हंस की भूमिका - Jansatta
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हंस की भूमिका

०यादव के संपादन में ‘हंस’ ने न सिर्फ साहित्य को एक नई दिशा दी, बल्कि इसने सामाजिक विचार में बदलाव की कसौटी पर एक बड़ी भूमिका निभाई। उनकी भूमिका के बारे में क्या सोचते हैं?

Author January 24, 2016 1:44 AM
संजय सहाय से मृणाल वल्लरी की बातचीत के अंश

०यादव के संपादन में ‘हंस’ ने न सिर्फ साहित्य को एक नई दिशा दी, बल्कि इसने सामाजिक विचार में बदलाव की कसौटी पर एक बड़ी भूमिका निभाई। उनकी भूमिका के बारे में क्या सोचते हैं?
ल्लमुझे राजेंद्रजी की क्षमता पर आश्चर्य होता है। उन्होंने अट्ठाईस सालों तक निर्बाध ‘हंस’ को निकाला। वे कहीं से भी विज्ञापन नहीं लेते थे। वे अपनी तरह के आदमी थे। कहीं से कुछ सरकारी मदद मिल गई तो ठीक है नहीं तो वे अपने तरीके से काम निकाल ही लेते थे। उन्होंने जिस तरह काम किया वह अद्भुत था। जीवट का काम था। मैं बेहिचक कह सकता हूं कि यह किसी और के बूते की बात नहीं है। हम तो सिर्फ आकर बैठ गए हैं। यह श्रेय उनका है। उन्होंने ‘हंस’ को जो आयाम दे दिया है उस जगह तक पहुंचना मुश्किल था, लेकिन इस आयाम को आगे बढ़ाना उतना मुश्किल नहीं है।

०साहित्य में स्त्री विमर्श और दलित प्रश्न को ‘हंस’ ने जो स्थापना दी, इस लिहाज से आगे का ‘हंस’ क्या रुख अख्तियार करेगा और समाज में साहित्य की प्रत्यक्ष भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए क्या योजनाएं हैं? ल्लस्त्री विमर्श, दलित विमर्श या हाशिये पर पड़े लोगों का विमर्श हो या अन्य माइनॉरिटी की समस्या हो, इसमें अभी तक हमने कोई बदलाव नहीं किया है। राजेंद्रजी ने अपनी विरासत सोच-समझ कर छोड़ी थी। सौंदर्यबोध को लेकर मेरी उनसे बहस चलती रही है। वे कहा करते थे कि हमें सौंदर्य-शास्त्र का नया बोध बनाना होगा। लेकिन इस पर मेरा उनसे हमेशा मतभेद रहा। मेरा मानना रहा है कि यह बनी-बनाई नहीं होती। और अगर यह लीक पर चल रही होती तो आज भी हम क्लासिक में सिर्फ कालिदास को ही पढ़ रहे होते। साहित्य बदलता रहता है और उसे लिखने-पढ़ने और देखने-समझने का नजरिया भी। तो फिर सौंदर्यबोध कहां ठहरा रहेगा। इसलिए हम सौंदर्यशास्त्र को किसी खास ढांचे में फिट नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा साहित्य, समाज और राजनीति को लेकर राजेंद्रजी के जो सरोकार थे, वे हमारे लिए उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। और आज भी ‘हंस’ की ताकत समाज से जुड़े सरोकार हैं। हम इनकी बात करना छोड़ देंगे तो ‘हंस’ की ताकत कहां बचेगी। हाशिये को केंद्र में लाने की जंग जारी रहेगी।
०शुरुआत से ही ‘हंस’ प्रेमचंद के साथ अपनी एक खास छवि में चला और राजेंद्र यादव के नेतृत्व में इस साहित्यिक पत्रिका ने राजनीति को भी अपने विश्लेषण का हिस्सा बनाया। अब आप ‘हंस’ को कहां देखते हैं?
ल्लप्रेमचंद के समय में राजनीति पर बहुत मुखर होकर संपादकीय नहीं लिखा जाता था। ‘हंस’ उस समय भी साहित्यिकके साथ राजनीतिक पत्रिका भी थी। राजनीति और समाज को लेकर इसके कंसर्न का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि इसके साथ महात्मा गांधी भी जुड़े थे। गांधी राजनीति में अंतिम आदमी की अवधारणा को लेकर आए थे, और ‘हंस’ की भी बुनियाद अंतिम जन तक पहुंचने की रही है। साहित्य और राजनीति को किसी भी तरह से अलग नहीं किया जा सकता। राजनीति से अलग होने के बाद तो साहित्य अपठनीय और कूड़ा हो जाएगा। इसी तरह साहित्य को अर्थशास्त्र से भी अलग नहीं किया जा सकता है। राजेंद्रजी ने अपने संपादकीय के जरिए बहुत से विमर्श शुरू किए। बजरिए साहित्य, समाज और राजनीति में मानवीय मूल्यों को स्थापित करने में उनका बहुत बड़ा हाथ रहा है। उस समय जब कहा जाता था कि स्त्रियां और दलित क्या साहित्य लिखेंगे। राजेंद्रजी अपने तरीके से इन वंचित तबकों की साहित्य में घुसपैठ कराने में जुटे थे। तमाम तरह के वर्चस्वों से लड़कर कब ये कलम पकड़ कर लिखने भी लगे और इनकी गूंज समाज में सुनाई देने लगी, यह पता भी नहीं चला। राजेंद्रजी ने साहित्य की दुनिया में वंचित तबकों को जो जगह दिलाई उसे इतिहास याद रखेगा। और, ‘हंस’ का अभी का जो तेवर है वह राजनीति को अपने आप से अलग कर नहीं देख सकता। हम समाज को पीछे ले जाने वाली हर तरह की राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों का विरोध करते रहेंगे। ‘हंस’ ‘एंटी इस्टैबिलशमेंट’ की पत्रिका है, यह ‘हंस’ का चरित्र है। सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लिखे जाने वाले साहित्य की ‘हंस’ ने अगुआई की है और करता भी रहेगा।
०वर्तमान हालत में जिस तरह के सामाजिक द्वंद्व और टकराव उभर रहे हैं, उसके मद्देनजर सहिष्णुता-असहिष्णुता की बहस को आप कैसे देखते हैं?
ल्लसमाज में धर्म के आधार पर असहिष्णुता बढ़ी है। और अभी इसे लेकर हुई बहस में बहुत सी चीजों का मखौल बनाया जा रहा है। हमने हमेशा धर्मनिरपेक्षता की बात की है। आज के दौर में धर्मनिरपेक्षता को मजाक बना देने में बहुत सी राजनीतिक पार्टियों की गलती रही है। धर्मनिरपेक्षता को मजाक बना देना अपने-आप में बहुत घृणित काम है। राजेंद्र यादव धर्मनिरपेक्ष आदमी थे। इस मामले में वे सच्चे आदमी थे और उन्होंने अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। जो लोग सहिष्णुता के अवरोधक थे, उन सबने मिलकर असहिष्णुता का मखौल उड़ाया। चीजों को वीभत्स तरीके से घृणित किया जा रहा है। धर्मनिरपेक्षता का मखौल उड़ाना बहुत खतरनाक है, यह हमारी पूरी साझी विरासत को नष्ट कर देगा।
०समाज और राजनीति के परिदृश्य में मुख्यधारा के मीडिया, खासकर टीवी चैनलों ने जो आक्रामक रवैये के साथ मत-निर्धारण में एक ताकतवर भूमिका हथिया ली है, उसमें आप ‘हंस’ व दूसरी साहित्यक या लघु पत्रिकाओं की भूमिका को कहां पाते हैं?
ल्लटीवी चैनल तो अपने मालिक की मर्जी से चल रहे हैं। चैनलों पर छिड़ी कोई भी बहस कभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती है। बहस को किसी अंजाम पर पहुंचना भी नहीं चाहिए। चैनलों पर बहस के बहाने लोग सिर्फ अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हैं। वे एक-दूसरे को बोलने नहीं देते हैं। चैनलों पर जगह पाया हर व्यक्ति न्यायाधीश बनने की कोशिश में लगा रहता है। ये जिस तरह की बहस करते हैं और अपनी राय थोपने की कोशिश करते हैं उसे हम तार्किक रूप से फासिज्म की श्रेणी में रखते हैं। हां, कुछ एक ऐसे चैनल हैं जहां एकतरफा और आदेशात्मक बहस नहीं होती है। विचारधारा को थोपने के इस भयावह दौर में मुझे प्रिंट मीडिया से बहुत उम्मीद है। पूरे देश में ऐसी हजारों लघु पत्र-पत्रिकाएं निकल रही हैं जो समाज के बिगड़ते तानेबाने पर सवाल उठा रही हैं, बहुलतवावादी समाज के लिए आंदोलन की जमीन बना रही हैं। बिना राजनीति के साहित्य कुछ होता ही नहीं है। हजारों सालों से सुनाए जा रहे राजा-रानी के किस्सों की राजनीति को सुनिए और समझिए। हर जमाने की कहानियों में राजनीति और अर्थशास्त्र पर अपने तरह से सवाल उठाए गए हैं। शेक्सपियर के लगभग सारे नाटक राजनीति के दांव-पेच का ही मंचन करते हैं। प्रेमचंद की कोई भी कहानी उठा कर देख लीजिए, उसमें आपको उस समय की पूरी सामाजिक और आर्थिक सोच मिलेगी।
०साहित्य की दुनिया और समाज में नई पीढ़ी के मद्देनजर ‘हंस’ की क्या योजनाएं हैं?
ल्ल‘हंस’ ने ‘घुसपैठिया’ शीर्षक से स्तंभ शुरू किया था। इसमें विस्थापित बच्चों की कहानियों को जगह दी गई है। एक एनजीओ के जरिए हम इन बच्चों से मिले थे। बच्चों ने जिस तरह से समाज का विश्लेषण किया है वह गौर करने लायक है। घुसपैठिया के जरिए हमने महसूस किया कि बच्चों की भी कहानी पर कितनी मजबूत पकड़ हो सकती है। नई पीढ़ी को साहित्य और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने के लिए हम और भी कोशिश करेंगे।

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