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काम के कामगार पर कब मेहरबान होगा रेलवे

फर्ज कीजिए कि आप कहीं घूम रहे हों और आपकी चप्पल टूट जाए या फिर आप सफर के लिए निकले हों और आपके बैग की चेन जवाब दे जाए तो आप किसे याद करेंगे?
Author नई दिल्ली | July 25, 2016 01:43 am
(file Pic)

फर्ज कीजिए कि आप कहीं घूम रहे हों और आपकी चप्पल टूट जाए या फिर आप सफर के लिए निकले हों और आपके बैग की चेन जवाब दे जाए तो आप किसे याद करेंगे? जाहिर सी बात है इनकी मरम्मत करने वाले को, लेकिन भीड़ भरे बाजार और गली के नुक्कड़ पर आसानी से मिल जाने वाले हमारे इतने काम आने वाले इन कामगारों को रेलवे ने पूरी तरह नजरअंदाज किया है।
देश के कोने-कोने के रेलवे स्टेशन पर आपसे चेन बनवाने को पूछने वाले कामगार को रेलवे ने लाइसेंस तक नहीं दिया है, जबकि वेंडर, हॉकर, पीसीओ, एटीएम और खान-पान के लिए रेलवे में लाइसेंसिंग की समुचित व्यवस्था है।

समाज का ऐसा तबका जो आड़े वक्त में हमारे काम आता है, उसके लिए रेलवे ने कोई व्यवस्था नहीं बनाई है। जूते-चप्पल की मरम्म्त करने वालों को आए दिन रेलवे परिसर में गैरकानूनी ढंग से व्यवसाय करने के जुर्म में रेलवे पुलिस बल (आरपीएफ) की मार झेलनी पड़ती है और कोर्ट में पेश होकर सैकड़ों रुपए का चालान भरना पड़ता है। नई दिल्ली स्टेशन परिसर में करीब 150 ऐसे लोग काम करते हैं, लेकिन इनके मन में हमेशा डर बना रहता है कब इनकी इनकी दिनभर की कमाई चालान के रूप में स्वाहा हो जाएगी।

नई दिल्ली स्टेशन पर तीन साल से मरम्मत का काम कर रहे ग्वालियर के 20 साल के एक युवक ने बताया कि उसने परिवार से जूते मरम्मती का काम सीखा था, गांव में कम पैसे मिलने के कारण वह दिल्ली चला आया और यहां नई दिल्ली स्टेशन पर काम शुरू कर दिया। उसने बताया कि जब भी आरपीएफ वाले स्टेशन परिसर में अभियान चलाते थे, यहां काम करने वाले भागने लगते थे। मैं भी तब से आरपीएफ के जवानों को देखकर अपना सामान समेट कर बाहर भाग जाता हूं क्योंकि पकड़ने के बाद आरपीएफ वाले कोर्ट में पेश करते हैं और वहां दो सौ रुपए का चालान जमा करना पड़ता है। कमाई करने के बारे में पूछने पर उसने बताया कि दिनभर में ढाई-तीन सौ रुपए की कमाई हो जाती है। रेलवे में लाइसेंस के लिए आवेदन करने के बारे में पूछने पर युवक ने कहा कि मैं तो पढ़ा-लिखा हूं नहीं, मुझे पता भी नहीं कि लाइसेंस कहां और कैसे बनता है।

इन्हें स्टेशन परिसर में अन्य व्यावसायियों की तरह लाइसेंस देने के बारे में नई दिल्ली स्टेशन के चीफ स्टेशन मैनेजर आरपी पांडेय ने बताया कि रेलवे ने जूते मरम्मत करने वालों के लिए कोई लाइसेंसिंग व्यवस्था नहीं बनाई है क्योंकि इन कामगारों के वेश में असामाजिक तत्त्व भी स्टेशन परिसर में प्रवेश कर सकते हैं। जब पांडेय से सवाल किया गया कि स्टेशन में जिस तरह कुली, फल विक्रेता और अन्य सामान बेचने वालों की जानकारी पंजीकृत है उसी तरह इनकी भी जानकारी पंजीकृत होगी तो इस तरह के शक का कोई मतलब नहीं होगा। इस पर उनका जवाब था कि नियम बनाने का काम रेलवे बोर्ड का है। बोर्ड इस बारे में जो उचित समझेगा वही करेगा।

आरपीएफ के एक अधिकारी ने बताया कि इन कामगारों को स्टेशन परिसर में गैरकानूनी ढंग से पाए जाने पर रेलवे एक्ट की धारा-144 के तहत मामला दर्ज किया जाता है और अदालत में पेश किया जाता है। यह धारा वेंडर, भिखारी, हॉकर सरीखे सभी लोगों पर लागू होती है। जो भी रेलवे परिसर में गैर-कानूनी ढंग से व्यवसाय करता पाया जाता है उसके खिलाफ धारा-144 के तहत कार्रवाई होती है। उत्तर रेलवे के सीपीआरओ नीरज शर्मा का कहना है कि अंग्रेजों के समय रेलवे स्टेशनों पर मोचियों के बैठने की व्यवस्था होती थी। सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से रेलवे परिसर से बाहर मोचियों के बैठने में कोई समस्या नहीं है।

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