सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हदिया की वैवाहिक स्थिति की जांच नहीं कर सकता एनआईए - Supreme Court Says That NIA Can Not Check Matrimonial Status of A Man or Woman - Jansatta
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हदिया की वैवाहिक स्थिति की जांच नहीं कर सकता एनआईए

न्यायालय ने यह भी कहा कि लव-जिहाद मामले की कथित पीड़िता हदिया उसके समक्ष पेश हुई थी, और कहा था कि उसने अपनी मर्जी से शफीं जहां से निकाह किया था।

Author नई दिल्ली | January 23, 2018 3:38 PM
शफीं जहां और हदिया। (file photo)

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी केरल में लव-जेहाद के कथित मामले की जांच जारी रख सकता है, लेकिन यह पुरुष या स्त्री की वैवाहिक स्थिति की जांच नहीं कर सकता। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी. वाई. चन्द्रचूड़ की पीठ को जांच एजेंसी ने बताया कि उसने न्यायलय के निर्देशों के बाद की जा रही जांच में काफी प्रगति की है। अदालत ने इसके बाद यह बात कही है। पीठ ने कहा, ‘‘हमें इससे (जांच) मतलब नहीं है। आप चाहें अपनी जांच जारी रखें या किसी को गिरफ्तार करें, हमें इससे कोई लेना-देना नहीं है।’’

इसने कहा, ‘‘आप इसकी जांच कर सकते हैं, लेकिन आप उनकी वैवाहिक स्थिति की जांच नहीं कर सकते हैं।’’ न्यायालय ने यह भी कहा कि लव-जिहाद मामले की कथित पीड़िता हदिया उसके समक्ष पेश हुई थी, और कहा था कि उसने अपनी मर्जी से शफीं जहां से निकाह किया था। पीठ ने यह भी कहा कि वह केरल उच्च न्यायालय के उस फैसले पर भी गौर करेगा जिसमें हदिया के निकाह को अमान्य करार दिया गया है।

गौरतलब है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए केरल उच्च न्यायालय ने हदिया के निकाह को अमान्य घोषित कर दिया था। मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 फरवरी की तारीख तय करते हुए पीठ ने कहा, ‘‘हमें सिर्फ किसी से विवाह करने संबंधी एक व्यस्क व्यक्ति के चुनाव से मतलब है।’’ न्यायालय ने पिछने वर्ष 27 नवंबर को हदिया को उसके माता-पिता की देख-रेख से मुक्त करा कर पढ़ने के लिए कॉलेज भेज दिया था।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने हाल में यह भी कहा था कि अंतर-जातीय विवाह का विकल्प चुनने वालों पर हमले करना पूरी तरह गैर कानूनी हैं और किसी भी खाप, व्यक्ति या समाज अपनी मर्जी से शादी करने वाले वयस्क पुरुष और स्त्री से कोई भी सवाल नहीं कर सकता है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की खंडपीठ ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लेने तथा इस बारे में अपने सुझाव नहीं देने के लिए केन्द्र सरकार को आड़े हाथ लिया था। पीठ ने कहा था कि पंचायतें या संगठन एक दूसरे से विवाह करने वाले स्त्री-पुरुष को धमकी नहीं दे सकते हैं।

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