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‘दिकुओं’ से परेशान अदिवासी

सैकड़ों साल से आदिवासी लोग अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हवन और यज्ञों की आग से इनके जंगल जलाकर संसाधनों की शुरू हुई लूट आज भी जारी है।

Author January 23, 2016 02:33 am

सैकड़ों साल से आदिवासी लोग अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हवन और यज्ञों की आग से इनके जंगल जलाकर संसाधनों की शुरू हुई लूट आज भी जारी है। आज कई आदिवासी नेताओं को ही ‘अश्वमेध’ के घोड़े के रूप में दौड़ाया जा रहा है। ऐसे आदिवासी नेता ‘दिकू’ हुक्मरानों के इशारों पर एक-दूसरे से लड़-भिड़कर संपूर्ण समाज के अस्तित्व को कमजोर कर रहे हैं।
देशभक्ति की सीमा अगर 1857 के विद्रोह से पूर्व तक तलाशी जाए तो तबके तमाम राजा-जमींदार-महाजन देशद्रोही निकलेंगे। लेकिन आदिवासियों का इतिहास देशभक्ति का रहा है। कंपनी सरकार ने आदिवासियों को सीधे खानदेश भील कोर और मेवाड़ भील कोर जैसी टुकड़ियों में भर्ती करके विद्रोही आदिवासियों से ही लड़वाया। यह भी एक वजह है कि 1857 के दौरान कुछ इलाकों के आदिवासी कंपनी सरकार के पक्ष में लड़ते दिखते हैं, जबकि कई इलाकों में देखने को मिलता है कि वे या तो शांत रहे या अपनी सुविधानुसार सक्रिय रहे।
ईसाइयत ने आदिवासियों को निसंदेह सहूलियतें दीं, जिनमें शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं प्रमुख हैं। मगर इनके बदले इनके धार्मिक संस्कारों को प्रभावित करना और उन्हें अंग्रेजी राज के प्रति वफादार बनाने का सिलसिला भी शुरू हुआ। खुद आदिवासियों के हाथों चले सुधार आंदोलन भी मुख्यधारा की सामाजिक-राजनीतिक धारा द्वारा ठगे गए। ताना भगत आंदोलन के उरांवों ने आदिवासी नायकों से उलट मानसिकता वाले महात्मा गांधी को अपना मसीहा स्वीकार किया। आज भी भगत उरांव गांधीवादियों की नजर में तिलका मांझी-बिरसा मुंडा आदि से कई गुना अधिक श्रेष्ठ आदिवासी नायक हैं। आजादी के बाद भी कांग्रेस पार्टी का आदिवासी आंदोलनों को इस्तेमाल करने का सिलसिला जारी रहा।
देश आजाद हुआ और संविधान लागू हुआ। संविधान में ‘आदिवासी’ की बजाय ‘जनजाति’ शब्द दर्ज कर आदिवासियों की सामाजिक संरचना को हिंदू वर्ण व्यवस्था की जातिवादी शृंंखला में और उनकी आदिम समाजवादी ढंग की चेतना को मुख्यधारा की उपनिवेशवादी राजनीति के भंवरजाल में गुलाम बनने को मजबूर कर दिया गया। इस बड़ी साजिश का एक खुलासा 1994 में तब हुआ जब भारत सरकार के प्रतिनिधि ने विश्व आदिवासी परिषद् के जेनेवा सम्मलेन में बयान दिया कि भारत में आदिवासी नहीं, जनजातियां हैं और वे मूलनिवासी नहीं हैं।
राज्यों के गठन में भी आदिवासी जातीयताएं नजरअंदाज की गर्इं। एक ही भाषा परिवार और प्रजाति के आदिवासी विभिन्न प्रांतों में बंटकर रह गए। पूर्वोत्तर के राज्यों का तो पुनर्गठन हुआ, मगर मध्य भारत में सरायकेला-खरसांवा जैसे कई गोलीकांडों के बावजूद आदिवासी जातीयताओं के हिसाब से राज्यों के पुनर्गठन की कभी कोई कोशिश नहीं हुई। राज्यों के गठन में हुई आदिवासियों की यह उपेक्षा उनके अस्तित्व में अभिशाप बन गई। वे संपन्न भारतीय जातियों के उपनिवेश बनकर रह गए। सरकारी योजनाएं
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गर्इं। कई भाषाएं नष्ट हो गर्इं, कई समुदाय विलुप्त हो गए।
वेरियर एल्वीन की सुझाई नीतियों को कांग्रेसी सरकारों ने छल लिया। नेहरू के ‘आधुनिक तीर्थों’ के लिए आदिवासियों की लाखों एकड़ जमीन छीनी गई। मगर वे पुनर्वास और रोजगार को तरस गए। बर्बाद-विस्थापित आदिवासियों ने कहीं शहरों का रास्ता लिया तो कहीं नक्सलवाद की शरण ली। नक्सलवाद ने भी इनको फौरी राहत जरूर दी, मगर इनके स्वाभिमान-संस्कृति और ‘अबुआ राज’ की राजनीतिक सोच को यहां भी तवज्जो कम ही मिली।
संघर्ष के रास्तों में आदिवासियों ने नक्सलवाद-माओवाद की तुलना में आखिरकार संसदीय राजनीति को दूरगामी और बेहतर तरीके के रूप में पहचाना। इसी रास्ते अपने अलग आदिवासी राज्य प्राप्त कर अपनी समस्याओं के ठोस समाधान के लिए संघर्ष तेज किया। जयपाल सिंह मुंडा ने ‘झारखंड पार्टी’ के माध्यम से आजादी के तुरंत बाद झारखंड आंदोलन और आदिवासी राजनीति को अच्छी गति दे दी थी, मगर नेहरू ने झारखंड पार्टी को कांग्रेस पार्टी में विलीन कर जयपाल सिंह की गति को अचानक विराम लगा दिया। इस संघर्ष को आगे ‘झामुमो’ का गठन कर शिबू सोरेन ने ऊंचाई दी, शिबू सोरेन को भी आरंभ में माओवादियों और वामपंथी नेता एके राय आदि ने ‘लालखंड’ के निर्माण के लिए इस्तेमाल करना चाहा, मगर वे अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रहे। कांग्रेस और बीजेपी ने स्थानीय महत्त्वाकांक्षी आदिवासी पार्टियों, नेताओं और बुद्धिजीवियों को अपने प्रभाव में लेकर झामुमो को बार-बार कमजोर करने की कोशिशें कीं। इन सबके बावजूद ‘झामुमो’ संसदीय राजनीति में आदिवासी ‘अबुआ राज’ की चेतना के प्रतीक दल के रूप में स्थापित हुआ।
छत्तीसगढ़ में अब भी आदिवासी राजनीति को ठीक से पंख तक नहीं खोलने दिए जा रहे हैं। अजित जोगी के अलावा कोई बड़ा आदिवासी नेता वहां नहीं पनप सका है। नतीजे साफ हैं कि आदिवासी एक तरफ सरकारी परियोजनाओं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और ्र‘सलवा जुडूम’ जैसे कई अभियानों के जरिए उजाड़े जा रहे हैं तो दूसरी तरफ नक्सलवादियों के हाथों मारे जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ की आदिवासी राजनीति इतनी असहाय बना दी गई कि लगता है जैसे छतीसगढ़ राज्य आदिवासियों के लिए नहीं, पूंजीवादी लूट के लिए ही बनाया गया है।
गुजरात-मध्य प्रदेश के कई आदिवासी इलाके हाल में ईसाइयत के प्रसार और हिंदूवादी राजनीति के नए प्रयोग स्थल बनकर उभरे हैं। पंचमहल, दाहोद, बनास, कांठा, सरगुजा, अलीराजपुर, झाबुआ आदि इलाकों के आदिवासियों का सांप्रदायिक राजनीति ने हाल में खूब इस्तेमाल किया है। गुजरात में आदिवासी राजनीति अपनी आदिवासी चेतना के संदर्भ में क्रमश: उतार पर है। राजस्थान की आदिवासी राजनीति भी लगभग इसी रास्ते पर ही है। यहां आदिवासी चेतना से युक्त जमीनी नेताओं को कमजोर करने के लिए दोनों बड़ी पाटियां बड़े आदिवासी अफसरों को राजनीति में स्थापित कर रही हैं। ये अफसरनुमा नेता जनता के प्रति शासक सा रवैया रखते हैं। वर्षों भ्रष्टाचार में लिप्त रहने की अपनी कमजोरी के चलते ये गरीब आदिवासियों के पक्ष में जुझारू ढंग से मुद्दे कभी नहीं उठाते हैं, बल्कि मुद्दों को सरकार के पक्ष में चालाकी से कमजोर बनाते हैं।

गैरआदिवासी नेताओं की अपने काले धन से व्यक्तिगत आर्थिक जरूरतें पूरी करके और पार्टियों को मोटा चंदा देकर ये जमीनी और संघर्षशील नेताओं को पार्टियों से बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं। जनता के मुद्दे उठाने वाले प्रतिद्वंदी नेताओं को मुकदमों में फंसा रहे हैं। विचारधारात्मक राजनीतिक समझ के अभाव में ये अफसर जिस पार्टी की सरकार बनने की संभावना होती है, उसी से टिकेट खरीदते हैं। पिछले चार दशक से संघर्ष की राजनीति कर रहे आदिवासी नेता किरोड़ीलाल मीणा भ्रष्ट राजनीति के शिकार हो रहे हैं। उन्होंने संघ की विचारधारा से पिंड छुड़ाकर आदिवासी राजनीति को मजबूत करने की दो बार भरपूर कोशिश की, मगर आदिवासी राजनीति के उत्थान की विरोधी पार्टियों के अफसरनुमा नेताओं ने इनकी कोशिश को अभियान चलाकर नाकामयाब बना दिया। ये अफसर-नेता ऐसी आदिवासी राजनीति स्थापित करने पर तुले हैं जो वातानुकुलित कक्षों से चले, जिसमें आदिवासी जनता इनकी पहुंच वाले प्रशासन और पार्टियों पर ही निर्भर रहे, ताकि विकल्पहीन होकर वह बार-बार इन्हें ही नेता चुनने को मजबूर बनी रह सके।
आदिवासी समाज में राजनीतिक चेतना का आज घोर अभाव है। इसलिए इनका संघर्षशील और प्रतिबद्ध नेतृत्व कमजोर बना हुआ है। इसका फायदा गैरआदिवासी ताकतों के आशीर्वाद से भ्रष्ट आदिवासी अफसर-माफिया-नक्सल वर्ग उठा रहा है। आदिवासी समाज से निकले ये ‘दिकू’ तत्त्व आदिवासी राजनीति और आरक्षण के विरोधियों को बहुत अनुकूल प्रतीत हो रहे हैं। इसलिये कमोबेश सभी पार्टियां देश भर में इनको बढ़ावा दे रही हैं। आदिवासी जनता इन अफसर-नेताओं के नकारा नेतृत्व के पीछे चलने को अभिशप्त होती जा रही है और आदिवासी विरोधी ताकतें इस तरह आरक्षित सीटों को अनारक्षित बनाती जा रही हैं। सरकारों का आदिवासियों के प्रति सौतेला रवैया बरकरारहै। इनकी बनाई नीतियां पाखंड साबित होती जा रही हैं। राष्ट्रीय जनजाति नीति-2006 में यूपीए सरकार ने पिछली सरकारों की सभी नाकामियों को स्वीकार करके घोषणा की थी कि 2020 तक हर आदिवासी को देश के संपन्न नागरिक के समान स्तर पर ला दिया जाएगा। यह झूठ साबित होने जा रहा है। आखिर इस दिशा में वर्तमान सरकार ने क्या बड़ा कदम उठाया है ?

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