हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहां दृश्यता खुद एक मूल्य बन गई है, और अस्तित्व धीरे-धीरे ‘होने’ से हटकर ‘दिखाई दे’ की शर्त पर टिक गया है। अब केवल उपस्थित होना पर्याप्त नहीं। व्यक्ति, विचार और रचना- तीनों को निरंतर प्रमाणित होना पड़ता है। यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आधुनिक चेतना की एक गहरी पुनर्रचना है, जहां ‘होना’ अब ‘दृश्य होना’ बनता जा रहा है।
यह परिवर्तन केवल बाहरी नहीं, बल्कि गहराई में जाकर यह तय करता है कि मनुष्य खुद को कैसे समझे। पहले पहचान भीतर से बनती थी और धीरे-धीरे समाज में प्रकट होती थी। अब पहचान पहले दिखाई देती है और धीरे-धीरे भीतर बसने लगती है। उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी की उपलब्धि अब केवल उसके ज्ञान का प्रमाण नहीं रहती, बल्कि उसके ‘प्रोफाइल’ की वृद्धि का माध्यम बन जाती है। इसी प्रकार किसी लेखक की रचना पहले पढ़ी नहीं जाती, बल्कि पहले ‘शेयर’ और ‘रीच’ के आंकड़ों में देखी जाती है।
जीवन एक सतत प्रस्तुति बन गया है
इस परिवर्तन ने मनुष्य के आत्मबोध को भीतर से बाहर की ओर मोड़ दिया है। जीवन अब एक आंतरिक यात्रा नहीं, बल्कि एक सतत प्रस्तुति बन गया है, जहां व्यक्ति जीता है और उसी क्षण खुद को देखता भी है। यह स्थिति आधुनिक मनोविज्ञान में ‘सेल्फ आब्जेक्टिफिकेशन’ जैसी प्रवृत्ति से जुड़ती है, जहां व्यक्ति स्वयं को एक दर्शनीय वस्तु की तरह देखने लगता है।
सोशल मीडिया इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। एक साधारण अनुभव, जैसे किसी मित्र से मिलना, किसी स्थान की यात्रा, या किसी भोजन का स्वाद- अब अपने मूल रूप में नहीं रहता। उसका पहले एक ढांचा बनता है, फिर ‘पोस्ट’, फिर उसे देखने वालों का आंकड़ा।
अनुभव का मौन पक्ष पीछे छूट जाता है। यहां एक सूक्ष्म विडंबना जन्म लेती है- जितना अधिक जीवन साझा होता है, उतना ही उसका मौन क्षीण होता जाता है। कभी चिंतन और आत्मनिर्माण की प्रयोगशाला रहा एकांत अब खालीपन या ‘अनुत्पादक समय’ लगने लगा है। परिणामस्वरूप मनुष्य के भीतर एक विभाजन गहरा होता है- एक अनुभव करने वाला स्व और दूसरा अनुभव को संपादित करने वाला स्व।
इसी प्रवृत्ति का विस्तार कला, साहित्य और विचार-जगत तक पहुंचता है, जहां रचना का मूल्य क्रमश: उसकी दृश्यता, पहुंच और ब्रांड-छवि से निर्धारित होने लगता है। आज यह असामान्य नहीं कि कोई कविता अपने अर्थ से पहले इंस्टाग्राम-स्वरूप में पहचानी जाए, या कोई चित्र अपनी कलात्मक गहराई से पहले ‘वायरल शेयर’ से जाना जाए।
लेखक और कलाकार केवल सर्जक नहीं
इस स्थिति में लेखक और कलाकार केवल सर्जक नहीं रहते, बल्कि अपनी ही दृश्यता के प्रबंधक बन जाते हैं। कई समकालीन लेखक अब अपनी लोक-छवि और डिजिटल उपस्थिति को ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानने लगे हैं। इस बदलाव ने रचना और रचयिता के संबंध को उलट दिया है। जहां पहले रचना व्यक्ति को परिभाषित करती थी, अब व्यक्ति रचना की दृश्यता को परिभाषित करता है।
इसके समांतर, प्रकृति और श्रम एक भिन्न अस्तित्व-तर्क प्रस्तुत करते हैं। वृक्ष बिना किसी दर्शक के फल देता है। यहां उत्पादन और प्रदर्शन अलग हैं। नदी बिना किसी स्वीकृति के बहती है और मिट्टी बिना किसी प्रशंसा के जीवन को धारण करती है। हिमालय की बर्फ, जो किसी ‘दृश्यता-तंत्र’ का हिस्सा नहीं, फिर भी नदियों का स्रोत है- यह मौन उत्पादन का उदाहरण है।
किसान का जीवन मौसम, बीज और मिट्टी के साथ एक गहरा संवाद करता है, पर उसका श्रम अंतिम रूप में केवल ‘मंडी मूल्य’ में दिखाई देता है। दिल्ली या मुंबई की मेज पर जो रोटी रखी है, वह दृश्य है, लेकिन उसके पीछे का श्रम अदृश्य है। इसी प्रकार, निर्माण स्थल पर काम करने वाला श्रमिक उस इमारत का निर्माता है, पर इमारत की पहचान में वह अनुपस्थित है। यह ‘अदृश्य श्रम’ आधुनिक सभ्यता की संरचना का आधार है।
महात्मा गांधी ने सत्य को साधना बनाया
महात्मा गांधी ने सार्वजनिक जीवन को आत्म-प्रदर्शन नहीं, बल्कि सत्य की साधना बनाया, जहां चरखा केवल प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का नैतिक संकेत था। भगत सिंह ने अपने लेखों में स्पष्ट किया कि व्यक्ति क्षणिक है, पर विचार स्थायी। इसलिए उन्होंने अपने जीवन को भी विचार के विस्तार में बदल दिया।
इसी संदर्भ में आधुनिक गुमनाम कलाकार बैंक्सी, एलेना फेरांटे और थामस पिंचन एक अलग प्रकार की चुनौती प्रस्तुत करते हैं। बैंक्सी की कला इसलिए प्रभावशाली है, क्योंकि वह हस्ताक्षर से मुक्त है। उसका अर्थ व्यक्ति से नहीं, स्थान और संदर्भ से जन्म लेता है।
एलेना फेरांटे का साहित्य यह प्रश्न उठाता है कि क्या लेखक का जीवन उसके लेखन से अधिक महत्त्वपूर्ण है। थामस पिंचन की चुप्पी साहित्य में इस तथ्य को उजागर करती है कि अनुपस्थिति भी एक संरचना बन सकती है। मगर यह प्रतिरोध भी स्थिर नहीं रहता। दृश्यता की संस्थाएं- मीडिया, बाजार और जन-जिज्ञासा गुमनामी को भी एक नई कथा में बदल देती हैं।
उदाहरण के लिए, किसी अनाम कलाकार की कृति जितनी रहस्यमयी होती है, उतनी ही तेजी से वह मीडिया-चर्चा का विषय बन जाती है। इस प्रकार गुमनामी भी आखिर दृश्यता के तंत्र में फिर समाहित हो जाती है। अनुपस्थिति भी एक प्रकार की उपस्थिति बन जाती है।
प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य उस अदृश्य श्रम, मौन सृजन और बिना प्रत्याशा के दिए जाने वाले योगदान को देखने की दृष्टि विकसित कर पाया है, जिस पर उसका पूरा दृश्य संसार टिका हुआ है, या उसकी दृष्टि केवल उसी तक सीमित हो गई है, जो दिखता है, मापा जा सकता है और साझा किया जा सकता है। यही वह गहरा तनाव है जिसमें आधुनिक सभ्यता स्थित है- दृश्यता और मौन के बीच, प्रदर्शन और अस्तित्व के बीच, तथा पहचान और विसर्जन के बीच एक निरंतर खिंचा हुआ, लेकिन जीवित संतुलन।
