JIFF 2016: साईंटिफिक एलिमेन्ट्स के बोझ तले दबते जा रहे हैं बच्चे - गगन मिश्रा - Jansatta
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JIFF 2016: साईंटिफिक एलिमेन्ट्स के बोझ तले दबते जा रहे हैं बच्चे – गगन मिश्रा

भविष्य का बेहतर देश और दुनियाँ बनानी है तो बच्चों को सजाना है संवारना है। बच्चे आज भारी भरकम बस्ते, अधिकतम आंक लाने की दौड़, साईंटिफिक एलिमेन्ट्स के बोझ तले दबते जा रहे है।

लव और रोमांटिक सिनेमा पर लेखक और पत्रकार ईश मधु तलवार से फिल्म लेखक डा. दुष्यंत, चिल्ड्रन विषय पर गगन मिश्रा से और एनीमेशन में बढ़ती संभावनाओं पर डा. विभूति पाण्डे और देवेश शर्मा से रीतु वर्मा और प्रघ्या राठौर ने चर्चा की।

भविष्य का बेहतर देश और दुनियाँ बनानी है तो बच्चों को सजाना है संवारना है। बच्चे आज भारी भरकम बस्ते, अधिकतम आंक लाने की दौड़, साईंटिफिक एलिमेन्ट्स के बोझ तले दबते जा रहे है। हम बच्चों को दादी-नानी से दूर करते जा रहे हैं। हम उन्हें फैमिली रूट्स सीखा ही नहीं रहे हैं। यह कहना है लेखक गगन मिश्रा का। आज केवल बच्चों को साईंटिफिक नॉलेज तो दे रहे है पर संस्कारों से दूर हटा रहे हैं। इसका सीधा असर उनके मानसिक विकास पर पड़ रहा है। इस तरह से बच्चों का मेकैनिजम माईंड तो डवलप हो रहा पर उनमें मानवीयता और संवेदनाओं से दूर हटाते जा रहे हैं। ये बातें उन्होंने गोलछा सिनेमा में 22 मई तक जिफ दावरा आयोजित किए जा रहे रहे 8 दिवसीय “16 इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टीवलस” के पांचवे दिन बयां की। इस दौरान लव और रोमांटिक सिनेमा पर लेखक और पत्रकार ईश मधु तलवार से फिल्म लेखक डा. दुष्यंत, चिल्ड्रन विषय पर गगन मिश्रा से और एनीमेशन में बढ़ती संभावनाओं पर डा. विभूति पाण्डे और देवेश शर्मा से रीतु वर्मा और प्रघ्या राठौर ने चर्चा की।

गगना का कहना है कि बच्चों को जरूरत है उन्हें ररूटस की तरफ ले जाना। रीजनल नॉलेज और भाषा की जानकारी देना। मॉरल एजुकेशन को बढ़ावा देना। किताबों के साथ साथ फिल्म एजुकेशन को बढ़ावा देना। फिल्मों के माध्ययम से बच्चे जल्दी सीख पाते हैं। फिल्म एजुकेशन टेक्स्ट एजुकेशन से सरल और आसान है। जैसे बच्चों को चिल्ड्रंस ऑफ हेवन और तारें जमीन पर फिल्में बहुत अच्छी लगी। 18 मई को इसी फेस्टीवल में दिखाई गई फिल्म यारो समझा करो से बच्चों को बहुत सारी जानकारी मिली और बच्चो ने इसे आत्मसात किया, 11 साल का राजेश कहता है फिल्म देखकर पता चला की स्कूल वाले भी कितने गलत हैं, हमारी माता पिता भी गलत कर रहे होतें है कई बार, मैंने सीखा की हमें एक दूसरे बच्चों की मदद कैसे करनी चाहिए।

एनिमेशन के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं की कोई कमी नहीं है – डा. विभूति पांडे
भारत में एनीमेशन का बाजार 2005 के आस पास तेजी से बढ़ा। कई एनीमेशन एकेडमीज खुली। अकेले जयपुर में ही 10 से ज्यादा एकेडमीयां खुली। राजस्थान सरकार ने भी खोली। पर ज्यादातर बंद हो गई। इसके बाद भारत में कुछ एनीमेशन फिल्में भी बनी। जैसे गोविंद निहलानी ने कमलू बनाई, निखिल आडवाणी ने देहली सफारी बनाई, किरीट खुराना ने अजय देवगन और काजोल को लेकर टूनपुर का सुपर हीरो बनाई पर सभी फ्लाप रही। इसका कारण है, इनका प्रोडकसन कमजोर रहा। जबकी हॉलीवुड की फिल्मों में एक्शन, थ्रीलर और एडवेंचर खूब होता है। अभी चल रही जंगल बूक को ही देख लीजिये बच्चे और लोग पसंद कर रहे हैं। इतनी तो शाहरुख खान की फिल्म भी नहीं चल पाई।

मोटी मोटी बात ये है की भारत में होम एनीमेशन प्रोडकसन कम है जबकी यहाँ हॉलीवुड के काम ज्यादा आता है। भारत में एनिमेसन पढे बच्चे जो काम कार रहे हैं वो बाहर का प्रोडकसन है। बाहर वालों के लिए यहाँ काम सस्ते में हो जाता है।नइस तरह से एनीमेशन के फिलड़ में रोजगार तो हैं। फिर एनीमेशन का जॉब अब वी एफ एक्स में बदल रहा है जैसे बाहुबली में वी एफ एक्स का बहुत काम हुआ है। भारत में हजार से ज्यादा फिल्में बनती पर पिछले सालों में एनिमेसन एक भी नहीं बनी। हाँ शॉर्ट एनीमेशन जरूर बन रही है। पर भविष्य के लिहाज ये इंडस्ट्री अच्छी है। यहाँ रोजगार काफी है।

रोमांटिक सिनेमा जीवन में सोमरस की तरह है – ईशमधु तलवार
फिल्मों में रोमांटीकता शुरू से ही है जैसे हमारे जीवन में। पहले सामाजिक मर्यादाएं ज्यादा कठीन थी सो फिल्मों में रोमांटिक सीनस को पक्षीयों आदि के माध्यम से दिखाया गया था। जैसे दो पक्षियों को चोंच लड़ाते हुये। पहले की फिल्मों में रोमांस के साथ सवेन्दानाओं की ज्यादा अहमियत थी। राजेशा खन्ना की तो एक बड़ी पहचान ही रोमांटिक स्टार के रूप में बन कर उभरी। पर आज के सिनेमा में दर्शनीयता ज्यादा है इसमें कामुकता और फूहड़ता ज्यादा आ गई है।
कोई भी रोमनतिक फिल्म देखिये वो हमारे जीवन में सोमरस की तरह होती है। हम उस फिल्म से जुडते चले जाते हैं। हम हमेशा से इस तरह की फिल्में पसंद करते आए हैं। हमारी हिंदी फिल्में तो बिना रोमानटिकता या रोमांस के अधूरी सी है। और इसके बिना फिल्म देखनबा हमारी लिए भी एक अधूरापन सा लगता है।

चर्चा के बाद 11 फिल्मों की स्क्रीनिग की गई
गोलछा की नाईल में राजस्थान से अकीब मिर्जा की शॉर्ट फिल्म बलरड एस्पेक्ट, अमेरीका से अनिमेशन फीचर फिल्म एडवेंचर अप्पू और गप्पु तथा अमित रंजन विश्वाश के निर्देशन में बनी रोमांटिक बंगाली फीचर फिल्म ब्रिज भारत से दिखाई गई। दो अजनबी, इस फिल्म को देश विदेश में सराहा जा रहा है। फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई है।

“अप्पू और गप्पू” 60 मिनट की एनीमेशन फीचर फिल्म हैं। इसकी कहानी में अप्पू और गप्पू है और 11 साल की उम्र में जो सबसे अधिक लोकप्रिय जासूसी जोड़ी बन गए हैं, और दुनिया उन्हे जानने लगती है। बच्चों ने फिल्म को बहुत पसंद किया और एंजॉय किया। ग्राउंड फ्लोर पर एक अनिमेशन फीचर फिल्म द रिटर्न ईरान से और 7 शॉर्ट एनिमेशन फिल्में यूके, अमेरीका, जर्मनी, चाईना और सायप्रस से स्क्रीन हुई।

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