आज का मनुष्य बाहरी रूप से जितना व्यस्त है, भीतर से उतना ही खाली और थका हुआ महसूस करता है। सुबह से रात तक भागदौड़ है काम की, जिम्मेदारियों की, अपेक्षाओं की। हर कोई कुछ न कुछ साबित करने में लगा है- अच्छा कर्मचारी, अच्छी पत्नी, अच्छी मां, अच्छा पति या पिता या फिर बेटा या फिर सफल व्यक्ति। इस कोशिश में आदमी धीरे-धीरे खुद से दूर होता चला जाता है। उसे लगता है कि उसकी कीमत उसके पद, उसकी सफलता, दूसरों की स्वीकृति से तय होती है।
ऐसे समय में एक सूत्र वाक्य ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ एक पुराने ग्रंथ का वाक्य नहीं, बल्कि आज के जीवन के लिए गहरी और जरूरी समझ बन सकता है। इसका सीधा और सरल अर्थ है, मैं केवल यह शरीर, यह नाम या यह पहचान नहीं हूं। मैं वह चेतना हूं, जो इन सबको जान रही है। अक्सर लोग इस वाक्य को गलत अर्थों में लेते हैं, मानो यह अहंकार को बढ़ाने वाली बात हो। जबकि सच्चाई यह है कि यह अहंकार को गलाने वाला सूत्र है। इसका अर्थ यह नहीं कि ‘मैं सबसे बड़ा हूं या भगवान हूं’, बल्कि यह कहता है कि ‘मैं खुद को जितना छोटा समझ रहा हूं, उससे कहीं अधिक व्यापक हूं।’
आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम खुद को बहुत सीमित दायरों में बांध लेते हैं। कोई बात बिगड़ जाए, तो लगता है कि मैं ही गलत हूं। कोई असफलता मिले तो लगता है कि मैं ही नाकाम हूं। कोई रिश्ता टूटे, तो लगता है कि मेरी ही कमी है। अहम् ब्रह्मास्मि की समझ धीरे-धीरे यह सिखाती है कि जीवन में घटने वाली हर घटना ‘मैं नहीं हूं’। मैं वह हूं, जो इन घटनाओं को देख रहा है, झेल रहा है, उनसे सीख रहा है। यह छोटा-सा फर्क मन को बहुत हल्का कर देता है। जब व्यक्ति यह समझने लगता है, तो उसकी प्रतिक्रियाएं बदलने लगती हैं।
‘अहम् ब्रह्मास्मि’ क्या सिखाता है?
आज हम छोटी-छोटी बातों पर बहुत जल्दी आहत हो जाते हैं। कोई ऊंची आवाज में बोल दे, कोई अनदेखा कर दे, कोई अपेक्षा पूरी न करे, तो भीतर उथल-पुथल मच जाती है। अहम् ब्रह्मास्मि का भाव यह सिखाता है कि हर बात को सीधे अपने अस्तित्व से मत जोड़ो। जो कहा गया, जो किया गया, वह सामने वाले की स्थिति और समझ का परिणाम भी हो सकता है। यह सोच व्यक्ति को हर समय लड़ने की हालत से बाहर निकालती है।
यह सूत्र असफलता और सफलता दोनों को देखने का नजरिया बदल देता है। आज सफलता को ही जीवन का मापदंड बना लिया गया है। सफल हो, तो सम्मान, असफल हो तो तिरस्कार- दूसरों की ही नहीं, अक्सर खुद की नजरों में भी। जब व्यक्ति यह समझने लगता है कि मैं अपनी उपलब्धियों से बड़ा हूं, तो सफलता उसे घमंडी नहीं बनाती और असफलता उसे तोड़ती नहीं है। वह कोशिश करता है, मेहनत करता है, लेकिन खुद को परिणाम से पूरी तरह नहीं बांधता। इससे जीवन में स्थिरता आती है।
रिश्तों में यह समझ और भी जरूरी हो जाती है। बहुत से रिश्ते इसलिए बोझ बन जाते हैं, क्योंकि हम सामने वाले से यह उम्मीद करने लगते हैं कि वह हमें खुश रखे, समझे, पूरा करे। जब ऐसा नहीं होता, तो शिकायतें बढ़ती हैं, दूरी आती है। यह समझने की जरूरत है कि हमारी खुशी की पूरी जिम्मेदारी किसी और पर नहीं डाली जा सकती। जब व्यक्ति भीतर से थोड़ा संतुलित होता है, तो वह रिश्तों में कम मांगता है और ज्यादा समझता है। इससे रिश्तों में सहजता आती है।
कामकाजी जीवन में यह दृष्टि बहुत काम आती है
कामकाजी जीवन में भी यह दृष्टि बहुत काम आती है। कार्यालय में तुलना, प्रतिस्पर्धा और असुरक्षा आज आम बात है। हर कोई किसी से आगे निकलने की होड़ में है। जब व्यक्ति खुद को केवल पद या पहचान से नहीं जोड़ता, तो आलोचना उसे भीतर तक नहीं हिला पाती। वह अपनी क्षमता के अनुसार काम करता है, बिना लगातार डर में जिए। इससे न सिर्फ मानसिक तनाव कम होता है, बल्कि काम की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या यह सोच व्यवहार में सचमुच काम करती है या सिर्फ किताबों तक सीमित है। सच यह है कि यह कोई जादू नहीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होने वाली समझ है। जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए रोज कुछ न कुछ करना पड़ता है, वैसे ही मन के लिए भी अभ्यास चाहिए। दिन में कुछ पल खुद को याद दिलाना कि मैं इस भावना, इस डर, इस परिस्थिति से बड़ा हूं। यही अभ्यास है। धीरे-धीरे मन इस दिशा में ढलने लगता है। यह सोच जीवन से भागने की शिक्षा नहीं देती। न ही यह कहती है कि सब कुछ छोड़कर अलग हो जाओ। यह कहती है कि जीवन में रहा जाए, हम जिम्मेदारियां निभाएं, लेकिन भीतर से खुद को उनसे पूरी तरह बांधें नहीं। दुख आए तो उसे महसूस करें, लेकिन उसे अपनी पूरी पहचान नहीं बनने दें। यही आंतरिक स्वतंत्रता है।
आज जब मानसिक तनाव, अवसाद और अकेलेपन की समस्याएं बढ़ रही हैं, तब केवल बाहरी समाधान पर्याप्त नहीं है। हमें भीतर की दिशा में भी देखना होगा। खुद को सही संदर्भ में समझने की सीख भीतर की ओर देखने की प्रेरणा देता है। यह हमें याद दिलाती है कि हम सिर्फ परिस्थितियों का शिकार नहीं हैं, बल्कि वह चेतना हैं जो हर परिस्थिति को समझ सकती है। वास्तव में यह सीख जीवन को देखने का एक गहरा और मानवीय तरीका है। यह व्यक्ति को विनम्र बनाती है, क्योंकि इससे अहंकार कम होता है और यह मजबूत भी बनाता है, क्योंकि भीतर एक स्थिर आधार मिल जाता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यदि यह भाव थोड़ा-सा भी उतर जाए, तो जीवन बोझ नहीं, बल्कि समझ के साथ जिया गया अनुभव बन सकता है।
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