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बीते बरस के टीवी सूरमा

सन पंद्रह के टीवी सूरमा कौन रहे? पहले नंबर पर मोदी। दूसरे नंबर पर केजरीवालजी! राहुलजी तीसरे नंबर पर ही रहे! नंबर वन पर कवरेज पाने वाले रहे प्रधानमंत्री मोदीजी।
Author January 3, 2016 00:07 am
सुधीश पचौरी (फाइल फोटो)

सन पंद्रह के टीवी सूरमा कौन रहे? पहले नंबर पर मोदी। दूसरे नंबर पर केजरीवालजी! राहुलजी तीसरे नंबर पर ही रहे!
नंबर वन पर कवरेज पाने वाले रहे प्रधानमंत्री मोदीजी। उन्होंने दिए ये शब्द: ‘पावर पुश’, ‘स्वच्छता’, ‘स्टैंडअप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया’ और ‘मन की बात’!
‘पावर पुश’ इतनी बार दुहरा कि विदेश नीति और कूटनीति का मतलब ही ‘पावर पुश’ हो गया। हिंदी में इसे ‘ताकत का धक्का’, ‘पावर पव्वा’ या ‘बल की धमक’। लेकिन जो मजा अंगरेजी के ‘पावर पुश’ में है, वह ‘पावर पव्वे’ में नहीं है।
मोदीजी की चाल-ढाल, मोदी का हाथ मिलाना, देखना, बात करना, ड्रेस बदलना यानी हर पल ‘पावर पुश!’ छवि-सजग मोदी का पावर पुश यहां तक दिखा कि जब जुकरबर्ग उनके और कैमरों के बीच जरा-सी देर को आ गए तो मोदीजी ने जुकरबर्ग को दिया एक प्यारा-सा पावर पुश और एक ओर कर दिया! वे मां की याद करके रोए भी तो दिखा एक कोमल तार वाला पावर पुश! पावर पुश यानी दीनता-हीनता से मुक्त एक नया ताकतवर भारत!
इस बरस भी उनके ‘मन की बात’ जारी रही! उस पर आक्षेप लगे, लेकिन वह चलती रही। उसकी टोन ‘प्रार्थना पुश’ वाली ही रही! मोदीजी विदेशों में ‘पावर पुश’ करते हैं, लेकिन देश में ‘प्रार्थना पुश’ से काम चलाते हैं! मोदीजी के संप्रेषण की ये दो शैलियां हैं।
राहुल सिर्फ एक बार बाइट दाग पाए। मोदी सरकार को ‘सूटबूट की सरकार’ कह कर उन्होंने चैनलों में अपनी बाइट बार-बार रिपीट कराई! इसके अलावा वे कोई दूसरी दमदार बाइट नहीं चिपका पाए!
मोदीजी की बाइटों के बाणों से सर्वाधिक इम्यून रहे नीतीश कुमार। लालूजी लालूजी की तरह बाइट मारने में अव्वल रहे और बिहार को इमदाद देने के तरीके पर ‘बिहार की बोली लगाने वाला’ कमेंट मोदीजी पर भारी पड़ा।
दादरी के अखलाक की हत्या ने सत्ता के प्रति चैनल क्रिटीकल होने का अवसर दिया। असहिष्णुता के खिलाफ मोर्चे बने। चैनलों ने दादरी कवर किया और अखलाक के बच गए बेटे के बयानों ने सत्ता को अलग-थलग डाल दिया। अन्यथा आक्रामक रहने वाले भाजपा प्रवक्ता रक्षात्मक नजर आए और असहिष्णुता के विरोध का मोर्चा अचानक लेखकों ने संभाल लिया तो भाजपा का प्रत्याक्रमण भी काम न आया। भाजपा इस नए आक्रमण के मिजाज को देर तक समझ नहीं सकी। एक ओर ‘सॉफ्ट प्रतिरोध’, दूसरी ओर हार्ड लाइन! उनके बीच कोई संवाद तक न हो सका। बहरहाल, ‘असहिष्णुता’ वाली बाइट एक बार चिपकी तो दिनों तक चिपकी रही!
इस प्रकरण में एक अंगरेजी चैनल ने यह भी सिद्ध किया कि अगर कोई बड़ा चैनल चाहे तो आरोप को प्रत्यारोप में बदल सकता है और ‘उनकी असहिष्णुता बनाम इनकी असहिष्णुता का तुलनात्मक अध्ययन’ टाइप बहसें करवा कर मुद्दे को ऐब्सर्ड बना सकता है। लेकिन इस पर प्रतिक्रिया में चैनल को बार-बार यह भी सुनना पड़ा कि आप तो सत्ता के भोंपू बन गए हैं!
इस बरस पहली बार लेखक इतनी बड़ी संख्या में और इतनी देर तक चैनलों में दिखे! उनकी प्रतिरोधी मुद्रा के आक्षेपों की मार से सत्ता की भाषा पहली बार रक्षात्मक होती दिखी! ‘ये कहानी है दीये की और तूफान की’ जैसा महसूस हुआ।

नंबर दो पर केजरी रहे। मोदी के बाद वे ही हैं जो टीवी कवरेज में छाए रहे। और आरोप चिपकाने में तो केजरीवाल का कोई सानी ही नहीं। यह बरस जितना मोदीजी की वक्तृता का रहा, उतना ही केजरीवाल की वक्तृता का रहा। मोदीजी विदेशों में हीरो बनते दिखे, जबकि केजरीवाल दिल्ली के नुक्कड़ों पर डुगडुगी बजाने वाले नजर आए और उनकी बाइटें ऐसी फाइटों वाली रहीं कि वे ही वे छाए रहे। यह दिल्ली के एक ‘स्ट्रीट फाइटर’ यानी केजरी का ‘पावर पुश’ रहा।

केजरी का मीडिया कौशल इस बरस अपने चरम पर दिखा। वे हर आक्रमण को प्रत्याक्रमण में बदलते दिखे। मोदीजी कांग्रेस का आखेट करते हैं तो, ताली बटोरते हैं तो, केजरी भाजपा का आखेट करते हैं और ताली बटोरते हैं। सचिवालय पर सीबीआइ के छापे को केजरी ने केंद्र सरकार के एक बड़े मंत्री के खिलाफ बेहद चतुराई से मोड़ा और इस कदर पीछे पड़े कि सरकार और मंत्री को रक्षात्मक होना पड़ा। वे टीवी के नए सूरमा बन कर उभरे! बाइट से फाइट करना कोई केजरी से सीखे। उन्होंने प्रधानमंत्री को ‘साइको पैथ’ तक कह दिया और जब एक इंटरव्यू में एंकर ने उनको ऐसे शब्द कहने के लिए शर्मिंदा करना चाहा तो वे बोले कि हम तो देहाती लोग हैं, हमारी भाषा ऐसी ही खराब है, लेकिन उनके तो करम ही खराब हैं!
एक बेशर्म बना दिए गए समय में शिष्टाचार की उम्मीद करना बेशर्म समय में शर्म का घूंघट निकालने का नाटक करना है। जब कोई भी पक्ष अपनी जिदों में कम न हो और चैनलों के एंकर भी ‘फ्री फॉर आल’ में यकीन करते हों, वहां शिष्टाचार का पाठ कौन पढ़ाए?
चैनलों की भाषा ने इस बरस अभद्रता को अभद्रता की भाषा में ही आने दिया। एक ‘नागरिक बहस’ करने का आग्रह, एक ‘शालीन बातचीत’ करने का आग्रह, बहरे कानों पर ही पड़ा! केजरीवाल पहले रेडियो पर छाए रहे, फिर टीवी में छाए रहे। पहले वे दिल्ली वालों को डेंगू से बचाते रहे, फिर वे दिल्ली को ‘आड-इवन’ कारों के चलन को खांस-खांस कर सिखाते रहे। दिल्ली के हर एफएम रेडियो और टीवी चैनलों पर उनकी सुपरिचित आवाज सुनाई देती रहती। रेडियो और टीवी से दिल्ली चलाना कोई उनसे सीखे।

छोटे वाक्य, सरल-सी नुक्कड़वाली भाषा, भाषा में एक दोस्ताना आग्रह और केयर करने वाले बड़े भाई का भाव! ‘आड-इवन’ को लेकर आते संदेश उनको मोदीजी से ज्यादा दृश्यमान बनाते हैं! वे इस कदर हमारी आंखों और कानों में रहते हैं कि हम बच ही नहीं सकते। यह और बात है कि दिल्ली किसी की ‘अनुशासित सिटी’ बनती है कि नहीं और एक जनवरी को दिल्ली का क्या सीन बनता है?

आखिर के दो बड़े सीन अगले बरस की भूमिका बनाने वाले दिखते हैं- एक ओर राम मंदिर के लिए पत्थरों का अयोध्या आना और दूसरी ओर मार्क जुकरबर्ग की ‘फ्री बेसिक्स’ वाली ‘सूचना साम्राज्यवादी तिकड़म’ की खबरें अगले बरस के लिए ‘पलीते’ की तरह हैं।

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