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यादें

बाबा-दादी की शादी की पचासवीं सालगिरह मनाने के बाद हंसी-खुशी के माहौल में ढेर सारे उपहार लिए हम देर रात घर लौटे थे।
Author January 3, 2016 03:01 am

बाबा-दादी की शादी की पचासवीं सालगिरह मनाने के बाद हंसी-खुशी के माहौल में ढेर सारे उपहार लिए हम देर रात घर लौटे थे। कुछ खास रिश्तेदार भी साथ थे। एक विवाहघर में आयोजन किया गया था, जिसके लिए पापा ने अच्छा-खासा खर्च किया था। बाबा-दादी दूल्हा-दुल्हन की तरह सजे थे। सजी हुई दादी मुझे बहुत अच्छी लग रही थीं। मैं दादी का पीछा नहीं छोड़ रही थी और दादी के कमरे में रुक गई। मैं दादी की सबसे लाडली जो थी। मैंने दादी को छेड़ा, ‘बहुत खूबसूरत लग रही हो, दादी!’
मेरी बात से दादी के चेहरे की झुर्रियों में फैलाव आया और वह कुछ शर्मा सी गई, जैसे उन्हें नई-नवेली दुल्हन का भान हो गया हो। उन्होंने मुझे लिपटा लिया। मैं भी उनके गले में दोनों बाहें डाल कर पूरी तरह लिपट गई और पूछ बैठी, ‘अपनी शादी के बारे में बताओ न दादी ?’
उन्होने मेरी ओर देखा, ‘क्या जानना चाहती हो?’
‘जानना चाहती हूं, आज से पचास साल पहले शादी कैसे होती थी, उस समय के परिवारों में जीवन कैसा होता था, मैं आपके बारे में जानना चाहती हंू!’
मेरी उत्सुकता देख दादी मुस्करार्इं और बोलीं, ‘ठीक है।’ और अपनी पुरानी यादों में खो गईं। धीमे-धीमे उन्होने बताना शुरू किया-
हम लोग शहर के बाहर एक सिनेमाघर के पीछे एबटगंज में रहते थे। मेरे दो भाई थे। पिताजी रेलवे में पार्सल बाबू थे और माल-बाबू के नाम से जाने जाते थे। दोनों भाइयों की शादी हो चुकी थी। मैं जब दस साल की थी तब मेरी मां गुजर गई। दोनो भाभियों ने अपना पूरा प्यार मुझ पर ही न्योछावर कर रखा था। भाइयों की तो मैं जान थी। एक बार की बात है, मैं खेलते हुए ठोकर लगने से गिर कर बेहोश गई। बड़ी भाभी खाना खा रही थी और छोटी भाभी अलमारी में कपड़े रख रही थीं। मुझे लहूलुहान देखकर गोद में ले तांगे से रेलवे अस्पताल दौड़ पड़ीं। बताती हैं, जब तक मुझे होश नही आ गया, एक पैर पर खड़ी रहीं जो कभी अकेले घर से बाहर कदम नही रखती थीं। ड्यूटी से घर लौट आने पर दोनो भाई बहुत दुखी हुए और बोले, ‘तुम्हें कुछ हो जाता तो हम क्या करते?’
उस जमाने में शिक्षा का ज्यादा महत्त्व नहीं था। लड़कियों को पढ़ाने की कौन कहे दस वर्ष की होते ही शादी की सोची जाती और उन्हें अनेक नसीहतें सुनने को मिलती थीं। मैं कक्षा पांच ही पढ़ पाई थी कि चौदह वर्ष की उम्र में शादी कर दी गई। पता है, आज तुम्हारे पापा ने आज जितना खर्च किया है, उतने में उस समय बीसियों शादी हो जातीं।
मेरी शादी उसी शहर में हुई। ससुराल में तीन देवर, एक ननद और विधवा सास थी। शादी के कुछ दिनों बाद ही मैंने घर का काम-काज शुरू कर दिया था। रस्म के अनुसार पहली बार खाना बनाने चौके में गई तो मुझे सास ने हलुआ और कढ़ी बनाने को कहा। मैं चौके में खड़ी सोच रही थी, शुरू कहां से करूं! कि ननद आर्इं और बोली, ‘मैं कुछ मदद करूं, आपकी!’ और चार डिब्बे अलमारी से निकाल कर सामने रख दिए, ‘घी, शक्कर, नमक और सूजी हैं।’ और बता दिया कि कैसे क्या बनना है। फिर मंैने काम करना शुरू किया और हलुआ बना कर सास को दे आई। पहले ही दिन सास ने कहा, ‘घर से कुछ सीख कर नही आई क्या? हलुआ में नमक पड़ता है क्या?’
उस दिन खूब हंसी-ठिठोली हुई। घर का सारा काम मुझे ही सौंप दिया गया था। मैं पूरी मेहनत और लगन से काम किया करती। एक साल बीतते तुम्हारे पापा पैदा हो गए और मेरा काम और बढ़ गया। घर में काम को लेकर कलह शुरू हो गई थी- कभी चाय देर से बनी, कभी खाना देर से बना। कोई मदद नही करता, शिकायतें सब करते। किसी को सुबह नाश्ता जल्दी चाहिए तो किसी को चाय, तो किसी को कुछ। सब मुझे ही पुकारते। कोई अपने आप कुछ नहीं करना चाहता। सुबह जल्दी उठ कर चाय बनाना, फिर नहाना। तब चौके में जाकर खाना बनाने की शुरूआत करना, छोटे बच्चे की देख भाल, फिर झाड़ू-पोंछा। शाम होते-होते थककर चूर हो जाती। शाम को तेरे बाबा लौटते तो शिकायतों का पुलिंदा उनके सामने होता, ‘भइया, भाभी ने मुझे ये कहा, वो कहा, खाना नहीं दिया। मेरे कपड़े प्रेस नही हुए, कपड़े धुले नही हैं और भी कई बहाने।’ देवर और ननद कहते, और मां सर्मथन करती! शुरू में डांट-डपट हुई, जो धीरे-धीरे मार-पीट में बदल गई। तब तक दूसरे बच्चे ने जन्म ले लिया था। आए दिन घर में ननद और देवर की लगाई-बुझाई से कलह होती थी!

खा ना तो कई बार गुस्से में मैं नहीं ही खाती थी या मेरे आगे से थाली खींच ली जाती। और मैं भूखी ही सो जाती या आधे पेट पानी पीकर संतोष करना पड़ता। पति कभी कड़वी बात सुनाते और आगे रखी थाली में लात मार कर उठ जाते। कभी-कभी हाथ भी उठा देते। मां, बहन भाइयों से कुछ नहीं कहते, सारा गुस्सा पत्नी पर ही निकलता। ये जब भी ड्यूटी से लौटते, मुझसे पहले मां, बहन, भाई मिलते ,फिर शुरू होती दिन भर की शिकायतें। सुनते ही पति का मूड बिगड़ जाता और सारा गुस्सा पत्नी पर उतरता। हर रोज नए किस्से। एक दिन की बात है। मैं सुबह नौ बजे पीने का पानी लेने पड़ोस चली गई। पीने का पानी पड़ोस से ही आता था, जो मैं ही रोज लाती थी, लौटी तो घर में चीख पुकार मची थी, छोटा बच्चा रो रहा था और सब अपने काम में मस्त थे। ननद किताब पढ़ रही थी, एक देवर जूते में पालिश कर रहे थे, सास तख्त पर बैठी सुपारी काट रही थी-मेरे मुंह से निकल गया-कोई बच्चे को चुप नहीं करा सकता क्या? मेरा इतना कहना था कि सभी पहले से सोचे बैठे थे कि कोई बहाना मिले और सभी पिल पड़े। लात घूसों से मेरी धुनाई शुरू हो गई। छोटा सास की गोद में था जो मन्नू के पापा के बगल मे थोड़ी दूर कमरे के दरवाजे पर खड़ी थी और ननद, दोनों देवर मेरे बाल पकड़े पीट रहे थे और बड़ा जोर से रोता हुआ चिल्ला रहा था, ‘मत मारो मेरी मां को।’ मैं अस्त-व्यस्त थी। बड़े देवर ने मेरे बालों को इतनी जोर से खींचा कि एक लट उनके हाथों में आ गई। मैं वहीं आंगन में बेहाश होकर गिर पड़ी। बड़ा मुझ से लिपट कर रो रहा था कि छोटे देवर बडे का हाथ पकड़ कर एक ओर ले जाने लगे, ‘मुझे चाहे जितना मार लो, मेरी मां को मत मारो।’ वह चिल्लाया। तब तक किसी ने मेरे मुंह पर पानी डाला, मुझे उठाकर पानी पिलाया। पड़ोस की औरतों ने बचाया, ‘क्या मार ही डालोगे बहू को।’ बड़ी देर मैं वहीं बैठी रोती रही। बहुत देर बाद मैं उठी छोटे को गोद लिया और बड़े का हाथ पकड़कर घर से बिना किसी से कुछ कहे निकल पड़ी और मैं बदहवास अस्त-व्यस्त, बिखरे बाल, नंगे पैर, रोते हुए चले जा रही थी। किसी ने पूछा भी- क्या हुआ? लेकिन मुझे होश कहां था? थोड़ी-थोड़ी में बड़बड़ाने लगती, ‘आखिर मेरा कसूर क्या था? जो मुझे इस बेदर्र्दी से लतियाया और घर से निकाल दिया।’ मेरे भाई का घर मेरी ससुराल से एक फर्लांग दूर था। भाई के घर पहुंच कर कुछ नहीं कहना पड़ा, सारी कहानी मेरे आंसुओं ने कह दी। भाई को देखकर रुकी हुई रुलाई फूट पड़ी और वहीं मूर्च्छित हो गई। बड़ा बेटा बोला, ‘मामाजी अम्मा को चाचा, बुआ ने बहुत मारा, खाना भी नहीं दिया।’
‘कोई बात नही बेटा, खाना अभी खा लो।’ फिर कई दिनो तक मैं भाई के घर रही। भाई ने बडेÞ भांजे का दाखिला पास के स्कूल में करा दिया। कुछ दिनों बाद मन्नू के पापा मुझे घर वापस ले गए।
धीरे-धीरे समय बदला। बच्चे बड़े हुए, सास नहीं रही। भाइयों की शादी हो गई। सब अपनी पत्नी को लेकर अलग रहने लगे। समयानुसार देवरानियां अलग हुर्इं और दोष मिला मुझे। भाभी ने मेरी नहीं सुनी, मुझे यह कहा, वह कहा। देवरों ने भाई को सम्मान दिया और मुझे गरियाया। मैं भाभी बड़ी थी, सबसे गाली-लात खाकर भी बुरी हो गई क्योंकि कभी विरोध नहीं कर पाई। दूसरे घर से आई बहू का सबसे बड़ा संबल उसका पति होता है और इस घर में पति ही मेरी तरफ नही था। संयुक्त परिवार के लिए बड़ी बहू का होना सबसे बड़ा अभिशाप था।

छो टी बहुएं महीने-दो-महीने रह कर अपना घर बसा लेती और सास कुछ नहीं कर पातीं। बडी बहू के लिए फिर वही सास रह जाती क्योंकि छोटी बहू तो अपने पति को लेकर ही पैदा हुई होती और वही उनका परिवार होता। सारी जिम्मेदारी बड़ी बहू की होती क्योंकि सास को वही समझती, फिर धीरे धीरे सास भी समझने लगती लेकिन प्यार छोटी बहू ही पाती, जिम्मेदारी बड़ी बहू को। जब सारी जिम्मेदारी बड़ी बहू निभा लेती तब वह अपने परिवार और बच्चों को देख पाती क्योंकि अब उसके बच्चे बड़े हो रहे होते, तब पति को भी अहसास होता कि ये भी मेरी जिम्मेदारी है। तब वह अपने परिवार की ओर देखता तो पाता दबी-कुचली, प्रताड़ित किए जाने की अंधेरी गुफा से निकल कर पत्नी दूसरे संसार में विचरण करने लगी है। मानसिक और शारीरिक बीमारियों से घिरी बच्चों को बड़ा करती अपना सब कुछ भूल, कहीं सहारा ढ़ूंढ़ने की कोशिश करने लगती, सहारा मिलता मंदिरों में।
यही उनके साथ भी हुआ। वे मंदिर जाने लगीं। सत्संग में प्रौढ़ महिलाओं का जमावड़ा जमता। ढोलक की थाप पर राम, कृष्ण, हनुमान, शंकर के जीवन चरित्रों पर फिल्मी तर्ज के भजनों पर जो धमाल होता कि देखने वाले दंग रह जाते थे। नाचने में मेरी दादी का कोई जोड़ नही था। मुहल्ले, पड़ोस रिश्तेदारों की निगाह में यह अजीब था। अड़ोस-पडोस में बैठ कर चुगली, दूसरों की निंदा करना। ढंके-छिपे उलाहने मिलते लेकिन वे इन सबसे बेखबर अपने भगवान में लीन होने लगीं। पूजा-पाठ शुरू हो गया, किसी की फिक्र करना बंद कर दिया था। बातें, नए उलाहनों की पोटली खुलती और नतीजा मुझको भुगतना पड़ता। ‘आज रोटी जली क्यों है?’ रोटी दिखाई जाती और फेंक दी जाती, उनके ऊपर! दाल में नमक ज्यादा है, कटोरी उड़ती हुई आंगन में गिरती, कभी-कभी पूरी थाली ही खाना सहित हवा में उड़ जाती और खाना आंगन में फैल जाता। साफ करना पड़ता मुझे ही, आंखो में आंसू लिए रोती जाती, काम करती जाती। और कौन था घर में काम करने वाला मेरे अलावा। काम करने वाली घर में मैं ही थी, बाकी सभी मौज मस्ती करने वाले थे। घर का पानी भरना, झाडू-पोंछा लगाना, घर के सभी लोगों के कपड़े धोना और सबके लिए खाना बनाना। उस जमाने में बहू को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता, फिर जब वे स्वयं सास बनती तो वह प्रक्रिया दोहराई जाती। अधिकतर बडंÞ़ी बहुओं का किस्सा ही अलग होता।
कमाने वाला और उसकी अर्द्धांगिनी दोनो नरक भोग रहे थे। तीन भाइयों और एक बहन की जिम्मेदारी जो छोड़ कर गए थे उनके पिता।
अक्सर होता कि तीनों भाई एक साथ खाने बैठते, सभी की अच्छी खुराक थी। खाने पर बैठे खाते जाते-खाते जाते और धीरे-धीरे सारे बर्तन खाली हो जाते और मुझे बचा-खुचा खाकर ही रह जाना पड़ता।
धीरे धीरे समय निकलने लगा। बच्चे बड़े हो रहे थे। घर का मुखिया जो अब घर में सुकून चाहता था, वह नदारद था। उसकी कोई बात सुनने वाला नही था। अपनी बातें किससे कहे, यह एक समस्या थी।
मैं घर का सारा काम करती, एक मशीन की तरह। कोई संवेदना नहीं रह गई थी मन में। समय से बच्चों को नाश्ता खाना मिलता ओर पति को सुबह खाने का डिब्बा मिल जाता। पति अपने काम पर निकल पड़ता और शाम को घर आता, थका-हारा। चाहता कि कोई उसके पास बैठे, बातें करे और वह पाता एक बड़ा सा शून्य। तड़प कर रह जाता। कोई उसकी सुनने वाला नहीं था। बच्चे इन सबसे अनजान बेखबर अपने आप में मस्त ख्ोलते, खाते, घूमते, स्कूल जाते, न जाते, जैसा मन करता, जीवन जी रहे थे। मैं कम पढ़ी थी, लेकिन धार्मिक किताबों को पढ़ लेती और भजन लिख लेती या मुहल्ले पडोÞस में नाच गा लेती ढोलक की थाप पर, वे नाचने मे माहिर थीं। किसी के यहां मुंडन न है, जनेऊ है, शादी व्याह है। पहले लोग हफ्तों पहले से तैयारी करते और उस तैयारी के लिए नौ-दस औरतें इकट्ठी हो, गाने-फिल्मी भजन गाते हुए काम जल्दी कर लेतीं, साथ ही मनोरंजन हो जाता, गेहूं बीनते, पापड़ बनाते मुहल्ले पड़ोस की औरतें इकट्ठी हो। एक दूसरे का सहयोग करतीं। इसी के साथ औरतें अपना दुख-सुख साझा करती।
अंतिम बात यह कि बेटा तुम खूब पढ़ना और अपने बच्चों को पढ़ाना। अनपढ़ होना अभिशाप है हम औरतों के लिए। यह सब मेरी दादी ने मुझे बताया जिसे मैंने रिकार्ड कर लिया था, उनकी जानकारी के बिना। वे मुझे आज मी याद आती हंै। उनको गुजरे दस वर्ष गुजर चुके है, लेकिन आज मी मुझे उनकी बाते, यादें उनकी छवि मेरे मन में ताजा हैं। १

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