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साहित्य की नागरिकता

जब अमदाबाद स्थित भारतीय सामुदायिक शिक्षा समिति के निमंत्रण पर रामलाल पारीख स्मृति व्याख्यान ‘साहित्य की नागरिक भूमिका
Author December 12, 2015 23:24 pm

जब अमदाबाद स्थित भारतीय सामुदायिक शिक्षा समिति के निमंत्रण पर रामलाल पारीख स्मृति व्याख्यान ‘साहित्य की नागरिक भूमिका’ पर देने का निश्चय हुआ तो मुझे अज्ञेय और भवानी प्रसाद मिश्र की दो कविताएं याद आर्इं: ‘सांप’ और ‘जाहिल मेरे बाने’। पहली कविता में सांप से पूछा गया है कि नगर में बसना न आने के बावजूद उसने डसना कैसे सीखा और विष कहां पाया! दूसरी में नंगे पांवों चलने वाले, धूल की गोदी में पलने वाले, ढोल पर जोर से गाने वाले को असभ्य और जाहिल समझा जाता है जबकि सभ्य वे हैं जो ‘आग बरसा देते हैं भू पर’, ‘जोर से पढ़ पाते हैं पोथी’, ‘जिनके कपड़े स्वयं बने हैं’ और ‘जिनके जबड़े खून से सने हैं’!
भारत में समावेशी नागरिकता का कानूनी सूत्रपात हमारे संविधान ने किया। समुदाय, सहकार, संबंध और संवाद के प्रति संवेदनशीलता और उत्सुकता; लिंग-धर्म-जाति आदि से अलग स्त्री-पुरुष की समानता और कानून के सामने सबके समान अधिकार की अवधारणा; दूसरों का एहतराम; उनसे समरसता और परस्पर आदर; समानता की पहचान और भिन्नता का स्वीकार; सामुदायिकता में शिरकत; समावेशिता का आग्रह; भाषा, पर्वों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, अनुष्ठानों में साझेदारी; सार्वजनिक संपत्ति और धरोहर की देखभाल और चौकसी; मर्यादाओं का पालन और संरक्षण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जगह आदि कुछ बातें हैं जो नागरिकता के लिए जरूरी हैं। नगर में, उसकी सुख-सुविधाओं का उपयोग या उपभोग करने भर से कोई नागरिक नहीं हो जाता। नागरिकता दी हुई नहीं है, उसे अर्जित करना पड़ता है। वह भौतिक स्थिति पर नहीं, मूल्य-प्रतिबद्धता भी है।
भले साहित्य का आरंभ हमारे यहां अरण्य में हुआ हो और सदियों तक अरण्य और नगर के दो ध्रुवों के बीच वह अवस्थित रहता है, आधुनिक काल में वह प्राय: पूरी तरह से नागरिक हो गया है: अरण्य की कोई स्मृति या अनुगूंज उसमें शेष नहीं रह गई लगती। वह भाषा को बचाने-रचने, उसे सूक्ष्मता और जटिलता में जाने के लिए प्रेरित करता है। भाषाओं की अबाध-अपार विकृति के इस समय में साहित्य भाषा की मर्यादा, उसका साफ-सुथरापन, उसकी कल्पनाशीलता बचाता है: साफ-सुथरी भाषा बोल सकने वाला नागरिक ही साफ-सुथरे माथे का नागरिक हो सकता है।
साहित्य समाजबोध भी जगाता और सशक्त करता है- साहित्य के माध्यम से ही अक्सर समाज अपने समाज होने को पहचानता है। व्यक्ति की गरिमा पर इसरार करते हुए साहित्य ‘हम और वे’ के अप्राकृतिक द्वैत को ध्वस्त करता है। समाज में कई बार उभरती नई नैतिकता को साहित्य ही पहले-पहल पहचानता है और कई बार नई नैतिकता प्रस्तावित और स्थापित करता है: स्त्री-पुरुष की समानता इसका उदाहरण है। वह पहले साहित्य में आई और पूरी तरह से समाज में अब तक नहीं आ पाई है। इस समय जब पिछला सब कुछ भूल कर नागरिक एक अनंत वर्तमान में रहने को विवश हो रहे हैं, साहित्य जातीय स्मृति को उद्बुद्ध करता, उसे सजीव रखता है। वह प्रश्नवाचकता बढ़ाता-पोसता है। सामाजिक व्यवहार में लोकतांत्रिकता का, प्रश्नांकन और जवाबदेही का विस्तार करता है। मानवीय संबंधों, सामाजिक व्यवहार और आचरण की सूक्ष्मताओं और जटिलताओं, अंतर्विरोधों, विडंबनाओं से अवगत कराता है। दी हुई दुनिया को निर्विकल्प मानने की जहनियत के बरक्स विकल्प की संभावना, स्वप्नशीलता को उद्दीप्त करता है। प्रकृति की अपार सुषमा, उससे हमारे अलगाव और पर्यावरण-नाश के प्रति हमें सचेत करता और अन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशील करने की कोशिश करता है। आज जब प्राय: सारी राजनीति भेड़चाल पर उतारू है और राजनेता और धनी लोग असंयमित और अनागरिक व्यवहार करते रहते हैं तब साहित्य एक ऐसी जगह है, जिसमें नागरिकता के सबसे उजले मूल्य सक्रिय हैं और वह हमारी विचारशीलता, संवेदना और सहानुभूति विस्तृत करने की एक खुली नागरिक पाठशाला है।
बहस जारी है
व्याख्यान से पहले गुजरात में सक्रिय कुछ बुद्धिजीवियों और गैरसरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं से आज के माहौल पर चर्चा हुई। कुछ चर्चा नए प्रधान न्यायाधीश के उस वक्तव्य को लेकर भी हुई, जिसमें उन्होंने कहा बताते हैं कि देश में कानून का शासन है और उसके रहते और न्यायपालिका की सजगता और सक्रियता के चलते देश असहिष्णु हो ही नहीं सकता। दूसरे, प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि असहिष्णुता का मुद्दा राजनीतिक है और वे इस पर आगे कुछ नहीं कहेंगे। उनका संयम और संकोच उचित है। पर अगर लेखकों-कलाकारों-वैज्ञानिकों-विद्वानों और स्वयं भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, रिजर्व बैंक के गवर्नर, उद्योगपति आदि द्वारा उठाया गया मुद्दा राजनीतिक कहा जाए तो ऐसा वक्तव्य और आकलन अपने आप में राजनीतिक नहीं है! सही है कि न्यायपालिका इस समय वह संस्थान है, जिसमें व्यापक लोकविश्वास अब भी बचा हुआ है और प्रदान न्यायाधीश के उसके निष्पक्ष और सक्रिय रहने के आश्वासन ने इस स्थिति को पुष्ट किया है। पर अच्छी बात यह है कि बहस अभी जारी है।
फिर भी, यह कहने की जरूरत है कि देश में बढ़ रही असहिष्णुता की ओर ध्यान आकर्षित करने का आशय भारत को एक देश के रूप में असहिष्णु करार देना कतई और किसी तरफ से नहीं है। कुछ आक्रामक प्रवृत्तियां हैं जो असहिष्णुता का माहौल बनाती रहती हैं और उनके प्रति सचेत होना जरूरी है। उनका विरोध करने का बड़ा आधार तो यही है कि कुल मिला कर, अपनी कई विकृतियों और विचलनों के बावजूद सदियों से सहिष्णु रहे हमारे देश और उसकी समरसता की परंपराओं पर हमला हो रहा है और इससे सिर्फ देश की छवि को नहीं, उसकी आत्मा, उसके लोकतांत्रिक चित्त को, उसके समता के स्वप्न को भी गहरा आघात पहुंचता है। यह असहिष्णुता अपने मूल में भारत-विरोधी, परंपरा-विरोधी, धर्म-विरोधी और लोकतंत्र-विरोधी एक साथ है।

 

 

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