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बेबाक बोलः कुश्ती-ए-कुर्सी- राज-राग

केंद्र की सत्ता के भगवा रंग में रंगते ही कालाधन जुमला हो गया। यूपी-पंजाब में चुनावी जंग के मद्देनजर ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ जंबो कैबिनेट में बदल गई। असहिष्णुता की जंग में कागजी क्रांति का जुमला देने वाली सरकार का अहम महकमा छात्रों, शिक्षकों के साथ पूरी बौद्धिक जमात के खिलाफ नजर आया। रोहित वेमुला सांस्थानिक हत्या के प्रतीक बन गए, जेएनयू का मुद्दा विदेशों तक में गूंजा...और इसके साथ ही दो साल बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल। जब मोदी सरकार का सबसे मुखर चेहरा फजीहत की तस्वीर बन गया तो सरकार ने इस चेहरे को बदलने में ही भलाई समझी। कार्यकाल का महज आधा सफर तय करने पर मोदी सरकार के बदले सुर पर पढ़ें इस बार का बेबाक बोल।

पिछले दो सालों में मोदी सरकार के दो सबसे चर्चित विषय थे – विदेश यात्रा और एचआरडी मंत्रालय की मुखिया स्मृति ईरानी। मोदी के विदेश दौरों का हासिल तो अभी उल्लेखनीय नहीं। लेकिन हाल ही में अमेरिका और चीन के अखबारों ने स्मृति ईरानी को आश्चर्यजनक तरीके से तवज्जो दी। अमेरिका के अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने ईरानी को सबसे ज्यादा फजीहत झेलने वाली नेता बताया। इसी तरह चीन के अखबार चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने भी ईरानी को सबसे ज्यादा विवादित नेता बताया। तो दो साल में मोदी के विदेश दौरों के बरक्स यह है दुनिया के दो महाशक्ति माने जाने वाले देशों के मीडिया में मोदी सरकार की तस्वीर।

महज दो साल पहले ही देश की सत्ता पर सशक्त बहुमत के साथ काबिज हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का नारा दिया जो इस हफ्ते जुमला साबित हुआ। इस नारे के हासिल के तौर पर राज्यों में हरियाणा व महाराष्ट्र की शुरुआती सफलताओं को छोड़ दें तो भारतीय जनता पार्टी को अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद पहले दिल्ली और फिर बिहार में करारी शिकस्त मिली। उसके बाद पांच राज्यों में चुनाव हुए और सिवा असम के बाकी सब जगह समर्पण करना पड़ा। और अब देश के सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर पर हैं। पंजाब भी है। लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने रिकार्ड कामयाबी हासिल की थी। पार्टी के इतिहास में और मौजूदा समय में किसी नेता को ऐसा या उससे मिलता-जुलता कोई ख्वाब देखने की हिम्मत भी नहीं हुई कि उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें भगवा रंग में रंग जाएं। ऐसा तो बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी नहीं हुआ।
पंजाब में भाजपा पुराने सहयोगी अकाली दल के साथ सत्ता में है। पर लोकसभा चुनाव में जीत के बाद भाजपा की पंजाब इकाई ने अपने वरिष्ठ सहयोगी अकाली दल को ही आंखें तरेरनी शुरू कर दी। ‘हमें किसी की जरूरत नहीं’ या ‘हम अकेले ही चुनाव लड़ेंगे’ का राग अलापना शुरू कर दिया था। लेकिन बिहार और दिल्ली की दुर्दशा के बाद पार्टी का यह बड़बोला तबका दुबक गया। हालांकि, अकाली दल पर दबाव बनाने के लिए अभी भी गाहे-बगाहे ऐसे सुर जोर पकड़ते रहते हैं। आज के हालात में ऐसा लगता नहीं कि भाजपा पंजाब में ऐसा कोई रुख अपनाएगी। अगर अपनाती है तो पार्टी का मुंह की खाना महज वक्त की बात होगी।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने दूसरे दलों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं। पहला शिकार अपना दल बना है। यहां पार्टी ने अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल को महज इसलिए मंत्रिमंडल में लिया कि उसे उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों को लुभाना है। दीगर है कि अपना दल के नेतृत्व का कहना है कि अनुप्रिया को तो पहले ही पार्टी से बाहर किया जा चुका है। इसके साथ ही ‘अपना दल’ के एक धड़े ने राजग गठबंधन से अलग होने का एलान कर दिया है।

मुद्दे की बात यह है कि ‘पार्टी विद डिफरेंस’ और आदर्शवाद का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा में आखिर चल क्या रहा है। किसी सहयोगी दल के नेता को मंत्रिमंडल में चुनने से पहले पार्टी को विश्वास में न लेना क्या उचित है? पार्टी के अंदर तानाशाही रवैया उसका आंतरिक मसला हो सकता है, लेकिन सहयोगी दलों के साथ भी ऐसा करना क्या सही है? लग तो यही रहा है कि अपनी मौजूदा सर्वोच्च और ताकतवर स्थिति के कारण भाजपा अपने सहयोगी दलों पर अपनी मनमानी भी चला रही है। लेकिन यह पार्टी के सत्ता में रहने तक ही जारी रह सकता है। हालांकि अभी शिवसेना उसका मुखर विरोध करती है। लेकिन अपने प्रचंड बहुमत के बल पर भाजपा आज उस शिवसेना को आंखें दिखा रही है, जिसके समर्थन के लिए महाराष्ट्र में उसकी चिरौरी करती थी। महाराष्ट्र में शिवसेना का जलवा ही है कि अपने उसी उग्र तेवर के साथ ही वह प्रदेश सरकार में बनी हुई है और भाजपा के पास उसे सुनने के सिवा कोई रास्ता नहीं है।

मंत्रिमंडल में सदस्यों को चुनने में भी पूरी मनमानी दिखती है। कमजोर को मारा गया है। पार्टी के जिन बड़बोले नेताओं पर गाज गिरने की संभावना जताई गई थी, वे साफ बच निकले। जबकि बाकी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मंत्रिमंडल में गिरिराज किशोर, साध्वी निरंजन ज्योति और ऐसे ही दूसरे कट्टर और बड़बोले नेताओं का बने रहना इस बात का द्योतक है कि पार्टी कट्टरवाद की अपनी छवि से उतनी भी परेशान नहीं। सच यह है कि ‘आदर्शवादी भाजपा’ सत्ता की कुर्सी बचाए रखने के लिए जाति, धर्म और समुदाय का गणित बिठाने में जुटी है जैसी कई और पार्टियां करती हैं। मसलन, पिछड़ी जातियों को लुभाना है तो अनुप्रिया पटेल को ले लें और ब्राह्मणों को अपनी तरफ खींचना है तो महेंद्र नाथ पांडे को। सिखों के लिए तो एसएस आहलुवालिया की सूरत में ऐसे नेता को चुना गया है जिनका पंजाब से शायद इतना ही वास्ता है कि वे सिख हैं। मंत्रिमंडल के बाकी चयनित चेहरे भी कुछ ऐसे ही हैं।
मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के मंत्रालय में फेरबदल शायद इस बार के बदलाव का सबसे अहम पहलू है। पिछले दो साल में मोदी सरकार का कोई महकमा और मंत्री सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा तो वह स्मृति ईरानी और उनका महकमा है। शैक्षिक परिदृश्य में आरएसएस के एजंडे को लागू करने के आरोपों से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों में अलग-अलग तरह के विवादों के कठघरे में सीधे वे खड़ी हुर्इं। खास तौर पर हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के निलंबन, परिसर से निष्कासन और रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले से जिस तरह उनका नाम जुड़ा, उससे पीछा छुड़ाना पूरी सरकार के लिए एक असुविधा का मामला हो गया था। जेएनयू के मुद्दे पर भी सरकार नाकाम सी दिखी।
आज भी रोहित वेमुला की मौत को एक सांस्थानिक हत्या के तौर पर देखा जाता है और इसमें हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति अप्पा राव की भूमिका के साथ-साथ स्मृति ईरानी के पत्रों की ओर भी उंगली उठाई जाती है। हालत यह है कि अब दलित-संघर्ष का प्रतीक बन चुके रोहित वेमुला की खुदकुशी के लिए समूची भाजपा को कहीं भी सहज रहने में असुविधा होती है। इसी छाया में उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरना शायद उतना मुफीद नहीं होता। इसलिए दलित-विरोधी की छवि को हलका करने का आसान रास्ता शायद यह लगा कि स्मृति ईरानी को अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहने वाला महकमा दिया जाए, ताकि विवाद से उपजी तल्खी थोड़ी कम हो और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उनका उपयोग हो सके।
कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा अब कांग्रेसवादी हो रही है। यों भी, अब ऐसे आरोप आम हैं कि मोदी दरअसल कांग्रेस की नीतियों को ही आगे बढ़ा रहे हैं। पार्टी के अपने अरुण शौरी या बाहर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी का भी यही कहना है। शौरी ने कहा था कि मोदी सरकार में कांग्रेस के साथ ‘काऊ’ (गाय) और जुड़ गया है। जबकि येचुरी का कहना है कि मोदी उदारीकरण की दौड़ में मनमोहन सिंह को कब का पछाड़ चुके हैं। अगर कभी सीबीआइ का इस्तेमाल करके विरोधियों को ठिकाने लगाने के आरोप भी सिर चढ़े तब तो कांग्रेस और भाजपा में फर्क करना भी मुश्किल हो जाएगा।

दूसरी कई पार्टियों जैसी संकीर्ण सोच के साथ सरकार चला कर भाजपा ने अलग स्थान और अलग पहचान का दावा सत्ता के पहले दो वर्ष में ही खो दिया है। पार्टी जिस तरह से देश के इतिहास के पुनर्लेखन के प्रयास में जुटी है, उससे साफ है कि वह लोगों को विश्वास में लेकर अपनी विभूतियों का महिमामंडन करने के बजाए उन्हें थोपने में ज्यादा विश्वास रखती है। अतीत में जो हुआ, लेकिन जिस तरह से सरकार चल रही है, उससे पार्टी को उच्च नैतिक रुख लेने का अधिकार तो बिल्कुल नहीं रह गया है। बिहार में जातिवाद का खुला खेल खेला तो उत्तर प्रदेश से पहले सिंहस्थ कुंभ में दलितों के साथ स्नान करके और उसके बाद अन्य जगहों पर भोजन करके वही किया जो सारे दल करते आए हैं।

अब बात पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र पर। ऐसा नहीं है कि इस मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर पार्टी के अंदर असंतोष नहीं होगा। असंतोष जबर्दस्त होगा, लेकिन क्या किसी की जुर्रत है कि वह इस असंतोष को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने बयान करे? ऐसे ही तानाशाही रवैए के साथ ही कई दूसरे राज्यस्तरीय राजनीतिक दल चलते हैं तो फिर उन पर एतराज क्यों? ज्यादातर राज्यस्तरीय दल परिवार-पार्टी हो चुके हैं। भाजपा में कई स्तर पर यह हो चुका है। बस इस संक्रमण का केंद्रीय नेतृत्व में आना बाकी है।

बहरहाल, मोदी ने अपने दूसरे ही विस्तार में ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ के अपने ही सिद्धांत को रौंदते हुए 78 मंत्री बना कर जंबो मंत्रिमंडल रच दिया। नैतिक मूल्यों के ऊंचे भवन के दावे का क्षरण ऐसे ही शुरू होता है। यह तय है कि उसमें घुन लग चुकी है। देखना यह है कि अगले तीन वर्ष में यह भवन कब भरभरा कर गिरता है। अब ऐसी आशंका खड़ी हो रही है कि कहीं भाजपा ऐसे चेहरे के साथ न सामने आ जाए कि कांग्रेस बहुत पाक-साफ दिखने लगे।
सवाल यह भी है कि इसके बाद भी यूपी और पंजाब बिहार की ही तर्ज पर ‘लुट’ गए तो क्या सरकार यू-टर्न लेगी? ऐसा हो भी सकता है और शायद अब भाजपा के लिए यह आसान रास्ता है। ठसके से यू-टर्न का एलान अमित शाह ने कर दिया था, जब उन्होंने कालेधन की वापसी की मांग को भाजपा का ‘चुनावी जुमला’ बता कर खारिज कर दिया था।

मौजूदा सरकार ने अपने कार्यकाल के सफर का अभी आधा रास्ता ही तय किया और हालात ऐसे हो गए हैं। सरकार अपने चुनावी जोड़-तोड़ में लगी है और आम आदमी को कोई राहत नहीं। कीमतों पर कोई काबू नहीं। यह सच है कि पांच मंत्रियों को इसलिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया कि वे काम नहीं करते। लेकिन क्या बाकी के सभी मंत्रियों को काम करने की इजाजत है? शायद नहीं। वे सब भी उतना ही काम करते हैं, जितना कि ऊपर से इशारा होता है। जिन्हें इशारा नहीं होता, वे इशारे का इंतजार करते हैं। ऐसे में योग्यता के इस आडंबर पर सवाल उठेंगे ही।
सरकार की बैठकों में मुद्दों पर उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी इस पर कि किसके कितने समर्थक हैं। उस दौरान शान इस बात की कि ‘मेरे तो इतने हैं’। जिनकी सोशल मीडिया पर कम हाजिरी है, उन्हें बढ़ाने की हिदायत होती है और जिनकी ठीक है, उन्हें और बढ़ाने की। अगर संख्या की इसी सवारी के साथ सरकार में आना है और उसी के दम पर चलना है तो ब्रिटेन का जनमत संग्रह याद रखने की जरूरत है। यही संख्या जरा-सी ही ऊपर-नीचे होकर कभी भी सत्ता से निकासी करा सकती है।

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