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अनुसंधान में गुणवत्ता की कसौटी

उच्च शिक्षा में शोध की व्यवस्था इसलिए की गई कि उसके माध्यम से नए विचारों, नए अनुसंधानों को सामने लाया जा सके, जिससे समाज को दिशा और औद्योगिक क्रांति को बल मिले।

मनमोहन प्रकाश

पीएचडी की उपाधि को उपयोगी, गुणवत्तापूर्ण तथा विश्वस्तरीय बनाने के लिए आयोग, शिक्षाविदों, शोध निर्देशकों और वैज्ञानिकों को समवेत रूप से ऐसे उपाय खोजने होंगे, जिससे पुनरावृत्ति और नकल वाले विषयों तथा सामग्री पर रोक लगे, मौलिक चिंतन और नवाचार युक्त, समाज हितकारी तथा समस्या उन्मूलक शोध का विकास हो। आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विषयों के चयन को बढ़ावा मिले।

उच्च शिक्षा में शोध की व्यवस्था इसलिए की गई कि उसके माध्यम से नए विचारों, नए अनुसंधानों को सामने लाया जा सके, जिससे समाज को दिशा और औद्योगिक क्रांति को बल मिले। व्यवस्था को और सुगम, प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। इस तरह पीएचडी शिक्षा जगत में डीलिट, डीएससी आदि के बाद दूसरी बड़ी उपाधि है।

एक समय ऐसा था, जब इस उपाधिधारकों की संख्या भारत में कम थी और शिक्षा जगत, शोध संस्थानों तथा समाज में उनका मान-सम्मान बहुत ज्यादा था। आज स्थिति उलट है। पीएचडी धारकों की संख्या बढ़ी है, पर समाज में उनका मान-सम्मान घटा है। दुनिया में प्रतिवर्ष कुल पीएचडी उपाधि पाने वालों की संख्या में अभी भारत चौथे स्थान पर है, जबकि आबादी के अनुसार भारत विश्व में दूसरे नंबर पर है। भारत का विश्व अनुसंधान में सिर्फ 2.7 प्रतिशत योगदान है, जबकि हमारे पड़ोसी देश चीन की भागीदारी पंद्रह प्रतिशत है।

अगर हमारे शोधपत्र प्रकाशन की यही हालत बनी रही, तो हम क्रमों की सीढ़ी उतरते ही चले जाएंगे। इतना ही नहीं, इस उपाधि को प्राप्त करने के लिए शोधार्थियों द्वारा लिखे गए शोध ग्रंथ की गुणवत्ता, विषय की नवीनता, नवाचार का समावेश, शोध निष्कर्षों की उत्कृष्टता तथा उपयोगिता पर अगर ध्यान दिया जाए, तो भी हमारी स्थिति प्रशंसनीय नहीं है। इन शोध ग्रंथों से प्रकाशित होने वाले गुणवत्ता युक्त शोधपत्र और पेटेंट प्राप्त करने में भी हम अन्य देशों की तुलना में बहुत पीछे हैं।

भारत में किन विषयों पर शोध हो रहा है, जीवन और समाज के लिए उसकी उपयोगिता क्या है, इसका मूल्यांकन करने वाला भी कोई नहीं है। वहीं कई उपयोगी शोध ग्रंथ केवल पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने तक सीमित हैं। कई बार तो शोध शासन की नीतियों, योजनाओं पर होते हैं, जो बहुत गुणवत्ता युक्त और श्रमसाध्य होते हैं, पर उनकी अनुशंसाओं को संबंधित विभाग पढ़ने को भी तैयार नहीं होता है, उपयोग में लाया जाना तो दूर की बात है। आज चिंतनीय स्थिति है कि जिस भारत देश ने विश्व को तर्क की सही दिशा दी, प्रयोगधार्मिता, सत्य की सम्यक जिज्ञासा और अन्वेषण प्रिय जीवन शैली का शिक्षण दिया हो, उसी देश में विज्ञान और अन्य विषयक शोध की दशा और स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है।

विश्वविद्यालय अनुदान अयोग राष्ट्रीय स्तर पर पीएचडी हेतु मानक निर्धारित करता है। समय-समय पर शोध उपाधि की गुणवत्ता में सुधार के लिए उसने प्रवेश और प्रक्रिया में संशोधन भी किए हैं- प्रवेश हेतु लिखित परीक्षा और शोध समिति के सामने मौखिकी से गुजरना अनिवार्य किया है। शोध प्रबंध को वेबसाइट पर अपलोड कर सार्वजनिक करने के लिए बाध्य भी किया है। शोध निर्देशक बनने की प्रक्रिया को भी सरल किया है, ताकि अधिक से अधिक युवा वर्ग को शोध निर्देशक बनने के लिए प्रेरित कर इस क्षेत्र में कुछ नया किया जा सके। इन सब उपायों के बावजूद शोध की गुणवत्ता में बहुत बड़ा बदलाव आया हो, ऐसा नहीं लगता। विडंबना है कि तकनीकी कौशल से कई ऐसी युक्तियां अवश्य खोज ली गई हैं, जो शोध प्रबंध को नकल की समस्या से मुक्ति दिलाने में मदद करती हैं।

आजकल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचकांक का चलन है। विज्ञान और तकनीकी विषयों के लिए विज्ञान उद्धरण सूचकांक शोध-पत्र प्रकाशन की स्थिति और महत्त्व को प्रतिपादित करते हैं। कला, वाणिज्य और विधि आदि विषयों के लिए इस तरह की व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर बनाई जानी चाहिए। भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर की निशुल्क शोधपत्र प्रकाशित करने वाली शोध-पत्रिकाओं की संख्या बढ़ाने की भी जरूरत है।

अभी भारत से शोध पत्रिकाएं तो बहुत प्रकाशित हो रही हैं, पर उनमें से कुछ ही को यूजीसी ने मानक सूची में शामिल किया है। इस सूची में अधिकांश शोध जर्नल विदेशी हैं और सशुल्क शोधपत्रों का प्रकाशन करते हैं। कई बार शोधार्थी आर्थिक अभाव के कारण भी अच्छे जर्नल में अपने शोध प्रकाशित नहीं करा पाता। अधिकांश विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शोध प्रकाशन के लिए कोई आर्थिक मदद देने का प्रावधान नहीं है। इसी तरह पेटेंट पर होने वाले खर्च या शोध ग्रंथ को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की योजना भी गिने-चुने संस्थानों के पास है।

पीएचडी की उपाधि को उपयोगी, गुणवत्तापूर्ण तथा विश्व स्तरीय बनाने के लिए आयोग, शिक्षाविदों, शोध निर्देशकों और वैज्ञानिकों को समवेत रूप से ऐसे उपाय खोजने होंगे, जिससे पुनरावृत्ति तथा नकल वाले विषयों तथा सामग्री पर रोक लगे, मौलिक चिंतन और नवाचार युक्त, समाज हितकारी तथा समस्या उन्मूलक शोध का विकास हो। आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विषयों के चयन को बढ़ावा मिले।

इसके लिए शोध विषयों की विषयवार विस्तृत सूची प्रतिवर्ष विद्वानों, नीति निर्धारकों, तकनीकी विशेषज्ञों, समाज सुधारकों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और शोधार्थियों के सम्मिलित प्रयास से तैयार की जाए और निरंतर उसमें संवर्धन होता रहे और विभिन्न संस्थानों में शोधार्थियों को सामान्यतया इन्हीं विषयों पर शोध करने के लिए प्रेरित किया जाए। ऐसा कर के हम विषय की पुनरावृत्ति वाली समस्या से बचते हुए शोध को सार्थक और नवीन दिशा दे सकते हैं। शोध कार्य हेतु आर्थिक मदद के लिए यूजीसी के साथ-साथ कारपोरेट घरानों, औद्योगिक संस्थानों को सीएसआर के तहत मदद करने के लिए आगे लाने के प्रयास किए जान चाहिए।

शोध पंजीयन के लिए लिखित परीक्षा के साथ-साथ शोध रूपरेखा को नवीनता तथा शोध प्रविधि की दृष्टि से बारीकी से परखने की आवश्यकता है। शोध मूल्यांकन प्रक्रिया में भी बदलाव समय की मांग है। अभी अधिकांश विश्वविद्यालयों द्वारा शोध प्रबंध का मूल्यांकन दो बाह्य परीक्षकों द्वारा कराया जाता है और उनकी अनुशंसा पर मौखिकी उपरांत पीएचडी की उपाधि दे दी जाती है। शायद ही कोई ऐसा प्रकरण होगा, जिसमें कोई शोधार्थी मौखिकी में असफल हुआ हो। अगर मौखिकी में असफल होने का कोई अवसर है ही नहीं, तो इसकी आवश्यकता क्यों? शोध परीक्षकों की नियुक्ति भी सामान्यतया शोध निर्देशक द्वारा दिए गए परीक्षक के पैनल में से ही होती है।

इसमें भी बदलाव पर विचार किया जाना चाहिए। कई बार बाह्य परीक्षक शोध ग्रंथ की कई गलतियों-कमियों का अपनी रिपोर्ट में जिक्र करता है, पर इन कमियों के सुधार तथा शोध ग्रंथ में समावेश की शायद ही कोई व्यवस्था हो। पीएचडी उपाधि की घोषणा के साथ ही शोध ग्रंथ संदर्भ हेतु पुस्तकालयों में पहुंचा दिए जाते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि संदर्भ के लिए शोध ग्रंथ पढ़ने वाले शोधार्थी यह मान लेते हैं कि इसमें जो लिखा है वह सही है, अपने शोधग्रंथ में उसका उल्लेख कर देते हैं। इस तरह गलती की पुनरावृत्ति की आशंका बनी रहती है।

अब समय की मांग है कि पीएचडी उपाधि को और प्रामाणिक बनाने के लिए मौखिकी के पूर्व लिखित परीक्षा भी आयोजित की जाए। लिखित परीक्षा शोधग्रंथ पर आधारित हो। प्रश्नपत्र मूल्यांकन करने वाले बाह्य परीक्षक द्वारा तैयार किए जाएं। परीक्षा और मूल्यांकन भी बाह्य परीक्षक द्वारा आयोजित हो। विश्वविद्यालय मौखिक और लिखित परीक्षा के आधार पर ग्रेड के साथ पीएचडी उपाधि प्रदान करें। यह जरूरी है, क्योंकि सभी शोधग्रंथ और उनमें निहित शोध एक स्तर का नहीं होता। कोई सामान्य, कोई अच्छा तो कोई बहुत अच्छा होता है। ऐसा करने से शोध मूल्यांकन प्रक्रिया निश्चित रूप से थोड़ी जटिल हो सकती है। कुछ शोधार्थी असहमति भी व्यक्त कर सकते हैं। पर यह निश्चित है कि अगर ऐसा होता है तो शोध की गुणवत्ता और उपयोगिता बढ़ेगी, शोधार्थी अपने शोध विषय में व्यावहारिक रूप से निपुण होगा, शोध विषय का विशेषज्ञ होगा और उसका मान-सम्मान बढ़ेगा।

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