संकेत कुमार प्रजापति
4 जून को नई दिल्ली में भारत और यूरोपीय संघ के बीच पहला प्रौद्योगिकी-व्यापार व्यावसायिक मंच संपन्न हुआ। सौ से अधिक कंपनियाँ, नीति-निर्माता, शोधकर्ता और नागरिक समाज के प्रतिनिधि एक छत के नीचे आए। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और डेटा गवर्नेंस पर गहन चर्चा हुई। यह मंच केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं था। यह उस दीर्घकालिक साझेदारी की पहली ठोस अभिव्यक्ति थी जिसकी नींव 2022 में व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की स्थापना के साथ रखी गई थी। और यदि भारत इस अवसर को सजगता से भुनाए, तो यह मंच डिजिटल संप्रभुता की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
वह भू-राजनीतिक क्षण जिसमें यह मंच हुआ
इस मंच को उसके भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से अलग करके नहीं समझा जा सकता। आज विश्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ प्रौद्योगिकी केवल आर्थिक विकास का साधन नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति का सबसे धारदार हथियार बन चुकी है। एक ओर अमेरिका अपनी आंतरिक राजनीति में सिमटता जा रहा है और बहुपक्षीय व्यवस्था से किनारा कर रहा है। दूसरी ओर चीन सेमीकंडक्टर से लेकर पनडुब्बी केबल तक, वैश्विक डिजिटल ढाँचे पर अपनी पकड़ मज़बूत करता जा रहा है।
इस दोहरे दबाव में यूरोपीय संघ ने “रणनीतिक स्वायत्तता” की अवधारणा को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बनाया है। वह चाहता है कि तकनीकी आपूर्ति-श्रृंखलाओं में वह न अमेरिका पर एकतरफा निर्भर रहे, न चीन पर। इसी खोज में भारत यूरोप के लिए एक अपरिहार्य साझेदार बनकर उभरा है। और ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब भारत ने सिद्ध किया कि वह रणनीतिक दबाव में भी स्वायत्त निर्णय लेने में सक्षम है, तो यूरोप की नज़र में उसका कद और ऊँचा हुआ।
यूरोप के साथ साझेदारी का संदर्भ
यूरोपीय संघ की प्रौद्योगिकी कूटनीति की अपनी एक विशिष्ट शैली है। जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन, डिजिटल मार्केट्स एक्ट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्ट के माध्यम से ब्रसेल्स ने वैश्विक डिजिटल मानदंड-निर्माण में एक अग्रणी भूमिका निभाई है। इसे शोधकर्ता “ब्रसेल्स प्रभाव” कहते हैं। अंतर-संचालनीयता, साझा मानक, परस्पर मान्यता जैसे प्रस्ताव सुनने में सहयोगात्मक लगते हैं और वे हैं भी, किंतु उनका पूरा लाभ तभी मिलता है जब भारत उनमें अपनी शर्तों पर भागीदारी करे। पहली बार भारत एक ऐसी स्थिति में है जहाँ वह केवल नियमों का अनुपालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों को आकार देने वाला भागीदार बन सकता है।
भारत को क्या करना चाहिए
अवसर की पहचान पर्याप्त नहीं है। भारत को इस साझेदारी में कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।
पहली बात, भारत को अपने डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे को साझेदारी की केंद्रीय शर्त के रूप में स्थापित करना चाहिए। एकीकृत भुगतान अंतरापृष्ठ, आधार और डिजिलॉकर जैसे नवाचार आज वैश्विक दक्षिण के सत्तर से अधिक देशों की रुचि का केंद्र हैं। जी-20 की अध्यक्षता में भारत ने इस ढाँचे को विकास के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया था, अब इसे व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की बातचीत में सौदेबाज़ी के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करना होगा। यह “ब्रसेल्स प्रभाव” का भारतीय उत्तर होगा, एक संभावित “नई दिल्ली प्रभाव” की शुरुआत।
दूसरी बात, सेमीकंडक्टर सहयोग को केवल बाज़ार-पहुँच तक सीमित नहीं रखना चाहिए। भारत को चिप-अभिकल्पन और अनुसंधान में संयुक्त केंद्रों की माँग करनी चाहिए ताकि प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण वास्तविक हो, न कि केवल उत्पादन का ठेका। जो देश केवल निर्माण करता है, वह मूल्य-श्रृंखला के निचले पायदान पर रहता है। भारत को ऊपर की ओर बढ़ना होगा।
तीसरी बात, डेटा गवर्नेंस के प्रश्न पर भारत को अपनी स्वतंत्र आवाज़ बनानी होगी। जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन की छाया में बना डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम भारत की परिस्थितियों के अनुरूप ढला है। यूरोप के साथ डेटा प्रवाह की व्यवस्था बनाते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय नागरिकों के डेटा पर संप्रभुता बनी रहे।
निष्कर्ष: बहुध्रुवीय विश्व में भारत की भूमिका
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद केवल दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच का सौदा नहीं है। यह एक बहुध्रुवीय डिजिटल विश्व-व्यवस्था की नींव रखने का प्रयास है जहाँ न कोई एक देश तकनीकी मानदंडों पर एकाधिकार जमा सके, न कोई एक आपूर्ति-श्रृंखला पर। यूरोप की नियामक विशेषज्ञता और भारत की नवाचार क्षमता मिलकर एक ऐसा डिजिटल भविष्य रच सकते हैं जो अमेरिकी एकाधिकार और चीनी राज्य-नियंत्रण दोनों का एक जनतांत्रिक विकल्प हो।
4 जून की बैठक एक शुरुआत है। किंतु शुरुआत तभी सार्थक होती है जब उसके पीछे एक सुचिंतित रणनीति हो। भारत के पास वह रणनीति बनाने की क्षमता है, इच्छाशक्ति और दिशा-बोध की दरकार है।
(डिस्क्लेमर: लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के यूरोपीय अध्ययन केंद्र में पीएचडी शोधार्थी हैं और डिजिटल शासन एवं यूरोपीय संघ-भारत संबंधों पर शोध करते हैं। यह उनके निजी विचार हैं। लेख में प्रस्तुत तथ्यों और आंकड़ों के लिए लेखक जिम्मेदार हैं। जनसत्ता का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)
