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तवलीन सिंह का कॉलम वक्‍त की नब्‍ज: नए साल में जरूरी है नई चाल

एक नए साल की शुरुआत कैसे की जा सकती है, बिना गुजरे साल के गिरेबान में झांके। झांकने की कोशिश जब की मैंने तो मालूम हुआ कि साल 2015 राजनीतिक तौर पर अच्छा नहीं था।

Author January 3, 2016 10:37 AM

एक नए साल की शुरुआत कैसे की जा सकती है, बिना गुजरे साल के गिरेबान में झांके। झांकने की कोशिश जब की मैंने तो मालूम हुआ कि साल 2015 राजनीतिक तौर पर अच्छा नहीं था। दोष किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, सबका था। विपक्षी दलों ने जैसे तय कर लिया साल की शुरुआत में ही कि मोदी सरकार को किसी हाल में काम नहीं करने दिया जाएगा, देश का नुकसान चाहे कितना क्यों न हो। सो, जनवरी के महीने से ही हल्ला मचने लगा संसद के अंदर भी और बाहर भी किसी न किसी मुद्दे को लेकर। संसद के अंदर तो हाल यह था कि राज्यसभा में अटका दिए गए कई अहम कानून और लोकसभा अखाड़ा बन गई नारेबाजी और तमाशे की। नतीजा यह कि साल भर संसद के सत्र बेकार गए।

संसद के बाहर हर विपक्षी दल ने पूरा समर्थन दिया पुरस्कार-वापसी आंदोलन का और ‘बढ़ती असहनशीलता’ को लेकर हर हंगामे, हर वक्तव्य का। इतिहास की नजरों से अगर 2015 को देखा जाए, तो साफ दिखता है कि असहनशीलता बढ़ने के बदले शायद थोड़ी कम हुई। मिसाल के तौर पर सोनिया गांधी के जमाने में दिल्ली के मुख्यमंत्री की कहां हिम्मत होती उनको ‘साइकोपैथ’ कहने की।

रही बात सांप्रदायिक हिंसा की, तो 2015 में जो गुस्सा मीडिया में जाहिर हुआ मोहम्मद अखलाक की हत्या को लेकर, वह कभी उन सालों में नहीं दिखा, जब मुसलमानों और सिखों के जनसंहार आम हुआ करते थे, न उस साल जब पंडितों को कश्मीर घाटी से भगा दिया गया था। जब इतिहास लिखा जाएगा 2015 का, तो इस बात पर जरूर ध्यान दिया जाएगा कि जिस समय दुनिया के बाकी देश जिहादी ताकतों के खिलाफ लड़ने की रणनीति बना रहे थे उस समय भारत उलझा रहा बेकार के हंगामों में। न असहनशीलता बढ़ी थी और न ही सांप्रदायिक तनाव बढ़ा था। हंगामा हुआ बस और कुछ नहीं, लेकिन दोष सिर्फ विपक्षी दलों को देना गलत होगा, क्योंकि कुछ दोष प्रधानमंत्री का भी था।

नरेंद्र मोदी से जिस नेतृत्व की उम्मीद थी वह दिखी अगर तो सिर्फ तब, जब वे विदेश में प्रवासी भारतीयों के जलसों को संबोधित करते थे। वहां सुनने को मिले कई अच्छे वादे। भारत की दिशा को बदलने का काम किया जाएगा। भारत को ऐसा देश बनाया जाएगा, जहां नौजवानों को रोजगार के इतने अवसर होंगे कि देश छोड़ कर जाने की नौबत ही नहीं आएगी। भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं दुनिया के विकसित देशों जैसी होंगी।

भारत बनेगा इक्कीसवीं सदी का आर्थिक महाबली। आश्चर्य की बात यह है कि इस तरह की बातें प्रधानमंत्री ने देश के अंदर करना बिल्कुल बंद कर दीं और चुप्पी ऐसी साधी हर मुद्दे को लेकर कि वही नेतृत्व का अभाव महसूस होने लगा हम जैसों को जो महसूस होता था मनमोहन सिंह के शासनकाल में।

प्रधानमंत्री की चुप्पी सबसे ज्यादा महंगी पड़ी जब मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उन्होंने दुख तक व्यक्त नहीं किया। इससे उनके दुश्मनों के हाथ मजबूत हुए इतने कि भारत को बदनाम करने में लग गए दुनिया भर में। बदनामी का दाग प्रधानमंत्री के चेहरे तक पहुंचा, लेकिन फिर भी उन्होंने चुप रहना पसंद किया और तब भी चुप रहे, जब हत्यारों की फेहरिश्त में नाम आए स्थानीय भारतीय जनता पार्टी के परिजनों के। फिर से आवाजें उठने लगीं कि हिंदुत्व के कट्टरपंथियों को पूरा समर्थन है मोदी सरकार का।

इन राजनीतिक समस्याओं का हल फिर भी आसान है। मोदी सरकार की आने वाले साल में सबसे बड़ी समस्याएं आर्थिक होंगी, इसलिए कि अभी तक अर्थव्यवस्था में मंदी छाई हुई है। लटयंस दिल्ली के ऊंचे गलियारों से अर्थव्यवस्था का हाल अच्छा दिखता है, इतना कि भारत सरकार के आला अधिकारी एक-दूसरे की पीठें थपथपाते फिरते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। विदेशी निवेशक बेशक वापस आ गए हों, भारतीय निवेशक अब भी निवेश करने से कतरा रहे हैं, इसलिए कि मोदी सरकार ने निजी उद्योग क्षेत्र की समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने में कोई कदम नहीं उठाए हैं। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों से जब इसके बारे में पूछा जाता है, तो वे आसानी से कह देते हैं कि निजी उद्योग क्षेत्र की समस्याएं उद्योगपतियों ने खुद पैदा की हैं बैंकों से ज्यादा कर्ज लेकर।

असलियत यह है कि सोनिया-मनमोहन सरकार के आखिरी दो वर्षों में ऐसी नीतियां बनाई गर्इं, जिन्होंने कई बड़ी योजनाओं को रोकने का काम किया। लाखों करोड़ रुपए लगाने के बाद रोकी गर्इं कई योजनाएं, सो एक तरफ निवेशकों का पैसा डूबोने का काम हुआ, दूसरी तरफ कई फलती-फूलती निजी कंपनियों को कंगाल कर दिया गया। इन रुकी हुई योजनाओं को दोबारा शुरू करवाने की बातें तो खूब हुर्इं 2015 में, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। निजी क्षेत्र में ही पैदा हो सकते हैं अब रोजगार के नए अवसर, सो ऐसा अभी तक होना शुरू नहीं हुआ है।

इन चीजों के बारे में जब भी मैंने वित्त मंत्रालय के बड़े अफसरों से बात की है, तो उनका जवाब होता है कि भारत की र्थव्यवस्था का हाल अच्छा न होता, तो दुनिया कभी न स्वीकार करती कि वैश्विक आर्थिक मंदी के वर्तमान माहौल में भारत एक चमकता तारा है। किसी भी दूसरी अर्थव्यवस्था की वृद्धि हमसे तेज नहीं है। चीन की भी नहीं। ऐसी बातें करके वित्त मंत्रालय के अंदर माहौल बेशक सुहाना हो गया हो, लेकिन देश में अभी तक आर्थिक माहौल मायूस है।

सो, 2016 के लिए आशा यही कर सकते हैं हम कि प्रधानमंत्री देश के अंदर भी वह नेतृत्व दिखाएं, जो विदेशी जलसों में हमने देखा 2015 में कई बार। वरना न वह परिवर्तन आएगा न वह विकास, जिसके नाम पर मोदी को जनता ने दिया था पूरा बहुमत।

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