ताज़ा खबर
 

चुनौतियों पर सवाल नहीं शुभकामनाएं मांग रहीं शीला

लगातार 15 साल तक दिल्ली की कमान संभालने वालीं शीला दीक्षित को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है।

Author नई दिल्ली | July 16, 2016 02:24 am

लगातार 15 साल तक दिल्ली की कमान संभालने वालीं शीला दीक्षित को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। इसी के साथ वे अपने राजनीतिक जीवन का तीसरा सबसे कठिन इम्तहान देने की तैयारी में जुट गई हैं। बकौल दीक्षित, यह जिम्मेदारी काफी बड़ी है। वे किस सीट से चुनाव लड़ेंगी, किसी अन्य दल से गठबंधन करेंगी या उत्तर प्रदेश में पार्टी को सत्ता में कैसे वापस लाएंगी, जैसे सवालों का सीधा जवाब देने के बजाए वे मिलने वालों से शुभकामनाएं मांग रही हैं और सभी को साथ लेकर इस चुनौती को पूरा करने का दावा कर रही हैं।

दीक्षित शुरू से ही बढ़-चढ़कर दावा करने वाली नेताओं में नहीं रही हैं। 15 साल तक एक राज्य की मुख्यमंत्री को दूसरे राज्य में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने एक अनोखा प्रयोग किया है। दिल्ली में कांग्रेस की हार के बाद जिस तरह से दीक्षित के अपने बेगाने हुए उससे तो काफी पहले ही यह तय हो गया था कि दिल्ली में अब उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है। जिन लोगों को उन्होंने राजनीति में आगे बढ़ाया वे ही आज उनके सबसे बड़े विरोधी बन गए हैं।

लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बनाने वाली दीक्षित को 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में किसी कांग्रेस उम्मीदवार ने प्रचार तक के लिए नहीं बुलाया जबकि वे दिल्ली की अकेली ऐसी नेता हैं जो चुनाव प्रचार खत्म होने तक सभी 70 विधानसभा सीटों पर प्रचार के लिए जाती थीं। उन्होंने कांग्रेस को जीत की आदत डलवाई। न केवल तीन विधानसभा चुनाव बल्कि लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने दिल्ली से कांग्रेस को बढ़त दिलाई। कांग्रेस दिग्गज उमाशंकर दीक्षित की बहू होने के नाते उन्होंने अपनी ससुराल की सीट कन्नौज से 1984 का चुनाव जीता और राजीव गांधी की सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री बनीं, लेकिन 1989 के चुनाव में उसी कन्नौज में हारने के बाद वे गुमनामी में चली गर्इं।

1984 की तरह ही 1998 भी उनके राजनीतिक जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण बना, जब कांग्रेस ने पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से उन्हें उम्मीदवार बनाया। उनके चुनाव हारने के बाद भी पार्टी ने गुटों में बंटे नेताओं से पीछा छुड़ाने के लिए चौधरी प्रेम सिंह को हटाकर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसी साल दिसंबर में उनकी अगुआई में कांग्रेस ने दिल्ली में सरकार बनाई। इसके बाद बड़े नेताओं के विरोध को दरकिनार करते हुए उन्होंने दिल्ली में इस तरह पैर जमाए कि ज्यादातर विरोधी उनके साथ होने लगे। 2003 आते-आते कांग्रेस ने फिर प्रयोग किया और प्रेम सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दलित कार्ड चला, लेकिन वह भी दीक्षित का चुनाव ही साबित हुआ। ज्यादातर विधायकों ने हवा का रुख देखकर उनका साथ दिया। 2008 का चुनाव भी कांग्रेस ने जीता, लेकिन उसमें विपक्षी दल भाजपा की दुविधा ज्यादा मददगार बनी।

माना जाता है कि अगर तीसरी बार भी दीक्षित सरकार चलाने को लेकर ज्यादा गंभीर होतीं तो दिल्ली का राजनीतिक माहौल कुछ और होता। इसके बावजूद दिल्ली के हर इलाके में हुए विकास कार्य उनके 15 साल के कार्यकाल की याद दिलाते हैं। बिजली के निजीकरण और राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। मुमकिन है कि उसमें कुछ तथ्य भी हों, लेकिन उनकी ओर से कराए गए विकास कार्यों ने उन आरोपों को कमजोर बना दिया है। अभी भी उन पर 400 करोड़ रुपए के टैंकर के घोटाले का आरोप लगा है, लेकिन लोग उसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। शायद यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व ने इन सभी आरोपों के बावजूद उत्तर प्रदेश में उन्हें अपना चेहरा बनाया।

बीते कुछ सालों से सक्रिय राजनीति से लगभग गुम सी हो चुकीं शीला दीक्षित के लिए उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी एक बड़ी चुनौती है। दिल्ली की तुलना में उत्तर प्रदेश काफी बड़ा राज्य है और कांग्रेस सालों से वहां मुख्य लड़ाई से ही बाहर ही रही है। यह सही है कि 12 फीसद यादव वोटों के बूते मुलायम सिंह यादव और उतने ही दलित वोटों के बूते मायावती प्रदेश की सत्ता में आ सकती हैं, तो उतने ही वोटों के बूते ब्राह्मण नेता कांग्रेस को सत्ता में क्यों नहीं ला सकते। समस्या यह है कि नारायण दत्त तिवारी (उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड), जगन्नाथ मिश्र (बिहार और झारखंड) और शुक्ल बंधु (मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) जैसे दिग्गजों को दरकिनार करने या हिंदी पट्टी में कांग्रेस के कमजोर होने के बाद से ही ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक अलग-अलग दलों के साथ जुड़ते चले गए। अल्पसंख्यक तो उसी दल को वोट करते हैं जो भाजपा को हराने की कूवत दिखाए। कुछ महीनों के भीतर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस का पुराना वोट बैंक लौटाना एक बड़ी चुनौती है। वहीं शीला दीक्षित की उम्र और स्वास्थ्य भी शायद उन्हें पहले जैसा काम करने की इजाजत न दे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App