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गंगाजल कब होगा अविरल-निर्मल

न दशकों में गंगा की सफाई के नाम पर तीन हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। लेकिन गंगा की दशा नहीं सुधरी और इन सालों में गंगा की और भी ज्यादा दुर्दशा हो गई है।
नमामि गंगे परियोजना के तहत जनवरी 2016 से ही गंगा की सफाई तीन चरणों में होनी है जिसमें अल्पकालिक योजना व पांच वर्ष की दीर्घावधि योजना शामिल है। लेकिन फिलहाल सबकुछ ठप पड़ा हुआ है। (फाइल फोटो)

गंगा की सफाई के नाम पर तीन दशकों में करोड़ों के वारे-न्यारे हो चुके हैं। मगर स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। कभी गंगा को भारतीय संस्कृति का हिस्सा बताकर तो कभी जीवनरेखा बताकर सभी सरकारों ने इसकी महिमा गाने में कसर नहीं छोड़ी है। निर्मलता और अविरलता का दावा हकीकत में कोरा साबित हो रहा है। क्यों हो रही है इस पावन नदी की दुर्दशा और कौन है जिम्मेदार? पड़ताल कर रहे हैं सुनीलदत्त पांडेय।

न दशकों में गंगा की सफाई के नाम पर तीन हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। लेकिन गंगा की दशा नहीं सुधरी और इन सालों में गंगा की और भी ज्यादा दुर्दशा हो गई है। 1985 में तबके प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा सफाई की योजना शुरू की थी। लेकिन इस योजना ने लालफीताशाही के चलते दम तोड़ दिया। केंद्र में भाजपा नीत राजग सरकार आने के डेढ़ साल बाद भी धरातल पर गंगा को साफ करने का कोई काम नहीं दिखाई दे रहा है।

एक सर्वे के मुताबिक हरकी पैड़ी हरिद्वार में भी गंगा का जल आचमन करने के लायक नहीं है। एक ओर जहां गंगाजल का तापमान बढ़ा है वहीं दूसरी ओर गंगाजल में आॅक्सीजन की मात्रा घटी है, जो जीवनदायिनी गंगा के लिए तो खतरे की घंटी है ही, साथ ही इंसान और गंगा पर निर्भर जीव-जंतुओं के जीवन के लिए भी खतरे के संकेत हैं। गोमुख से लेकर हरिद्वार तक प्रदूषित पानी के सतहत्तर नाले गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिर रहे हैं। ऋषिकेश से हरिद्वार तक 248 आश्रम, होटल और धर्मशालाएं गंगा के किनारे बने हुए हैं। इनकी गंदगी गंगा में जाती है।

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने हरिद्वार और ऋषिकेश में पॉलीथीन और प्लॉस्टिक पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखी है। लेकिन स्थानीय प्रशासन की लापरवाही के चलते यहां धड़ल्ले से पॉलीथीन बिक रही है। हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने 1985 से लेकर 2010 कुंभ मेले तक गंगा में गिर रहे जितने भी सीवर और गंदे पानी के नाले बंद किए थे, उनमें से अधिकांश आज भी गंगा नदी में गिर रहे हैं। हरिद्वार में 1985 और 2010 के कुंभ मेले में जगजीतपुर में दो जल-मल शोधन संयंत्र 18 एमएलडी और 27 एमएलडी के लगाए गए थे। लेकिन यह संयंत्र गंदा पानी साफ करने की क्षमता खो चुके है। इस समय गंगा में बिना साफ किए 30 एमएलडी सीवर का गंदा पानी रोजाना गंगा में छोड़ा जा रहा है।

हरिद्वार में हरकी पैड़ी से उत्तर दिशा की ओर गंगा के ऊपरी भाग में पंतद्वीप पार्किंग का गंदा पानी खुलेआम गंगा में जा रहा है। हरकी पैड़ी से पहले लोकनाथ घाट नाला, कांगडा मंदिर नाला, नाई सोता नाला, नांगों की हवेली का नाला और गऊ घाट नाले से भी रिस-रिसकर गंदा पानी गंगा में गिर रहा है। हरिद्वार में ललतारो पुल और बिड़ला घाट के आसपास बने धर्मशालाओं, होटलों और अवैध बस्तियों का गंदा पानी खुलेआम गंगा में गिरकर जल को प्रदूषित कर रहा है। और यहां गंगा के तट पर जगह-जगह सूअर घूमते हुए नजर आते है।

इसके अलावा कनखल में दरिद्र भंजन मंदिर और मातृसदन के पास सीवर के गंदे पानी के नाले खुलेआम गंगा में गिर रहे हैं। मायापुर से लेकर पुल जटवाडा ज्वालापुर तक गंगा नहर में तीन नाले- गोविंदपुरी , कसाई नाला और हरिद्वार औद्योगिक क्षेत्र के मायापुर नाले का रसायनयुक्तयुक्त प्रदूषित पानी गिर रहा है। जिससे सिंचाई के लिए खेतों में जा रहा गंगा जल प्रदूषित हो रहा है। इसका दुष्प्रभाव फसलों पर पड़ रहा है। हरिद्वार में चंडीघाट और बैरागी कैंप के बीच में बने टापुओं में और गोविंदपुरी में गंगा नहर के किनारे बनी अवैध बस्तियों का गंदा पानी गंगा में गिर रहा है।

एनजीटी ने हरिद्वार में सत्तरह आश्रमों और बाईस होटलों को गंगा में गंदा पानी डालने पर नोटिस दिया था। इन होटलों और आश्रमों के खिलाफ अब तक जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की है। हरिद्वार में एनजीटी के आदेश बेमतलब साबित हो रहे हैं। जिला प्रशासन एनजीटी के आदेशों का पालन कराने में कोई रुचि नहीं दिखा रहा है। जबकि एनजीटी के कमिश्नर एसए जैदी दो दफा हरिद्वार का दौरा कर चुके हैं। जैदी का कहना है कि जिला प्रशासन पर एनजीटी के आदेशों का पालन कराने के लिए सामाजिक संगठनों को दबाव बनाना होगा। एनजीटी ने जनता को गंगा में प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ एक हथियार दे दिया है। जनता को कानून के दायरे में रहकर उसका प्रयोग करना चाहिए। हरिद्वार में गंगा के किनारे आश्रमों, होटलों और अपार्टमेंट के नाम पर धड़ल्ले से अवैध निर्माण हो रहे है। लेकिन अवैध निर्माणों को रोकने वाली सरकारी एजेंसी हरिद्वार रूडकी विकास प्राधिकरण के अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक गोमुख से लेकर हर्षिल तक ही गंगा का पानी पीने योग्य है। और देवप्रयाग में गंगा का पानी नहाने और आचमन के लायक है। जबकि ऋषिकेश से हरिद्वार तक गंगा का पानी आचमन के लायक भी नहीं रहा। विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष रमेश चंद्र शर्मा का कहना है कि गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक और बद्रीनाथ से लेकर देवप्रयाग तक जिस तरह से इन क्षेत्रों में आबादी का दबाव बढ़ा है और शहरीकरण हुआ है, उससे पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचा है। श्रीनगर गढ़वाल में गंगा की सबसे प्रमुख सहायक अलकनंदा नदी पर बने बांध ने इस नदी के पानी को सबसे ज्यादा प्रदूषित किया है। श्रीनगर के पास कीर्तिनगर में अलकनंदा का पानी नहाने लायक भी नहीं रहा है। उसका बुरा असर गंगा नदी पर भी पड़ रहा है।

‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार की योजना अगले साल जनवरी में हरिद्वार में लगने वाले अर्द्धकुंभ मेले से पहले गंगा का जल बिल्कुल स्वच्छ करने की है। लेकिन, जिस तरह गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा में गिर रहे गंदे नालों को रोकने की सरकारी योजना चल रही है, उससे नहीं लगता कि अर्द्धकुंभ तक गंगा साफ हो जाएगी।

उत्तराखंड पेयजल निगम (गंगा) के महाप्रबंधक वाईके मिश्रा के मुताबिक इस साल सितंबर में गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा में गिर रहे नालों को बंद करने की 502 करोड़ रुपए की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) केंद्र सरकार को राज्य सरकार की तरफ से भेज दी गई थी। लेकिन अब तक केंद्र सरकार की तरफ से इस मामले में कोई मंजूरी नहीं मिली है। मिश्रा का कहना है कि गोमुख से देवप्रयाग तक भागीरथी नदी में, बद्रीनाथ से देवप्रयाग तक गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी अलकनंदा में और देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा नदी में कुल एक सौ तैंतालीस नाले मिलते है। इनमें से एक सौ पैंतीस नालों में प्रदूषित पानी आता है, जिनमें से अट्ठावन नाले जल संस्थान ने बंद करने का दावा किया है। और अब भी सतहत्तर नालों का गंदा पानी सीधे गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिरता है। इन 143 नालों में से केवल आठ नालों में ही प्राकृतिक स्रोतों का साफ पानी आता है।

जगजीतपुर हरिद्वार में गंगा किनारे सत्तर करोड़ रुपयों की लागत का प्रस्तावित चालीस एमएलडी के जल-मल शोधन संयंत्र (एसटीपी) का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है। उत्तराखंड जल संस्थान अनुरक्षण शाखा (गंगा) के अधिशासी अभियंता अजय कुमार का कहना है कि हरिद्वार शहर के पचहत्तर एमएलडी सीवर के गंदे पानी में से केवल पैंतालीस एमएलडी सीवर के पानी का ही ट्रीटमेंट हो पा रहा है। और तीस एमएलडी सीवर का गंदा पानी गंगा नदी में छोड़ना पड़ रहा है। 1985 और 2010 के कुंभ मेले में गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई द्वारा हरिद्वार शहर की नालियां और सीवर लाइनें बंद की गई थीं। लेकिन बंद करने के लिए जो तरकीब अपनाई गई, वह कारगर नहीं है। हल्की सी बरसात होने पर इन नालों का गंदा पानी उछल कर सीधे गंगा में जाता है।
इंडियन एकेडमी आॅफ एनवायरनमेंट साइंसेज के राष्टÑीय अध्यक्ष बीडी जोशी के अनुसार पिछले तीस सालों में गंगाजल का तापमान दो डिग्री सेल्शियस बढ़ चुका है।

1985 में गंगाजल का तापमान 12.5 डिग्री सेल्शियस था, जो 2015 में बढकर 14.5 डिग्री सेल्शियस हो गया है। इसी तरह गंगाजल में आॅक्सीजन की मात्रा भी घटी है। गंगाजल में आॅक्सीजन की मात्रा 1985 में 10.8 मिलीग्राम प्रतिलीटर थी जो कि अब घटकर 8.2 मिलीग्राम प्रतिलीटर रह गई है। साथ ही गंगाजल की पारदर्शिता 1985 के मुकाबले 60 फीसद से घटकर 29 फीसद रह गई है। गंगा में भारी मात्रा में कूडा, कचरा और सीवर का पानी डालने से गंगा में टीडीएस की मात्रा 287.8 मिलीग्राम प्रतिलीटर से बढकर 412.7 मिलीग्राम प्रतिलीटर हो गई है। सभी आंकडेÞ बताते है कि अमृत तुल्य गंगाजल के अस्तित्व पर आज संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंन्स्टीट्यूट (नीरी) द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक गंगाजल के नमूनों में कोलीफोर्म, फिकल कोलीफार्म, इ-कोलाई और फीकल स्ट्रैप्टोकोकाई नामक नुकसानदेह तत्त्व पाया गया है। जांच में यह तथ्य सामने आया कि गंगा नदी के मैदानी क्षेत्रों में मानव-मल से पैदा होने वाले प्रदूषण की मात्रा काफी ज्यादा बढ़ गई है और गंगा घाटी की इस पट्टी में पित्त की थैली के कैंसर के मामले अन्य स्थानों के मुकाबले ज्यादा पाए गए हैं।

इंडियन काउंसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च अपोलो हॉस्पिटल बंग्लुरू (कर्नाटक) के वरिष्ठ सलाहकार और कैंसर विशेषज्ञ पीपी वाप्सी के मुताबिक इन क्षेत्रों में चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर और ज्यादा तथ्य जुटाने की आवश्यकता है, ताकि इन क्षेत्रों में कैंसर की रोकथाम की जा सके। उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के शिक्षक सुनील जोशी का मानना है कि मैदानी क्षेत्रों में सीवर का पानी जिस तेजी के साथ गंगा में मिल रहा है, उससे जलजनित पेट की बीमारियों का तेजी से फैलने का खतरा बढ़ जाता है। पित्त की थैली के साथ-साथ लीवर के कैंसर का भी खतरा पैदा हो जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि गंगा के तट पर नीम, हरड़, बहेड़ा, गूलर, पीपल जैसे पेड़ों को लगाने की जरूरत है, जो गंगाजल को शुद्ध रखने में सहायक होगें।

1985 में गंगा एक्शन प्लान के तहत विद्युत शवदाह गृह, सीवर ट्रीटमेंट प्लांट और नालों को बंद करने सिलसिला शुरू हुआ था, लेकिन बाद में उस तरफ से ध्यान हटा लिया गया। हरिद्वार में बना विद्युत शवदाह गृह कई सालों से बंद पड़ा है। श्रीनगर गढ़वाल में बना जल-मल शोधन संयंत्र कभी ढंग से काम नहीं कर पाया। इन लापरवाहियों की वजह से गंगा एक्शन प्लान ने बीच में ही दम तोड़ दिया।

गंगा नदी के नाम पर धर्म और आस्था की दुकान चलाने वाले साधु-संत और मठाधीशों के बड़े-बडेÞ आश्रम और अखाडे गंगा को प्रदूषित करने में पीछे नहीं रहे हैं। गोमुख और बद्रीनाथ से हरिद्वार तक गंगा और अलकनंदा के तट पर बने सैकडों आश्रमों का गंदा पानी सीधे गंगा में जा रहा है। खनन माफियाओं ने खनन के नाम पर किनारे लगे पेड़ों को काट डाला और गंगा का जिस तरह दोहन किया उससे गंगा के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है। गंगा रक्षा के काम में लगी संस्था मातृसदन के स्वामी शिवानंद सरस्वती का कहना है कि जिस तरह से गंगा में खनन करने के नाम पर गंगा के टापुओं को बर्बाद किया जा रहा है उससे गंगा का वजूद मिटते हुए देर नहीं लगेगी।

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