मानवीय वृत्तियों के अनेक स्वरूप हैं, जिसके नेपथ्य में अच्छाई और बुराई के बीच हमारे दैनिक आचरण संचालित होते हैं। मानव जीवन में सबसे बड़ी जंग बाहरी दुनिया की कठिनाइयों से नहीं, बल्कि हमारे अंतर्मन में उठने वाले तूफानों से होती हैं। ऐसा देखा जाता है कि सामाजिक प्रक्षेत्र की विभिन्न प्रकार की घटनाओं से उत्पन्न परिस्थितियां प्राय: हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं, लेकिन हमारे चेतन मन में छिपी सकारात्मक ऊर्जा इतनी शक्तिशाली है कि वह प्रतिकूल चिंतन धाराओं को अनुकूलता में बदल सकती है।

दैनिक जीवन की गतिविधियां हमें बार-बार ऐसी स्थितियों में डालती हैं, जहां हमारी शक्ति, हमारे साधन, यहां तक कि हमारा धैर्य भी जवाब देने लगता है, पर मानव होने का अर्थ ही यह है कि हम उन परिस्थितियों से ऊपर उठने की क्षमता भी रखते हैं, जो जिंदगी में सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती है। बाहरी स्थितियां कभी-कभी हमारी सीमाएं बेशक तय कर सकती हैं, लेकिन यह निर्णय हमेशा हमारा होता है कि हम उन परिस्थितियों के प्रति कैसा चिंतन दृष्टिकोण रखते हैं और उसे किस रूप में परखते हैं।

हमारा विवेक यह स्वीकार करता है कि हम दर्द से नहीं टूटते, बल्कि हम बिना उद्देश्य और लक्ष्य के दर्द से टूट जाते हैं। जब हमें ज्ञात होता है कि हमें क्यों जीना है, कैसे जीना है, तो इसका मार्ग हमारा विवेक तय करता है। भौतिक संसार की प्रतिकूल धाराओं पर विजय का ध्वज फहराने वाले हम प्राणी कभी-कभी खुद के भीतर के संघर्षों से थक-हार भी जाते हैं।

मन में संचालित द्वंद्व और संशय, कभी अपने किसी काम, निर्णय, अतीत या अनुभव को लेकर अपने को कोसने लगते हैं। किसी पीड़ा का दंश जब मन के किसी कोने में पड़ाव बना लेता है, तो हमारा चेतन मन विवेक के अस्तित्व की गहराई को झकझोरने लगता है।

व्यक्तित्व की परिधि में स्वाभिमान की शक्ति जहां स्वयं जीवन पथ में सुगमता और सरलता के पुष्प बिछाती हैं, वहीं ‘अहं’ यानी ‘इगो’ के तरंग मस्तिष्क मंडल में आत्मकेंद्रित सह आत्ममुग्धता के भाव का बीजारोपण करते हैं। यह आचरण व्यक्ति के मस्तिष्क में एक दिन में स्थान नहीं ग्रहण करता, बल्कि क्रमश: इसकी वृद्धि हमारे आसपास सामाजिक तथा पारिवारिक परिवेश की घटनाओं के कारण होती है।

कुछ लोग मानते हैं कि अहं व्यक्ति के स्वभाव का वह अक्षय अंश है, जिससे मुक्ति कठिन है, लेकिन किसी आकस्मिक घटना, प्रेरणा या अध्ययन के कारण इस भाव का तिरोधान संभव भी हो जाता है। इसका एक पक्ष हमारे आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आत्म-प्रगति को दर्शाता है, जो हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी करता है।

दूसरी ओर, यह हमें अहंकार और स्वार्थ के सांचे में ढालते हुए आत्मश्लाघा के आंगन की यात्रा भी करा देता है। यह हमें अपने दायित्व के बारे में सकारात्मकता की उपस्थिति कराते हुए अपने लक्ष्यों, अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक भी करता है।

अहं के अपने नुकसान भी हैं। यह हमें एकपक्षीय प्रवृत्ति की ओर प्रवृत्त करते हुए हमारे पारिवारिक या सामाजिक रिश्ते में विघ्न भी उत्पन्न करता है, जिसके कारण हम अपने लक्ष्य-मार्ग से भटक जाते हैं। यह वृत्ति हमें कभी-कभी दूसरों की भावनाओं, अपेक्षाओं और जरूरतों को नजरअंदाज करने के लिए विवश कर देता है, जिससे आपसी संबंधों के सेतु कमजोर हो जाते हैं।

पैर जमाए अहं की वजह से हम दूसरों के साथ अपने संबंध सामान्य बनाए रखने में विफल इसलिए होते हैं, क्योंकि हठी स्वभाव की वजह से हम अपनी बातें उन्हें मानने पर अधिक जोर देते हैं, बिना यह विचारे कि अपनी बातों में तथ्य और दम कितना धरातलीय है। अहं के वशीभूत होने से हम अपनी गलतियों को स्वीकारने की स्थिति से विमुख होकर सामने वाले के समक्ष कुतर्क गढ़कर आत्म-प्रवंचना से ग्रस्त हो जाते हैं, जिससे हम आगे बढ़ने के बजाय पीछे रह जाते हैं।

यह मानसिक स्थिति हमें अंदर से अधिक दबाव और तनाव के साये में रोके रहता है, क्योंकि हम हर समय अपनी कृत्रिम छवि बनाए रखने की आभासी कोशिश करते रहते हैं, बिना यह सोचे कि हमारे व्यक्तित्व की अच्छाई की कसौटी पर कैसा आकलन किया जा रहा है।

अहं के वहम का शिकार होने पर हम दूसरों से सीखने की प्रवृत्ति और क्षमता भी खो देते हैं, क्योंकि यह हमें निष्पक्ष वैचारिक चिंतन धुरी से अलग कर देता है। सवाल यह है कि अहं यानी मिथ्या मर्यादा की कमजोर कड़ी को धीरे-धीरे नियंत्रित करते हुए उसे समूल नष्ट कैसे किया जाए।

इसके लिए आत्मावलोकन एक प्रभावकारी मानसिक अवस्था मानी गई है, जहां इस प्रवृति के एक-एक तार को तोड़ने की जरूरत है। हालांकि यह एक जटिल और धैर्यपूर्ण अभ्यास है, लेकिन प्रबल इच्छाशक्ति के सहारे इससे निवारण के यत्न किए जा सकते हैं।

हर इंसान के मस्तिष्क कोश में असीम क्षमताएं निहित हैं, जिसके सकारात्मक गुण से व्यक्ति अपने भीतर व्याप्त अहं के कणों को बाहर निकालने में सफल हो सकता है। इस चेष्टा से व्यक्ति खुद को शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक तौर पर उन्नत करने का अतिरिक्त गुण भी विकसित करने की सामर्थ्य दिखा सकता है।

जब हम अपने विचारों और मन पर नियंत्रण करने का अभ्यास शुरू करना चाहते हैं, तो बाह्य भौतिक उपसर्गों से निवृत्ति पाना भी प्रारंभ कर लेते हैं। यह सिलसिला हमें अपने व्यक्तित्व में अनुकूल क्षमता के स्रोत ढूंढ़ने में सहायक होता है।

आज जब कृत्रिम बुद्धिमता के नूतन संस्करण में हमारे जीवन की गतिविधियां तीव्र रूप में सम्मिलित हो रही हैं, तो पुरखों द्वारा निर्मित नैसर्गिक मानवीय प्रवृत्तियों के कुछ भूले-भटके सूत्रों में से अहं जैसे प्रतिकूल सूत्र को विसर्जित करने का प्रयास करें। इससे हमारे सामाजिक ताने-बाने के तत्त्वों की पुनर्स्थापना के द्वार खुल सकेंगे।