काश चुनावों का मौसम थोड़ा और लंबा होता। उसके खत्म होते ही प्रधानमंत्री ने चेताया हमको कि अच्छे दिन अभी रूई की बत्ती की तरह उड़ गए हैं और बुरे दिनों की तैयारी हम सबको करनी होगी। एक साल तक रहेंगे मायूसी और तंगी भरे ये दिन, जिनमें न हम किसी खुशी के मौके पर सोना खरीद सकेंगे, न विदेश यात्राएं कर सकेंगे, न कोई दूसरे तरीके से विदेशी मुद्रा इस्तेमाल कर सकेंगे। ऊपर से आग्रह यह भी किया प्रधानमंत्री ने कि जहां तक हो सके, हम घर से काम करने का प्रयास करें और अगर बाहर जाना ही है कहीं, तो निजी गाड़ियों के बदले बस, टैक्सी या मेट्रो से जाएं। निजी गाड़ियों का इस्तेमाल करना ही है, तो ‘कारपूलिंग’ करें। यह सुझाव हैं मध्यवर्ग लोगों के लिए।
गरीब किसानों के लिए सुझाव यह था प्रधानमंत्री का कि कीमती खाद, जिसका आयात विदेशों से होता है, उसको त्याग कर खेती पुराने तरीकों से करना शुरू करें। जिस तरह विदेश से आयात की हुई महंगी रासायनिक खाद के आने से पहले होती थी। प्रधानमंत्री शायद भूल गए यह सुझाव देते हुए कि वह ऐसा दौर था, जब भारतीय किसानों का उत्पाद इतना थोड़ा था कि हमको विदेशों से अनाज मंगवाना पड़ता था। मेरी उमर के लोग भूले नहीं हैं वह दौर जब समंदर के रास्ते आता था गेहूं और धान।
प्रधानमंत्री शायद यह भी भूल गए थे कि श्रीलंका में जब राजपक्षे बंधु राज करते थे, तो उन्होंने भी अपने किसानों को यही सुझाव दिया था और परिणाम यह हुआ कि अनाज के दाम इतने बढ़ गए थे कि क्रांति पर उतर आए थे श्रीलंका के लोग। याद कीजिए वे नजारे, जिनमें आम लोगों ने राष्ट्रपति के महल में घुस कर तोड़फोड़ और लूटपाट की थी। यह वर्ष 2022 की बात है सो शायद आपको भी याद होगा कि राष्ट्रपति राजपक्षे को देश छोड़ कर भागना पड़ा था। विनम्रता से प्रधानमंत्री से आग्रह करती हूं कि यह वाला सुझाव वापस ले लें।
सुझाव मेरी तरफ से और भी हैं, बिल्कुल वैसे जैसे प्रधानमंत्री ने अपने काफिले की गाड़ियां कम करने का फैसला किया है। उनको अब अपने मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को भी आदेश देना चाहिए कि पेट्रोल-डीजल की किल्लत इतनी है अब कि उनको कोशिश करनी चाहिए कि अपने काफिले को बंद कर एक ही गाड़ी में अपने सुरक्षा कर्मियों को बिठा कर सफर करें। भारत में बड़े काफिलों की आदत डाल रखी है हमारे राजनेताओं ने, लेकिन ऐसा विकसित पश्चिमी देशों में नहीं होता है। अक्सर वहां के राजनेता जब अपने घर से दफ्तर जाते हैं, तो उनकी एक गाड़ी होती है, दस नहीं। कई देशों में तो प्रधानमंत्री मेट्रो से जाते हैं। संकट की घड़ी में नेतृत्व की सख्त जरूरत होती है, तो प्रधानमंत्री आप दिखाइए कि सरकारी खर्चा आप कितना कम कर सकते हैं।
मैंने पहले भी कहा है बहुत बार कि विकसित लोकतांत्रिक देशों में जन प्रतिनिधियों को सरकारी कोठियां नहीं मिलती हैं। अपनी तनख्वाह से ढूंढ़ते हैं अपने लिए किराए के आवास। अपनी तनख्वाह से खर्च करते हैं पैसे गैस, फोन, पानी और बिजली पर। ऐसा हमारे देश में इसलिए नहीं हुआ है, क्योंकि नेहरूजी बहुत प्रभावित थे सोवियत संघ से, सो उसकी नकल करने का फैसला किया उन्होंने। रूस और चीन जैसे तानाशाह कम्युनिस्ट देशों में होता यह है कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रहते हैं असली महलों में, जहां पहले रहते थे बादशाह और राजा। जबकि जनता को रहना पड़ता है झुग्गी बस्तियों में।
जब लोकतंत्र नहीं होता है, तो सवाल करने वाले भी नहीं होते हैं। भारत में अंग्रेज जब राज करते थे, तो उन्होंने भी अपने लिए बनाए थे बड़े-बड़े घर, ताकि उनकी शान हम गुलामों में बढ़ जाए। इन मकानों में 1947 में रहने लगे हमारे जन प्रतिनिधि और अब ऐसी आदत पड़ी हुई है शान से रहने की कि कोई बहुत ही साहसी प्रधानमंत्री होगा जो इस आदत को छोड़ सकेगा। आप कर सकते हैं क्या?
संकट की घड़ी में साहस दिखाने की जÞरूरत है। संकट अभी शुरू ही हुआ है। आगे-आगे देखते रहिए होगा क्या। डोनाल्ड ट्रंप चीन गए शी जिनपिंग से मिलने, लेकिन जाने से पहले उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान युद्ध के बारे में वे बात नहीं करना चाहते हैं शी से बावजूद इसके कि इस युद्ध को रोक सकता है कोई तो सिर्फ चीन। सो युद्ध लंबा चलने वाला है। इसका सबसे अधिक नुकसान होने वाला है भारत जैसे देशों में जो पूरी तरह तेल के लिए निर्भर हैं विदेश से आयात पर। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर मंदी छाने के आसार दिख रहे हैं, लेकिन इस मंदी का असली नुकसान हमको देखना पड़ेगा अपने देश में।
प्रधानमंत्री मोदी खुद निकले हुए हैं विदेशी दौरे पर जिसकी योजना शायद बहुत पहले बनाई गई थी, लेकिन वे जानते हैं अच्छी तरह कि उनके मंत्रियों के बच्चे पढ़ते हैं अमेरिका और यूरोप में और गर्मियों के मौसम में मंत्रियों की एक पूरी टोली निकल पड़ती है इन देशों की तरफ। जाते हैं सरकारी काम का बहाना करके, लेकिन असली मकसद है अपने बच्चों से मिलना और उनके साथ सैर-सपाटा करना। अनुमान लगाया जाता है कि मोदी के मंत्रिमंडल में कोई बीस मंत्री ऐसे हैं जिनके बच्चे विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं।
अपनी तरफ से यह कहना चाहती हूं कि मेरी जानकारी में शायद एक भी बड़ा राजनेता या आला अधिकारी नहीं है, जिनके बच्चे किसी महंगे विदेशी कालेज में दाखिल न हुए हों। इनके पास पैसे कहां से आते हैं अपने बच्चों को इतनी महंगी शिक्षा दिलाने के लिए, मैं नहीं जानती। इसकी चर्चा कभी और करेंगे। फिलहाल प्रधानमंत्री संकट की इस घड़ी में उम्मीद है कि आप नेतृत्व और साहस दिखाएंगे।
