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कृषि कानून पर नहीं झुक रही सरकार, बोले टिकैत- मेरी पत्नी ने किसी और को वोट दिया, पर मैंने BJP को दिया

किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि कृषि कानून पर सरकार झुक नहीं रही है। उनका कहना है कि बीजेपी से उन्हें काफी उम्मीदें थीं। बेशक उनकी पत्नी ने किसी और को वोट दिया था, लेकिन उन्होंने बीजेपी को ही वोट दिया।

बीकेयू के प्रवक्ता राकेश टिकैत (फोटो सोर्सः ट्विटर/@RakeshTikaitBKU)

किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि कृषि कानून पर सरकार झुक नहीं रही है। उनका कहना है कि बीजेपी से उन्हें काफी उम्मीदें थीं। बेशक उनकी पत्नी ने किसी और को वोट दिया था, लेकिन उन्होंने बीजेपी को ही वोट दिया।

राकेश टिकैत ने शुक्रवार को गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों को संबोधित किया। राकेश टिकैत ने मंच से कहा कि 40 सेकंड में हमारा आंदोलन फिर से शुरू हो गया। उन्होंने कहा कि बीते दिन दंगे से भी खतरनाक स्थिति थी। बीजेपी के ही लोगों ने आंदोलन में किसानों की मदद की। राकेश टिकैत ने कहा कि हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण जारी रहेगा।

टिकैत ने बृहस्पतिवार को ऐलान किया कि देश का किसान सीने पर गोली खाएगा, पर पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने यह धमकी भी दी कि तीनों कृषि क़ानून अगर वापस नहीं लिए गए, तो वे आत्महत्या करेंगे, लेकिन धरना-स्थल खाली नहीं करेंगे। उनके इस तेवर ने लोगों को नामी किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की याद दिला दी। राकेश उनके ही बेटे हैं। उनके पिता ने अपने तेवरों से कई बार सरकार को झुकने पर मजबूर किया। वोट क्लब का वाकया लोगों को हमेशा याद रहेगा। तब केंद्रीय मंत्री टिकैत को मनाने वोट क्लब पर गए थे।

गौरतलब है कि बृहस्पतिवार रात को ग़ाज़ीपुर बॉर्डर के उनके एक भावुक वीडियो से ना सिर्फ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बल्कि हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के किसानों में भी आंदोलन के लिए एक नई ऊर्जा देखने को मिली है। सोशल मीडिया पर इन इलाक़ों के सैकड़ों लोग हैं जिन्होंने लिखा है कि ‘उनके यहाँ कल रात खाना नहीं बना’ और वो अपने बेटे की पुकार’ पर ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पहुंच रहे हैं।

26 जनवरी के दिन लाल क़िले पर हुई घटना के बाद किसान संगठन जिस दबाव का सामना कर रहे थे, उसके असर को ग़ाज़ीपुर की घटना ने कम कर दिया है और किसान नेता राकेश टिकैत के कद को बढ़ा दिया है। नवंबर 2020 में जब इस आंदोलन की शुरुआत हुई, तब राकेश टिकैत की भूमिका बहुत सीमित बताई जा रही थी। लोग उन्हें ‘बिकाऊ’ कह रहे थे और कुछ लोगों का मानना था कि उनके होने से किसान आंदोलन का नुक़सान होगा।

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