के साथ फैल सकता है। उससे भी बड़ा खतरा यह है कि झूठ की निरंतर उपस्थिति सच की विश्वसनीयता को भी संदिग्ध बना सकती है। जब नागरिक हर दृश्य, हर आवाज और हर प्रमाण पर संदेह करने लगे, तब लोकतंत्र केवल गलत सूचना का नहीं, बल्कि सत्य की पहचान के संकट का सामना करता है।
आज यह भूमिका असंख्य अनाम स्रोतों, सोशल मीडिया के समूहों और उनके पीछे काम करने वाली स्वचालित व्यवस्थाओं में बंट गई है। ऐसे वातावरण में उस व्यक्ति या संगठन को भी बढ़त मिल सकती है, जो सबसे पहले, सबसे तेज और सबसे प्रभावशाली ढंग से नागरिकों की भावनाओं को छू ले। राजनीतिक दल सीधे मतदाता के हाथ में मौजूद मोबाइल तक पहुंचने लगे। ‘डेटारिपोर्टल’ के अनुसार, 2024 की शुरुआत में भारत में लगभग 46 करोड़ सोशल मीडिया के उपयोगकर्ता थे।
डिजिटल मंचों के विस्तार ने राजनीति को महानगरों और पारंपरिक जनसभाओं की सीमाओं से बाहर निकाल दिया। अब राजनीतिक संदेश किसी मंच से दिया जाए, यह आवश्यक नहीं, वह एक छोटे वीडियो, संदेश, मीम या चित्र के रूप में सीधे मतदाता तक पहुंच सकता है।
इस सुविधा के साथ एक गंभीर विडंबना भी जुड़ी है। डिजिटल मंच केवल सूचना के नए रास्ते नहीं बने, बल्कि राजनीतिक प्रचार और दुष्प्रचार के भी शक्तिशाली माध्यम बन गए। 2019 के आम चुनाव के दौरान ऑक्सफोर्ड इंटरनेट संस्थान के शोधकर्ताओं के अध्ययन ने संकेत दिया था कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक संवाद में भ्रामक और निम्न गुणवत्ता वाली सामग्री का प्रभाव उल्लेखनीय था। इससे स्पष्ट हुआ कि डिजिटल लोकतंत्र में सूचना की मात्रा बढ़ना आवश्यक रूप से सूचना की गुणवत्ता बढ़ने का प्रमाण नहीं है।
फिर भी चुनावी नतीजों को केवल सोशल मीडिया का परिणाम मानना एक सरलीकरण होगा। उम्मीदवार की छवि, स्थानीय मुद्दे, संगठनात्मक शक्ति, सामाजिक समीकरण और सरकार का प्रदर्शन आज भी चुनावी राजनीति में महत्त्वपूर्ण हैं। सोशल मीडिया ने इन कारकों को समाप्त नहीं किया है, बल्कि उनके ऊपर सूचना और प्रचार की एक अत्यंत तीव्र परत चढ़ा दी है।
वर्ष 2024 के आम चुनाव तक डिजिटल राजनीतिक प्रचार एक नए चरण में प्रवेश कर चुका था। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ के विश्लेषण के अनुसार, चुनावी अवधि में गूगल के विभिन्न मंचों पर लगभग एक लाख 97 हजार राजनीतिक विज्ञापन दिखाई दिए और उन पर करीब 205 करोड़ रुपए खर्च हुए। इनमें 81 फीसद से अधिक विज्ञापन वीडियो के रूप में थे। यह बताता है कि चुनावी प्रचार में दृश्य सामग्री अब केंद्रीय भूमिका निभा रही है। इसी दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने चुनौती को और जटिल बना दिया।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल झूठ को सच जैसा विश्वसनीय बनाने का औजार नहीं है, वह वास्तविक सच पर संदेह पैदा करने का बहाना भी बन सकती है। यही आधुनिक सूचना-व्यवस्था का सबसे चिंताजनक पक्ष है। इसलिए दुष्प्रचार की समस्या को केवल तथ्यों की जांच से हल नहीं किया जा सकता।
झूठ को फैलाने में कुछ सेकंड लगते हैं, जबकि उसकी जांच करने, प्रमाण जुटाने और खंडन को व्यापक जनता तक पहुंचाने में समय लगता है। डिजिटल माध्यम की यही असमान गति झूठ को शुरुआती बढ़त देती है। यदि कोई फर्जी वीडियो चुनाव के निर्णायक समय में तेजी से फैल जाए तो बाद में आने वाला स्पष्टीकरण उसके प्रभाव को पूरी तरह समाप्त कर पाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। डिजिटल माध्यमों ने राजनीतिक दलों को अलग-अलग समूहों के लिए अलग संदेश तैयार करने की अभूतपूर्व क्षमता भी दी है।
सवाल है कि क्या इसका समाधान सोशल मीडिया पर कठोर सरकारी नियंत्रण में है! यह रास्ता भी लोकतंत्र के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। जिस माध्यम ने दुष्प्रचार की क्षमता बढ़ाई है, उसी ने सत्ता से असहमति रखने वालों को अपनी बात कहने का अभूतपूर्व अवसर भी दिया है। स्थानीय प्रश्न राष्ट्रीय बहस का विषय बन रहे हैं और वे आवाजें भी सामने आ रही हैं, जिन्हें पारंपरिक माध्यमों में पर्याप्त स्थान नहीं मिलता था।
इसलिए चुनौती तकनीक को रोकने की नहीं, बल्कि उसके साथ लोकतांत्रिक विवेक विकसित करने की है। सोशल मीडिया साक्षरता अब लोकतांत्रिक नागरिकता की अनिवार्य शर्त बनती जा रही है। नागरिक को यह समझना होगा कि परदे पर दिखाई देने वाली सामग्री स्वयं प्रमाण नहीं होती। स्रोत क्या है, तारीख क्या है, संदर्भ क्या है और मूल सामग्री कहां उपलब्ध है- इन प्रश्नों की जांच अब केवल पत्रकारों की जिम्मेदारी नहीं रह गई।
आज यह बहस पर्याप्त नहीं है कि सोशल मीडिया ने राजनीति को बदला या राजनीति ने सोशल मीडिया को। दोनों ने एक-दूसरे को बदल दिया है। डिजिटल माध्यमों ने राजनीति को अधिक तात्कालिक, दृश्यप्रधान, व्यक्तिगत और चौबीसों घंटे सक्रिय बना दिया है। दूसरी ओर, राजनीति ने सोशल मीडिया को प्रचार, संगठन, मतदाता-लक्ष्यीकरण और वैचारिक संघर्ष का विशाल मैदान बना दिया है।
इस पूरे परिवर्तन में भरोसेमंद सूचना लगातार सबसे मूल्यवान और दुर्लभ संसाधन बनती जा रही है। आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अधिक सक्षम होगी। इसलिए लोकतंत्र की अगली परीक्षा केवल मतदान केंद्र पर नहीं, नागरिक के हाथ में मौजूद मोबाइल की स्क्रीन पर भी होने वाली है। लोकतंत्र को अब केवल मतदान करने वाला नागरिक नहीं, बल्कि सूचना को परखने वाला विवेकशील नागरिक चाहिए।
यदि ऐसी स्थिति पैदा हो जाए जिसमें झूठ लाखों लोगों तक पहुंच जाए और सत्य सामने आने के बाद भी उस पर विश्वास न किया जाए, तो खतरा किसी एक फर्जी वीडियो से कहीं बड़ा होगा। तब संकट सूचना तक सीमित नहीं रहेगा, वह सत्य की पहचान और उसकी विश्वसनीयता का संकट बन जाएगा।
आधुनिक डिजिटल लोकतंत्र के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है- नागरिक को केवल सूचना तक पहुंच देना पर्याप्त नहीं है, उसे सूचना और भ्रम, प्रमाण और प्रदर्शन, सत्य और तकनीकी छल के बीच अंतर करने की क्षमता भी देनी होगी। जब समाज सच को पहचानने की अपनी क्षमता खो देता है, तब लोकतंत्र का सबसे मजबूत आधार- जनविश्वास धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।
