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साहित्य का मेला, मेले में लेखक

पांच दिवसीय नवां जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 25 जनवरी को संपन्न हो गया। इस महोत्सव में बहुत कुछ बोला और सुना गया। संवाद हुए तो विवाद भी उभरे। साहित्य का बाजार और बाजार के साहित्य को लेकर बहस भी गरम हुई। वहां से लौट कर इसकी कुछ चित्रावलियां और झलकियां प्रस्तुत कर रहे हैं अजित राय।

Author Published on: January 31, 2016 3:18 AM
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की फाइल फोटो।

आवाज भी एक दृश्य है
दुनिया भर के चार सौ लेखक, दो सौ सत्र, पांच दिन और करीब पौने तीन लाख की भीड़। पंडाल का चप्पा-चप्पा भर चुका था। मंच से जो बोल रहे थे, उन्हें देख नहीं सकते, पर सुन सकते हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने आवाजों को दृश्य में बदल दिया। साहित्य, विचार, किताब और संवाद से प्रेम करने वालों में कश्मीर से कन्याकुमारी तक की नई पीढ़ी हाजिर थी। इन्हीं लोगों ने इस समारोह को सफलता की बुलंदियों तक पहुंचाया। इन्हीं की वजह से कारपोरेट-कंपनियां दौड़ी चली आ रही थीं।
अगर कोई समझता है कि यह दीवानगी केवल गुलजार, जावेद अख्तर, करण जौहर, त्रुघ्न सिन्हा, अनुपम खेर, काजोल की वजह से थी, यह सही नहीं है। नई पीढ़ी जानती है कि गाजा पट्टी से लेकर जमैका तक क्या नया लिखा जा रहा है। सिनेमा के लोगों से थोड़ी रौनक जरूर बढ़ जाती है। लेकिन फेस्टिवल के असली नायक तो मर्लोन जेम्स, मारग्रेट एटवुड, स्टीफन फ्राई, केई मिलर, कोल्म तोइविन, क्रिस्टीना लैंब, रस्किन बांड , मैकाल स्मिथ, थामस पिकेटी, उदय प्रकाश, लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी निरुपमा दत्त, सीपी देवल जैसे लेखक हैं, जिनकी किताबों ने नई बहसों को जन्म दिया है।
आखिर ऐसा कैसे हुआ कि नौ साल पहले कुल ढाई सौ लोगों का यह फेस्टिवल अब दो लाख सत्तर हजार की सीमा पार कर गया? इसकी सबसे बड़ी वजह है आधुनिकता और लोकतंत्र, जिसकी खिड़की हमें स्वतंत्रता, समानता और न्याय तक ले जाती है। पंद्रह साल के प्रशांत मिश्रा से लेकर पचासी साल के अरविंद कुमार तक मंच साझा कर सकते हैं। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की बगल की सीट पर कोई भी बैठ सकता है। कोई भी किसी से सवाल कर सकता है। किसी पंडाल में वीआइपी वगैरह के लिए कोई सीट रिजर्व नहीं। राजा और रंक, शब्दों के इस उत्सव में समान थे।
अधिकतर लेखक अंग्रेजी में बोले, पर किसी को हिंदी में बोलने की मनाही नहीं रही। यह देखना सचमुच विस्मयकारी रहा कि एक साथ छह जगहों पर अलग-अलग बहसें हुर्इं और कहीं भी पांव रखने की जगह नहीं थी। हर रोज चालीस-बयालीस सत्रों की आवाजें गूंजती रहीं। बोलनेवाले को इसकी परवाह नहीं थी कि कौन सुन रहा है और सुननेवाले को यह आजादी है कि किसको सुने, किसको न सुनें।

आधुनिकता की दिशा और अनकही आवाजें
लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी शायद पहली भारतीय ट्रांसजेंडर हैं, जिन्होंने साहस के साथ अपनी आत्मकथा, ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी’ में चीख चीखकर अपने शोषण, संघर्ष, अमानवीय यातना की दास्तान कही है। वे हिंदी के साथ अच्छी अंग्रेजी भी बोल लेती हंै।
वरिष्ठ पत्रकार निरुपमा दत्त ‘द बल्लाड आफ बंत सिंह’ में पंजाब में दलित उत्पीड़न की दिल दहलानेवाली कहानियां लेकर आई हैं। पांच जनवरी 2006 की शाम बठिंडा के पास झाबर गांव के किसान मजदूर नेता और दलित लोक गायक बंत सिंह को दबंग जाति के लोगों ने इतनी बेरहमी से पीटा कि उन्हें अपने दोनो हाथ, एक पैर गंवाने पड़े। इस घटना के अठारह दिन बाद ही बंत सिंह फिर से गाने लगे। उन्होने कहा, ‘जालिमों ने हाथ-पैर ही काटे न। जबान तो सलामत है।’
बंत सिंह को इस बात की सजा दी गई थी कि उन्होंने उन दबंगों के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर करने की जुर्रत की थी, जिन्होंने उनकी नाबालिग बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार किया था। चारबाग पंडाल में सैकड़ों लोग जब खड़े होकर बंत सिंह के लिए लाल सलाम का नारा लगा रहे थे तो बंत सिंह दुगने उत्साह से गाने लगे। एक नौजवान ने पूछ बैठा कि हैदराबाद में रोहित की आत्महत्या पर क्या कहना है बंत सिहं बिना किसी दुविधा के तपाक से कह उठते हैं, ‘खुद को मारने से अच्छा है उसे मार दो जिसके कारण खुद को मारने चले हो।’
साहित्य में संघर्ष, लेखक की निजता और राजनीति
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक पहचाने जाने वाले हिंदी लेखक उदय प्रकाश हैं। सहिष्णुता, पुरस्कार वापसी साहित्य की राजनीति आदि पर उनका कहना है कि हिंदी में अगर आपने जाति या वर्ण व्यवस्था का विरोध किया तो आपको न तो कोई नौकरी मिलेगी न कोई रोजगार। आप पर हमले होंगे। आपको विवादास्पद बना दिया जाएगा। वे आगे कहते हैं, ‘जब तक हिंदी में जातिवाद का लगातार विरोध नहीं किया जाएगा तब तक यहां लोकतंत्र नहीं आ सकता।’ उदय प्रकाश ने साफ किया कि वे अपने पुरस्कार वापस नहीं लेंगे।
साहित्य की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े उत्सव में हिंदी कहां रही। लेखकों की सूची से गिन लें-उदय प्रकाश, अलका सरावगी, अरविंद कुमार जैसे थोड़े से नाम ही रहे। विमर्श के सत्रोें में तो कोई हिंदीवाला गलती से भी नहीं था।

खतरे अभी और हैं
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लोगों की भीड़ सीमा पार कर चुकी। दिग्गी पैलेस छोटा पड़ने लगा। किसी भी समय भगदड़ या कोई अन्य दुर्घटना घट सकती थी। यह सच है कि जितनी भीड़ होगी उतनी ज्यादा कारपोरेट इमदाद मिलेगी।
सवाल यह भी कि किसी गंभीर विषय पर संवाद कितने लोगों के बीच संभव है। साहित्यिक, वैचारिक संवाद और जनसभा में फर्क तो करना पड़ेगा । राजस्थानी के शीर्ष लेखक सीपी देवल की बात पर ध्यान देना जरूरी है। वे कहते हैं कि लेखक चिड़ियों की तरह होता है, जिन्हें तूफान के आने की सूचना पहले ही मिल जाती है। लेखकों को भी मनुष्यता पर आनेवाले खतरों का आभास पहले हो जाता है। इतिहास गवाह है,‘लेखक कभी भी शिकारी के पक्ष में नहीं, हमेशा शिकार के साथ खड़ा हुआ है।’

कामसूत्र से नीति शतक तक
कामसूत्र के लेखक वात्स्यायन के जीवन पर उपन्यास चर्चित सुधीर कक्कड़ का नया उपन्यास नीति शतक के लेखक भर्तृहरि के जीवन पर है-‘द डेविल टेक लव।’
सुधीर कहते हैं कि उन्हे भर्तृहरि संस्कृत के एक मात्र ऐसे कवि लगे जिनमें पर्याप्त आधुनिकता है। यह उपन्यास उनकी कविताओं के आधार पर बुना गया है जिसमें कल्पना की पूरी गुंजाइश है। सातवीं सदी की उज्जयनी की सारी छवियां उनकी कविताओं के आधार पर रची गई हैं। नीति शतक, शृंगार शतक और वैराग्य शतक के श्लोक कई बार आपस में संवाद करते हंै। एक श्लोक में वे कहते हैं, ‘मैं रात-रात भर गणिकाओं के बीच स्त्री देह का आनंद लेने के लिए अपनी बुद्धि का व्यापार करता घूमता रहता हूं।’
यह उपन्यास पूरी तरह आधुनिक है क्योंकि इसमें अंतर्द्वंद्व है। अगर वात्स्यायन काम गुरु हैं तो भर्तृहरि प्रेम के दार्शनिक हैं। पिता द्वारा सुनाया गया भर्तृहरि का एक श्लोक उनकी इस किताब की प्रेरणा बना।

रस्किन बांड का अकेलापन
रस्किन बांड ने साठ साल पहले अपना पहला उपन्यास ‘द रूम आन द रूफ’ लिखा था। आज भी उन्हें उसका एक-एक शब्द याद है। दिल्ली में अक्सर पिता पुरानी इमारतों को दिखाने ले जाते थे। तभी से लेखक बनने का खयाल पैदा हुआ। मां सेना में भेजना चाहती थीं। जब लंदन भेज दिया गया तो वहां एक काम के बदले पचास पाउंड का एडवांस मिला। वे पानी के जहाज से चालीस पाउंड में भारत आ गए।
वे जल्दी ही प्रेम में पड़ जाते थे। उनके सारे चरित्र लगभग उपेक्षित हैं क्योंकि खुद का बचपन अकेलापन में बीता था। कई दशक तक मसूरी में रहने के बाद भी वे कहते हैं कि कोई जगह आपको लेखक नहीं बनाती। प्रेमचंद गांव में रहकर भी महान लेखक थे। उन्होंने कई काम किए पर हमेशा पूर्णकालिक लेखक बने रहे।

और कारवां बनता गया
विलियम डारलिंपल और नमिता गोखले ने जब 2005 में जयपुर साहित्य उत्सव के बारे में सोचा था तो मुश्किल से पंद्रह लेखक आ सके थे। अगले साल कुल ढाई सौ दर्शक जुट सके और 2007 में केवल चार सौ लोग आ सके। संजय के. रॉय ने प्रबंधन का जिम्मा संभाला। विलियम डारलिंपल की अंतरराष्ट्रीय सूझ-बूझ नमिता गोखले की भारतीय समझ और संजय के. रॉय की कारपोरेट रणनीति ने इसे आसमानी उंचाइयों पर पहुंचा दिया। अब इसे जी. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल कहा जाता है जिसका अनुमानित बजट दस करोड़ से भी ज्यादा हो गया है।
हिंदी जगत में इस फेस्टिवल को लेकर शुरू से हीं विरोध का भाव रहा है। हालाकि नंद भारद्वाज के संयोजन में राजस्थानी और राजस्थान के हिंदी लेखकों की ठीकठाक भागीदारी होती रही है। अगर हम हिंदी-कार्यक्रमों को छोड़ दें, जो पूरे आयोजन का एक प्रतिशत भी नहीं है, तो अंतरराष्ट्रीय लेखन का बाजार उम्दा रहा है।
कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना के साथ-साथ दुनिया भर में हो रहे विचार विमर्श को शामिल करने की कोशिश इस फेस्टिवल में होती रही है। कई बार आयोजकों पर सत्तापरस्त और दक्षिणपंथी राजनीति से प्रभावित होने का भी आरोप लगता रहा है। लेकिन पिछले पांच सालों का अनुभव बताता है कि यहां हर तरह की विचारधारा को आमंत्रित किया जाता रहा है।
समस्या हिंदी समाज की है। यहां गुटबाजी और घृणा का बोलबाला है। हर बड़े लेखक का कुनबा बन चुका है। इसका असर यहां भी दिखाई देता है। इसके बावजूद हिंदी कार्यक्रमों को लोकतांत्रिक और दबावरहित बनाने की जरूरत है। नमिता गोखले की कोशिशों से स्त्रीवादी, दलित, आदिवासी, प्रगतिशील आंदोलन, वैज्ञानिक और लोक चेतनापरक विचारों को जगह मिलती रही है। साहित्य, कला और संस्कृति, सिनेमा और रंगमंच, राजनीति और समाज, खेल और प्रौद्योगिकी आदि का ऐसा समावेश इस उत्सव की खासियत बन चली है। १

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