ट्रांसपोर्टरों के जख्मों पर मरहम

दिल्ली-एनसीआर में 10 से 15 साल पुरानी डीजल गाड़ियों पर रोक लगाने के एनजीटी के फरमान के बाद ट्रांसपोर्टरों में हड़कंप मचा हुआ है।

DTC, Delhi Transport Corporation, Delhi Kathmandu Bus service, India nepal, NGT, RTO, news, India news, World news, International newsदिल्ली-एनसीआर में डीटीसी की वातानुकूलित (एसी) बसों में सफर करना अब महंगा हो गया है, क्योंकि किराये में तत्काल प्रभाव से 10 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी गई है

दिल्ली-एनसीआर में 10 से 15 साल पुरानी डीजल गाड़ियों पर रोक लगाने के एनजीटी के फरमान के बाद ट्रांसपोर्टरों में हड़कंप मचा हुआ है। वहीं ट्रांसपोर्टरों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए दिल्ली सरकार ने भरोसा दिया है कि वह दिल्ली-एनसीआर से बाहर इन पुरानी गाड़ियों को चलने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी कर सकती है। हालांकि एनजीटी के फैसले के बाद दिल्ली के ट्रांसपोर्टर सरकार की नीति को लेकर आशंकित हैं, उनका कहना है कि अगर सरकार को वास्तव में ट्रांसपोर्टरों के हित का खयाल होता तो वह कुछ समय पहले ही नीति बनाकर रखती। अब जब एनजीटी की तरफ से गाड़ियों पर रोक लगाने का फैसला आया है तो सरकार ने इस ओर सोचना शुरू किया है।

ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि सरकार की डीजल गाड़ियों को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। वह केवल गाड़ियों को अपंजीकृत किए जाने के मामले में आरोप से बचना चाहती है। ट्रांसपोर्टरों ने आशंका जताते हुए कहा कि अगर सरकार ने 10 से 15 साल पुरानी डीजल गाड़ियों को हटाने का फैसला कर दिया तो ट्रांसपोर्टरों के भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।

ट्रांसपोर्टरों का मानना है कि गाड़ियों में इंजन पुराना होता है और नया इंजन बदलकर भी काम चलाया जा सकता है। इससे प्रदूषण से भी बचा जा सकता है, लेकिन सरकार की ओर से ऐसी कोई सोच नहीं है। अगर सबको गाड़ी बदलने को कहा गया तो हजारों की संख्या में सिंगल आॅपरेटर मारे जाएंगे क्योंकि उनकी आजिविका इन्हीं गाड़ियों पर टिकी होती है और वो 15 से 20 लाख की नई गाड़ी कहां से लाएंगे।
युनाइटेड फ्रंट आॅफ ट्रांसपोर्ट यूनियन (उफ्टा) के महासचिव श्यामलाल गोला का कहना है कि सरकार अदालत में हमारा पक्ष क्यों नहीं रखती। एनजीटी के सामने वकील जो दलील देते हैं, उसी पर फैसला सुनाया जाता है।

सरकार के वकील जो पक्ष रखते हैं, केवल वही सच्चाई नहीं होती। ट्रांसपोर्टरों की व्यवहारिक समस्याओं के बारे में भी सोचा जाना चाहिए था। जब 10 से 15 साल पुरानी गाड़ियों को अपंजीकृत करने का फैसला आ गया है तो नीति बनाने की अफवाह फैलाई जा रही है। सरकार डीजल गाड़ियों को अपंजीकृत करने को लेकर किसी विवाद में नहीं फंसना चाहती। श्यामलाल गोला ने कहा कि गाड़ियों को अपंजीकृत करने का फैसला बहुत जटिल होता है। इसमें सरकार को पुरानी गाड़ियों के उन मालिकों को चिह्नित कर सबसिडी भी देनी चाहिए जो कमजोर स्थिति में हैं, वरना कई परिवार तबाह हो जाएंगे।

उफ्टा के चेयरमैन हरीश सबरवाल का कहना है कि अगर 10 से 15 साल पुरानी गाड़ियों को हटाना ही है तो उन्हें साल दर साल क्रमवार हटाया जाना चाहिए। अगर सरकार और प्रशासन एक साथ 10 से 15 साल के बीच की पुरानी गाड़ियों को हटाने पर अमादा हो जाएगा, तो ट्रांसपोर्टर बदहाली की कगार पर आ जाएंगे। सरकार को पहले 15 साल पुरानी गाड़ियों को फिर 14 साल और फिर 10 साल पुरानी गाड़ियों को अपंजीकृत करना चाहिए, जिससे कुछ ट्रांसपोर्टरों को अपनी गाड़ी बेचने या बदलने के लिए समय मिल जाए।

सबरवाल का कहना है कि दिल्ली सरकार के पास परिवहन नीति होती तो किसी को भी अदालत जाने की जरूरत नहीं पड़ती। उफ्टा के अध्यक्ष कुलतरण का कहना है कि एनजीटी के फैसले को लेकर मुख्यमंत्री केजरीवाल और परिवहन मंत्री सत्येंद्र जैन से मुलाकात की गई है। सरकार की ओर से कहा गया है कि एनजीटी के फैसले की कॉपी देखने के बाद ही वह इस बारे में कुछ ठोस कदम उठाएगी। कुलतरण ने कहा कि सरकार ने भरोसा दिया है, आगे क्या होता है यह देखना होगा। उन्होंने कहा कि सरकार को पहले से ही नीति बनाकर रखनी चाहिए थी।

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