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सरोकार की पत्रिकाएं

पत्रिकाओं के इतिहास से परिचित कोई भी व्यक्ति शायद से इस बात से असहमत होगा कि विशुद्ध साहित्यिक अवदान के साथ-साथ हिंदी भाषी समाज के भीतर आधुनिक चेतना निर्माण में पत्रिकाओं ने यथाशक्ति योगदान दिया है।

Author January 24, 2016 1:40 AM
हिंदी भाषी समाज के भीतर आधुनिक चेतना निर्माण में पत्रिकाओं ने यथाशक्ति योगदान दिया है

पत्रिकाओं के इतिहास से परिचित कोई भी व्यक्ति शायद से इस बात से असहमत होगा कि विशुद्ध साहित्यिक अवदान के साथ-साथ हिंदी भाषी समाज के भीतर आधुनिक चेतना निर्माण में पत्रिकाओं ने यथाशक्ति योगदान दिया है। पत्रिकाओं ने अपने युग के वैचारिक और सांस्कृतिक आंदोलनों को स्वर देते हुए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया के साथ कंधे से कंधा मिला कर अपना सफर तय किया है।

साहित्यिक पत्रिकाओं की युग सापेक्षता का सर्वाधिक मुखर प्रमाण हमें साठ और सत्तर के दशक में देखने को मिलता है, जब लघु पत्रिकाओं का आंदोलन शुरू होता है। उस समय 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद पूरे देश में ‘मोहभंग’ का वातावरण था तो दूसरी तरफ 1967 में सशक्त क्रांति का बिगुल फूंकता नक्सलबाड़ी आंदोलन शुरू हुआ। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उच्च मूल्यों और आदर्शों से प्रेरित होकर लेखकों और अन्य हिंदी सेवियों संस्थानों से निकलने वाली पत्रिकाएं एक-एक कर बंद होती गई थीं।

इनकी जगह बड़े कारोबारी घरानों की पत्रिकाओं-धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान का आधिपत्य हो गया। व्यवस्था परिवर्तन के स्वप्न के साथ लेखकों की एक पूरी क्रांतिकारी पीढ़ी सामने थी, जिन्हें ये पत्रिकाएं छापने में संकोच करती थीं। ऐसे में इन लोगों ने अपनी अभिव्यक्ति को स्वर देने के लिए खुद ही पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया। इस तरह, देश भर में अपनी अभिव्यक्ति को मंच देने के लिए लघु पत्रिकाएं निकलने लगीं। मार्क्सवादी विचारों से ओत-प्रोत प्रतिरोध और संघर्ष को स्वर देती अनेकानेक लघु पत्रिकाएं देखते-देखते ही भिन्न -भिन्न जगहों से निकलने लगीं। इनकी सीधी लड़ाई सरकारी और गैरसरकारी पत्रिकाओं से निकलने वाली पत्रिकाओं से थी। यह कोई सचेत या व्यवस्थित सांगठनिक आंदोलन नहीं थी, लेकिन इससे एक आंदोलन जैसा वातावरण तो तैयार हो ही गया था।

साहित्यिक रचनाशीलता की नजर से देखें तो यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि उस दौर में लघु पत्रिकाओं ने धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी ‘रंगीन’ व्यावसायिक पत्रिकाओं से अपने को श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया था। वैसे लघु पत्रिका की अवधारणा बहस तलब है। किसे लघु पत्रिका कहेंगे और क्यों? लघु पत्रिका के इतिहास को साठ और सत्तर के दशक से ही क्यों शुरू किया जाए? साहित्यिक पत्रिकाओं को लघु पत्रिका क्यों नहीं कहा जाता है ? भारतेंदु या प्रेमचंद लारा निकाली गई पत्रिकाएं लघु पत्रिकाएं क्यों नहीं हैं ? आदि-आदि।

दरअसल, पूर्ववर्ती समय में लघु और वृहद् की कोई अलग कोटि नहीं थी। लगभग सभी पत्रिकाएं एक ही तरह की थीं। उनमें विषयगत भिन्नता तो होती थी, लेकिन उनके उद्देश्यों और हितों में कोई स्पष्ट टकराहट नहीं थी। इस बहस में अधिक न उलझते हुए मोटे तौर पर हम यही कह सकते हैं कि स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ व्यक्तिगत स्तर पर एक लाभरहित उपक्रम के तौर पर प्रकाशित प्रतिरोधी-चरित्र वाली पत्रिका ही लघु पत्रिका है। सत्तर के दशक में बनी यह धारणा धीरे-धीरे लचीली होती गई। बाद में तो सरकारी या गैरसरकारी प्रतिष्ठानों से निकलनेवाली पत्रिकाओं को छोड़ कर लगभग सभी को लघु पत्रिका की श्रेणी में रख लिया गया।

लघु पत्रिकाओं के संगठन और आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने के लिए 29-30 अगस्त को कोलकाता में लघु पत्रिकाओं के संपादकों की संपन्न हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि सरकारें लघु पत्रिकाओं को भी विज्ञान दें। स्पष्ट है, क्रांतिकारिता के तेवर को ऊपरी तौर पर बरकरार रखते हुए लघु पत्रिकाएं विज्ञापनवाद की जमीन पर समझौते के लिए तैयार हो रही थीं, जिसका भयंकर दुष्परिणाम आगे के वर्षों में दिखाई दिया।
इस बीच एक बड़ी घटना यह हुई कि धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी बड़े घरानों की पत्रिकाएं एक-एक कर बंद हो गर्इं। यानी जिन पत्रिकाओं के विरुद्ध लघु पत्रिका आंदोलन शुरू हुआ था, वे दिवंगत हो गर्इं। अब लघु पत्रिकाओं के सामने कोई चुनौती नहीं रह गई थी।

सत्तर, अस्सी और नब्बे का दशक लघु पत्रिकाओं के फलने-फूलने और प्रभावी होने का समय है। इस दौर में देश के भिन्न-भिन्न भागों में प्रगतिशील चेतना से संपन्न आंदोलनधर्मी पत्रिकाएं अस्तित्व में आर्इं। ये पत्रिकाएं एक मिशन के तौर पर निकाली गर्इं। जिन दो पत्रिकाओं से हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य में भारी हलचल पैदा हुई वे हैं ‘पहल’ और ‘हंस’। अस्सी और नब्बे का दशक इन दो पत्रिकाओं के नाम रहा। ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ को एक आंदोलन का रूप दिया और देशभर में प्रतिबद्ध लेखकों-विचारकों की एक पूरी पीढ़ी को उससे जोड़ा तो दूसरी तरफ 1986 में ‘हंस’ की शुरुआत की राजेंद्र यादव ने। वर्ग आधारित विश्लेषण से थोड़ा अलग हटकर अस्मितामूलक विमर्शों की राह पकड़ी उन्होंने, जिसके केंद्र में दलित, स्त्री और अल्पसंख्यक थे।

राजेंद्र यादव ने नई सामाजिक शक्तियों के उभार को भांप लिया और बिना देर किए वे उसके साथ हो लिए। राजनीति में जो काम वीपी सिंह ने किया, साहित्य में वही काम राजेंद्र यादव और ‘हंस’ ने किया। लेकिन, राजेंद्र यादव ने मंडल राजनीति के स्त्री विरोधी चरित्र से अलग होकर स्त्रियों का पक्ष लिया। 1999 में अखिलेश के संपादन में निकली पत्रिका ‘तद्भव’ ने लघु पत्रिका की अवधारणा और चरित्र दोनों को बदल दिया। अखिलेश ने दिखाया कि बगैर व्यावसायिक हुए और सामग्री से समझौता किए बिना भी लाखों के विज्ञापन जुटाए जा सकते हैं।

साहित्यिक पत्रिका के माध्यम से भी एक बेहतर जीवन-यापन के साधन जुटाए जा सकते हैं। ‘तद्भव’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने रचनात्मक उत्कृष्टता से कभी समझौता नहीं किया और इस चरित्र के साथ आज उसे श्रेष्ठ पत्रिका मानने में शायद ही किसी को संकोच हो। 1999 में पंकज बिष्ट के संपादन में ‘समयांतर’ की शुरुआत हुई। इस पत्रिका को सही अर्थों में लघु पत्रिकाओं की पुरानी विरासत की वाहक पत्रिका कहा जा सकता है। बदलते दौर में भी इस पत्रिका ने सच्ची आंदोलनधर्मिता और जनपक्षधरता को बरकरार रखा है। यह पत्रिका उन आवाजों को मंच देती है जिसे बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएं और अखबार जगह नहीं देते हैं। पहल, हंस, तद्भव और समयांतर ये लघु पत्रिकाओं के चार अलग-अलग स्वरूप के श्रेष्ठ प्रतिनिधि उदाहरण हैं।

हिंदी में लघु पत्रिकाओं की व्यापक और उल्लेखनीय भूमिका से शायद ही किसी को इनकार हो। नब्बे के बाद से आज तक के समय पर जिन चार घटनाओं का व्यापक असर है, वे हैं- मंडल, कमंडल, सोवियत संघ का विघटन और बाजार। मंडल को छोड़, इन तीनों घटनाओं ने दुनिया को सुंदर बनाने की जगह उसे और विकृत किया है। मंडल का भी जवाबी जातिवादी राजनीति वाला पक्ष भी खतरनाक ही साबित हुआ है। इससे जातिवाद खत्म होने की जगह और मजबूत हो रहा है। लघु पत्रिकाएं समाज को असुंदर बनाने वाले तत्त्वों से लगातार जूझ रही हैं। जातिवाद, सांप्रदायिकता और बाजारवाद के विरुद्ध लघु पत्रिकाओं की अवाज को हर समय और हर जगह महसूस किया जा सकता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया एक ध्रुवीय बन गई। लघु पत्रिकाओं ने कम से कम हिंदी साहित्य की दुनिया को एक ध्रुवीय बनने नहीं दिया है। यह किसी

महत्त्वपूर्ण उपलब्धि से कम नहीं है। साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता का जितना मुखर विरोध हिंदी की लघु पत्रिकाएं कर रही हैं, उतना शायद किसी दूसरी भारतीय भाषा में हो रहा होगा। अंग्रेजी में तो सवाल ही नहीं है। साहित्य में रुचि लेखन वाला और साहित्य रचने वाला मनुष्य स्वभावत: प्रगतिशील होता है। देश के भिन्न-भिन्न भागों से निकल रही लघु पत्रिकाओं के पास कम से कम चार-पांच प्रगतिशील सोच वाले लोगों की टीम है जो अपने-अपने शहरों-कस्बों में मनुष्य विरोधी विचारों से न सिर्फ लड़ रही हैं बल्कि नए-नए लोगों को मंच देकर उन्हें एक बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए प्रेरित भी कर रही हैं। एक ऐसे दौर में जब पूरे देश में प्रधान प्रवृत्ति बाजारवाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता की हो गई है, तब अगर हिंदी साहित्य की दुनिया साम्राज्यवाद और बाजारवाद विरोधी और घोर सांप्रदायिकता विरोधी बनी हुई है तो इसमें निस्संदेह लघु पत्रिकाओं की बड़ी भूमिका है।
साहित्यिक पत्रिकाओं के संबंध में यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है कि उनके लिए संसाधन तो चाहिए पर केवल संसाधनों से ये पत्रिकाए उल्लेखनीय या हस्तक्षेपकारी नहीं बन सकती हैं। संपादकीय विजन और प्रतिबद्धता ही उसे खास बनाती है। हिंदी में अभी सरकारी संस्थाओं और प्रकाशको के यहां से कई पत्रिकाएं निकल रही है। ऐसी पत्रिकाओं के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है। फिर भी हिंदी की श्रेष्ठरचनाधर्मिता इन पत्रिकाओ से बाहर है।

भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ और भारतीय भाषा परिषद की पत्रिका ‘वागर्थ’ हर महीने निकलती भी है और लोगो के पास पहुंचती भी है। पर थोड़ी भी हलचल पैदा नही कर पाती है। ऐसा लगता है की राजकमल प्रकाशन की प्राथमिकता में ‘आलोचना’ पत्रिका नही हंै, क्योंकि अपूर्वानंद के संपादक बनने के बाद भी यह समय पर प्रकाशित नहीं हो रही है। वाणी प्रकाशन की पत्रिका ‘वाक्’ की स्थिति और खराब है। प्रभात प्रकाशन की पत्रिका ‘साहित्य अमृत’ को साहित्य की मुख्यधारा से कोई मतलब नहीं है। हां, इधर सामयिक प्रकाशन से निकलने वाली पत्रिका ‘सामयिक सरस्वती’ ने जरूर एक वर्ष में चार अंकों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पर, इसके मूल में भी संसाधन न होकर प्रकाशक की पत्रिका के प्रति निजी रुचि और प्रतिबद्धता है। साधन सम्पन सरकारी पत्रिकाएं तो नखदंत विहीन हैं ही। इनकी तुलना में व्यक्तिगत प्रयासों और कम संसाधनों में निकलने वाली नियमित पत्रिकाएं जैसे- कथादेश, कथाक्रम, लमही, लहक, परिकथा, कथन, उद्भावना आदि साहित्यिक परिदृश्य को अधिक प्रभावित कर रही हैं।

तमाम उपलब्धियों के बावजूद हाल के वर्षों में लघु पत्रिकाओं में कुछ ऐसी प्रवृत्तियां भी दिखाई दे रही हैं जो चिंताजनक है। इस समय हिंदी में जितनी लघु पत्रिकाएं निकल रही हैं, वह अभूतपूर्व है। यह अपने आपमें कम दिलचस्प नहीं है कि जिस दौर में साहित्य के पाठकों की संख्या लगातार कम हो रही है और यह शिकायत आम है कि साहित्य के पाठक नहीं हैं, उस दौर में लघु लपत्रिकाओं की संख्या दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ रही है। इसका एक बड़ा कारण लघु पत्रिकाओं का व्यवसाय में तब्दील हो जाना है। बहुत से लोगों ने पत्रिका को अपने जीविकोपार्जन का साधन बना लिया है। नौकरी न करने की क्षतिपूर्ति के तौर पर पत्रिका का उपयोग किया है और पत्रिका के साथ तमाम तरह के समझौते किए हैं। कुछ लोगों ने पत्रिका को अपने करिअ‍ॅर का साधन बना लिया है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने किसी प्रभावशाली साहित्यकार पर अपनी पत्रिका का अंक केंद्रित कर अपने करिअ‍ॅर को ‘सेट’ कर लिया।

विश्वविद्यालयों में नौकरियां पा लीं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पत्रिका सिर्फ इसलिए निकाल रहे हैं कि उन्हें दो-चार लोग जान सकें और उसके सहारे अपनी ‘नेटवर्किंग’ कर सकें। हिंदी में ऐसे लोगों और पत्रिकाओं की संख्या बढ़ रही है जो अपने मूल उद्देश्य से भटक कर विशुद्ध रूप से सौदेबाजी कर रहे हैं। यह भी अपने आपमें एक विरोधाभास है कि जिस उदारीकरण से पत्रिकाएं लड़ रही हैं, उसीकी अर्थव्यवस्था पत्रिकाओं को खाद-पानी मुहैया करा रही हैं। नहीं तो इस विपरीत माहौल में पत्रिकाओं की बाढ़ कैसे आती! लोग संपादक कम, ‘तिकड़मी’ अधिक हो गए हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आज के दौर में पत्रिका निकालने के लिए साहित्यिक दृष्टि, प्रतिबद्धता या रचनाशीलता की समझ से अधिक विज्ञापन-प्रबंधन में दक्षता बाजी मार रही है। इस प्रवृत्ति में शीघ्र ही सुधार नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब धीरे-धीरे सभी लघु पत्रिकाएं भी प्रतिपक्ष की आवाज न बनकर सत्ता की पहचान बन जाएंगी। आज लघु पत्रिकाओं के सामने उनकी आत्मा खो देने का खतरा है। इसे खोकर उनका बचना असंभव है। यह मायने में यह उनके लिए आत्मचिंतन का समय है। अगर कोई ठहर कर सोच सके तो! ०

 

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