भारत और जर्मनी के बीच ब्रॉन्ज मेडल मैच में दोहराई गई 1980 के फाइनल की कहानी, जानिए तब कैसे भारत ने जीता था पीला तमगा

अगर हम 1980 ओलंपिक में खेले गए हॉकी के फाइनल मुकाबले और कल के ब्रॉन्ज मेडल मैच को याद करें तो दोनों मुकाबले काफी हद तक समान थे। इतिहास ने एक बार फिर से खुद को दोहराया था। तब भारत के सामने स्पेन थी जिसे 4-3 से मात दी थी और इस बार थी जर्मनी जिसे 5-4 से भारत ने हराया।

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1980 की स्वर्ण पदक विजेता टीम और 2021 की कांस्य पदक विजेता टीम (Source: twitter)

टोक्यो ओलंपिक में 41 साल बाद जब भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीता तो उस वक्त मानों ऐसी अनुभूति हो रही थी कि हॉकी का भारत में पुनर्जन्म हो गया हो। वो क्षण कितना अनमोल था जब पी.आर. श्रीजेश ने गेंद को गोल में जाने से रोका और दूसरी तरफ मैच खत्म होने का हॉर्न बज गया। हर भारतीय खेल प्रेमी उस वक्त भावुक था। नम आंखों के बीच हर कोई 1980 के बाद एक बार फिर से अपने राष्ट्रीय खेल को दोबारा जीवित होते देख रहा था।

ये इतिहास रचा था मनप्रीत सिंह की उस टीम ने जिसे कोई स्पॉन्सर तक करने के लिए तैयार नहीं था। ये वो ही टीम है जिसकी जर्सी पर कोई अपना नाम नहीं लिखना चाह रहा था और आज देश के प्रधानमंत्री खुद टोक्यो में फोन कॉल करके उस टीम के कप्तान और कोच से बात कर रहे थे। इससे पहले 1980 में भारतीय टीम को वी. भास्करण की अगुवाई में स्वर्ण पदक मिला था।

1980 की स्वर्ण पदक विजेता टीम और 2021 की कांस्य पदक विजेता टीम

1980 में भी गोलों की बारिश हुई थी और 2021 में भी गोल जमकर बरसे। 1980 में भी आखिरी क्षणों में सबकी सांसें अटकी थीं और टोक्यो ओलंपिक के ब्रॉन्ज मेडल मैच में भी सब अपने नाखून कुतर रहे थे। मुकाबला ही ऐसा था और अगर आप 1980 की कहानी जान लेंगे तो आप खुद कहेंगे कि इतिहास ने खुद को दोहरा दिया है।

1980 के मॉस्को ओलंपिक में फाइनल हुआ भारत और स्पेन के बीच। रूस और अमेरिका के बीच चल रहे विवाद के चलते इस ओलंपिक में सिर्फ 6 टीमें ही भाग ले पाई थीं। भारत की जुझारू टीम ने अपने अभियान की शुरूआत करते हुए पहले ही मुकाबले में तंजानिया को 18-0 से पीट दिया।

पोलैंड और स्‍पेन से भारत को फिर कड़ी चुनौती मिली। दोनों टीमों के साथ हुए मुकाबले 2-2 से बराबरी पर छूटे। लेकिन स्‍पेन थी उस वक्त की यूरोपियन चैंपियन और जिस तरह से भारत ने उसके खिलाफ मैच ड्रॉ कराया, उससे भरोसा फिर जग उठा था कि ये टीम कुछ करके दिखाएगी। उसके बाद भारत का सामना हुआ क्‍यूबा से जिसे भारत ने 13-0 से धो डाला।

अब बारी थी लीग के आखिरी मुकाबले की और ये मुकाबला फाइनल में जगह बनाने के लिए भी अहम था। भारत का सामना होने वाला था होम टीम सोवियत यूनियन (वर्तमान रूस) के साथ। उस वक्त सोवियत यूनियन को उसके घर में हराने शेर के घर में घुसकर उसे चुनौती देने से कम नहीं था। लेकिन ये भारतीय टीम कुछ अलग थी और उसने होम टीम को 4-2 से हराकर ये साबित भी कर दिया था।

1980 की विजेता टीम और 2021 की विजेता टीम

अब समय आ चुका था जिसका सबको इंतजार था और वो था फाइनल मुकाबला। फाइनल में आमने-सामने थी यूरोपियन चैंपियन स्पेन और अंडरडॉग्स कही जाने वाली भारतीय टीम। मुकाबला कांटे का था और आखिरी वक्त तक सबकी सांसों को थाम कर रखने वाला।

फाइनल की शुरुआत भारत के पक्ष में थी और हाफ टाइम तक सुरिंदर सिंह सोढ़ी के दो गोल की बदौलत भारत ने 2-0 की बढ़त बना ली थी। 1964 के बाद एक बार फिर से जीत की खुशबू आने लगी थी और फिर दूसरे हाफ की शुरुआत में एक गोल और करके एमके कौशिक ने इस खुशबू को और तेज कर दिया था। लेकिन कभी भी खेल में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए ये यहां देखने को मिला।

भारत 3-0 से आगे था और फिर देखते ही देखते स्पेन के जुआन अमात ने दो मिनट में दो गोल करके स्कोर 3-2 कर दिया था। सांसें फिर अटक चुकी थीं और मुकाबला फंसने लगा था। यहीं पर भारतीय कप्तान भास्करण की मोहम्‍मद शाहिद को सेंटर-फारवर्ड खिलाने की रणनीति काम कर गई। इसी बीच शाहिद ने 58वें मिनट में निर्णायक गोल दाग दिया। मैच का स्कोर 4-2 हो चुका था।

फिर भी स्‍पेन ने हार नहीं मानी और 65वें मिनट में अपनी हैट्रिक पूरी करते हुए अमात ने एक और गोल कर दिया। स्कोर था 4-3, हर ओर सांसे अटकी थीं। भारत की जीत और स्वर्ण पदक के बीच बस 5 मिनट का फासला रह गया था। स्पेन एक के बाद एक अटैक कर रहा था। इसी बीच स्पेन ने आखिरी सेकंड्स में दो पेनल्टी कॉर्नर हासिल कर लिए लेकिन भारतीय गोलकीपर बीर बहादुर क्षेत्री गोल पोस्ट के आगे दीवार बनकर खड़े हो गए और स्पेनिश खिलाड़ी उन्हें भेद नहीं पाए।

आखिरकार सांसों को थाम देने वाले इस मुकाबले में इतिहास रचा जा चुका था और भारतीय हॉकी की प्रतिष्ठा जो खोने लगी थी उसे वापस पाया जा चुका था। 1980 मॉस्को ओलंपिक के पुरुष हॉकी इवेंट में स्वर्ण पदक पर वासुदेव भास्करण की अगुवाई वाली इस टीम ने कब्जा जमा लिया था।

जीत के लम्हे, 1980 और 2021

अगर हम 1980 के इस मुकाबले और कल के ब्रॉन्ज मेडल मैच को याद करें तो दोनों मुकाबले काफी हद तक समान थे। भारतीय हॉकी की प्रतिष्ठा खो चुकी थी। भारत में राष्ट्रीय खेल की टीम के लिए कोई स्पॉन्सर नहीं मिल रहा था। ऐसे में जब मनप्रीत सिंह की इस टीम ने 41 साल का सूखा खत्म करते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीता तो हर कोई मानो खुशी से झूम उठा था।

बीर बहादुर क्षेत्री (बाएं) और पी. श्रीजेश (दाएं)

अक्सर ये लम्हा क्रिकेट में जीत के बाद होता था लेकिन इस बार ये क्रिकेट की जीत नहीं थी, ये जीत थी राष्ट्रीय खेल की। जहां कल भी इतिहास ने खुद को एक बार दोहराया था। कल भी आखिरी क्षणों में जर्मनी भारत पर हावी थी और आखिरी सेकंड्स में पेनल्टी कॉर्नर हासिल कर लिया था। कल भी गोलकीपर को दीवार बन कर खड़ा होना पड़ा, बस फर्क इतना था कि उस दिन बीर बहादुर थे तो कल पी. श्रीजेश थे।

1980 का जमाना था ब्लैक एंड व्हाइट का उस वक्त लाइव टेलीकास्ट नहीं देखने को मिलता था और ना ही गूगल पर स्कोर। सिर्फ और सिर्फ रेडियो के भरोसे था पूरा देश। लेकिन ब्रॉन्ज मेडल मैच के लम्हे को कई भारत वासियों ने अपने दिल में संजो लिया होगा। ये लम्हा खास था और हो भी क्यों ना 41 साल बाद देश के राष्ट्रीय खेल का पुनर्जन्म जो हुआ था।

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