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तवलीन सिंह का कॉलम: कहानी किसी की, सूत्रधार कोई और

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री जब राज्यसभा में असहनशीलता पर बहस का जवाब दे रहे थे, तब राहुल गांधी ने लोकसभा में उनको खूब फटकार लगाई।

तवलीन सिंह।

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री जब राज्यसभा में असहनशीलता पर बहस का जवाब दे रहे थे, तब राहुल गांधी ने लोकसभा में उनको खूब फटकार लगाई। स्पष्ट शब्दों में उन्होंने नरेंद्र मोदी को समझाया कि प्रधानमंत्री की भूमिका कैसे अदा की जाती है। क्यों न जानते होंगे जी इसके बारे में? क्या उनके परिवार ने देश को तीन प्रधानमंत्री नहीं दिए हैं? क्या पिछले दशक से उनकी माताजी भारत की असली प्रधानमंत्री नहीं रही हैं? क्या उनकी अपनी बारी नहीं थी इस राजनीतिक विरासत को संभालने की पिछले साल, अगर गुजरात से वह चाय वाला न आया होता?

बहुत कोशिश की थी राहुलजी की माताजी ने नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की, उनके चेहरे पर कालिख पोतने की, उनको मौत का सौदागर साबित करने की, लेकिन इतनी नाकाम हुर्इं कि भारत के मतदाताओं ने इस चाय वाले को पूरा बहुमत देकर दिल्ली भेजा। तीस वर्ष बाद ऐसा हुआ, इसलिए कि इस देश के आम आदमी को लगा कि वास्तव में परिवर्तन और विकास की जरूरत है भारत को। मोदी की समस्या यह है कि उनके इरादे नेक जितने भी रहे हों, उन्होंने इन इरादों के दुश्मन नहीं पहचाने प्रधानमंत्री निवास में आने से पहले।

पहचाने होते तो शुरू से मालूम होता कि जिस लोकतांत्रिक सामंतवाद के वारिस हैं राहुल गांधी, उस प्रणाली के समर्थक कितने हैं और ताकतवर कितने हैं ये लोग। इनमें बुद्धिजीवी हैं, आला अधिकारी हैं, समाजवादी सोच के उद्योगपति हैं, राजनीतिज्ञ हैं और पत्रकार भी। कहने को तो ये सेक्युलरिज्म के पहरेदार हैं, लेकिन असल में इनको इस लोकतांत्रिक सामंतवाद से लाभ बहुत हुआ है, सो जब परिवर्तन और विकास की बातें होने लगीं दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में, तो इन्होंने सुनियोजित तरीके से मोदी के वर्चस्व को कम करने की कोशिश की मीडिया की पूरी सहायता से।
मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के फौरन बाद उस ‘अच्छे दिन’ वाले वादे पर ताने कसे गए। पत्रकारिता की दुनिया में मेरे वामपंथी दोस्त हैं, जो जब भी मिलते मुझसे, कहा करते व्यंग्य के अंदाज में कि ‘कब आएंगे अच्छे दिन? इतनी देर क्यों लग रही है उनके आने में।’ जानते हैं ये लोग कि देश को इतने बुरे हाल में छोड़ कर गर्इं राहुलजी की माताजी कि अर्थव्यवस्था तकरीबन ठप हो गई थी। मोदी की पहली गलती थी कि उन्होंने खुल कर यह बात कभी कही नहीं। कही होती तो इस देश के लोग पूरी तरह से साथ देते आर्थिक सुधारों का। दूसरी गलती उनकी थी कि इन सुधारों को लाने में उन्होंने बहुत देर कर दी और जब लाना शुरू किया तो इतने चुपके से यह काम हुआ कि लोगों को परिवर्तन के आसार तक नहीं दिखे।

इतने में राहुल गांधी म्यांमा में विपश्यना से नई ऊर्जा भर के वतन लौटे और आते ही प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले हर दूसरे दिन करने लग गए। पहले तो इल्जाम लगाया मोदी पर कि वे किसानों की जमीनें छीन कर अपने ‘उद्योगपति दोस्तों’ को देना चाहते हैं। फिर लगा वह ‘सूट-बूट सरकार’ होने का इल्जाम, जो मीडिया में खूब चला। करते-कराते हुआ यह कि नरेंद्र मोदी की कथा उनके हाथों से छिन कर उनके दुश्मनों के हाथों में पहुंच गई। यह बिलकुल अच्छी बात नहीं है, क्योंकि उनके नेतृत्व, उनकी रहबरी पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। इसके बाद भी जब मोदी ने मौन रहने का निर्णय किया तो उनको इतना नुकसान हुआ कि उनकी सरकार की उपलब्धियों को लेकर भी कोई शाबाशी नहीं मिली है।
ऐसा भी नहीं है कि उपलब्धियां नहीं हैं। कश्मीर को लेकर एक ठोस, नई नीति के आसार दिख रहे हैं। रक्षा मंत्रालय जो तकरीबन ठप पड़ा रहा है वर्षों से, आज उसके गलियारों में नई हरारत दिख रही है। सामाजिक क्षेत्र में कई नई चीजें हुई हैं, जिनमें स्वछ भारत भी है और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ भी। आर्थिक क्षेत्र में जनधन योजना एक नई पहल है और योजना आयोग को समाप्त करने से एक नई आर्थिक दिशा की तरफ इशारा है, लेकिन इन चीजों के बारे में अगर जिक्र तक नहीं होता है मीडिया में तो दोष प्रधानमंत्री का है।

मीडिया को इतनी दूर रखा है अपने कार्यालय से कि दिल्ली के जाने-माने पत्रकार भी नहीं जानते हैं कि प्रधानमंत्री से अगर मिलना हो तो किससे बात करनी चाहिए। इस जमाने में जब साढ़े तीन सौ से अधिक चौबीस घंटा चलने वाले समाचार चैनल हैं देश में, इस जमाने में जब तीस करोड़ से ज्यादा भरतीय नागरिक इंटरनेट पर हैं। मीडिया से जब कोई राजनेता दूरियां रखता है, तो उसका नुकसान ज्यादा होता है, मीडिया का कम। अजीब बात यह है कि राहुल की मम्मीजी की जब सरकार थी तो वे दूर रहा करते थे मीडिया से और इसका खमियाजा उनको भुगतना पड़ा और अब मोदी उनके नक्शेकदम पर चल रहे हैं, तो खमियाजा उनको भी भुगतना पड़ेगा।

सच यह है कि भुगत रहे हैं अभी से, क्योंकि ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिक चर्चा प्रधानमंत्री निवास से नहीं, दस जनपथ से दोबारा तय होने लग गई है। सबूत है असहनशीलता को लेकर यह झूठा हल्ला, जिसको पूरी तरह से समर्थन है भारत के पूर्व राजघराने का। हम जानते हैं कि असहनशीलता मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले जितनी थी उतनी अब भी है, लेकिन इस मुद्दे को इतना उछाला गया है पिछले कुछ महीनों में कि दुनिया की नजरों में भारत बदनाम हुआ है। अगर प्रधानमंत्री ने निकट भविष्य में इस बदनामी को रोका नहीं, तो कहां से आएंगे वे विदेशी निवेशक, जिनकी हमें सख्त जरूरत है? समय आ गया है कि मोदी भारत की कहानी के सूत्रधार दोबारा बनें, वरना ऐसा लगने लगेगा दिन-ब-दिन कि देश की बागडोर उनके हाथों में है ही नहीं।

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