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पत्रकारिता को पुख्ता पहचान देने की तैयारी में डीयू

सरकार एक तरफ इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ मास कम्युनिकेशन (आइआइएमसी) को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा देने की प्रक्रिया में है।

Author नई दिल्ली | July 29, 2016 01:45 am

सरकार एक तरफ इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ मास कम्युनिकेशन (आइआइएमसी) को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा देने की प्रक्रिया में है। वहीं दूसरी ओर चोटी के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शुमार दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में ‘पत्रकारिता’ पुख्ता पहचान को तरस रही है। करीब 70 कॉलेजों को अपने बेड़े में शामिल रखने वाले डीयू से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले छात्रों को इस क्षेत्र में उच्च शिक्षा के लिए दूसरे संस्थानों की ओर रुख करना पड़ रहा है। मसलन पत्रकारिता में एमए, एमफिल व शोध के लिए डीयू के छात्र दूसरे विश्वविद्यालयों की ओर मुखातिब होने को मजबूर हैं।

विशेषज्ञों व शिक्षाविदों की मानें तो डीयू को इस बाबत जल्द कदम उठाने की जरूरत है। उनका कहना है कि जब बेहतर सरकारी तंत्र स्थापित कराना पत्रकारों के एजंडे में है तो बेहतर पत्रकार पैदा करना भी सरकार के एजंडे में होना चाहिए। उधर विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि कुलपति इस मसले पर गंभीर हैं। वह दिन दूर नहीं कि जब डीयू के छात्र पत्रकारिता में एमए, एमफिल व शोध भी यहीं से करेंगे। जानकारी के मुताबिक, कुलपति प्रोफेसर योगेश त्यागी ने इस बाबत न केवल खाका तैयार किया है बल्कि विद्वत परिषद में पास कराकर इस बाबत कार्रवाई शुरू कर दी है।

इस समय डीयू में पत्रकारिता के दो पाठ्यक्रम हैं। डिप्लोमा और सर्टिफीकेट पाठ्यक्रम कैंपस का दक्षिण परिसर से हिंदी विभाग चलाता है। दूसरा स्नातक स्तर पर बीए कॉलेजों में चलाए जाते हैं। दोनों में दाखिला टेस्ट के जरिए होता है। लेकिन दोनों ही पाठ्यक्रम आधुनिक मीडिया की जरूरतें पूरा नहीं कर पाते। ये पाठ्यक्रम 21वीं सदी के पत्रकार पैैदा करने में अक्षम साबित हो रहे हैं। यहां के छात्र एमए, एम फिल, शोध आदि के लिए जामिया, आइपी, माखनलाल विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र व हिसार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, रुहेलखंड व महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय की ओर रुख करते हैं तो कई मीडिया घरानों के पत्रकारिता संस्थान से भारी फीस अदा कर पत्रकारिता में करिअर बनाते हैं। डीयू से पत्रकारिता में डिप्लोमा व सर्टिफीकेट करने वाले छात्र जब एमए, एमफील में कहीं और दाखिला लेते हैं तो उन्हें समय जाया होने का मलाल सताता है। उन्हें लगता है कि यदि एक साल में डिप्लोमा व सर्टिफीकेट की जगह दो साल का पाठ्यक्रम कर एमए दे दी जाती तो एम फिल व शोध करने और करिअर बनाने में मदद मिलती।

जनसत्ता के इस सवाल पर आइआइएमसी के प्राध्यापक आनंद प्रधान ने कहा, ‘निश्तिच तौर पर डीयू में इस बाबत विभाग खोला जाना चाहिए। पत्रकारिता के विशेषज्ञों की नियुक्ति होनी चाहिए। डीयू के तमाम पाठ्यक्रमों को मिलाकर व्यापक पाठ्यक्रम बनाने चाहिए। यह छात्रों की ही नहीं समय की मांग है’। उन्होंने कहा कि आइआइएमसी को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा देने की प्रक्रिया चल रही है। इसके बाद आइएमसी भी दायरा बढ़ाएगा, व्यापक पाठ्यक्रम बनाने की तैयारी है।

शिक्षाविद व पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि डीयू में केवल विभाग ही नहीं पढ़ाने वालों की योग्यता तय करने की जरूरत है। पाठ्यक्रम व्यापक हो, करियर उन्मुख हो और विशेषज्ञ पढ़ाएं! उन्होंने कहा कि दुनिया में केवल अपना ही देश है जहां के कई विश्वविद्यालयों में ‘भाषा’ पढ़ाने वाले पत्रकारिता पढ़ाते हैं। उन्होंने कहा, ‘यह समझना होगा कि पत्रकारिता एक अलग विधा है’।
डीयू के कार्यकारी परिषद के सदस्य हंसराज सुमन ने कहा, ‘डीयू में जब तक पत्रकारिता के लिए अलग विभााग नहीं बनेगा तब तक छात्रों को भटकने से राहत नहीं मिलेगी। एमए, एम फिल, शोध आदि की पढ़ाई तभी संभव हो सकेगी। उन्होंने कहा कि इस बाबत कई सालों से मांग उठ रही है। डीयू को यूजीसी के सर्कुलर का पालन करना चाहिए जिसमें कहा गया है कि पत्रकारिता पढ़ाने वालों के लिए पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर (जेएमसी, एमएएमसी, एम फिल, नेट) की योग्यता जरूरी है।

डीयू के हिंदी विभाग के अध्यक्ष हरिमोहन शर्मा ने कहा-डीयू में इस बाबत नया विभाग बनाने का एक प्रस्ताव विद्वत परिषद ने पास किया है। हालांकि अभी इस पर आगे चर्चा होनी है। लेकिन कुलपति इस बाबत गंभीर हैं।
कुलपति के एजंडे में जिस पत्रकारिता विभाग की संकल्पना है, वह दूसरे विश्वविद्यालय से एकदम अलग है। सूत्रों की मानें तो विदेशों में पत्रकारिता की पढ़ाई और पत्रकारिता के नए आयामों को इसमें समाहित किया जाना है।

मसलन बैठक में ‘अमेरिकी-मॉडल’ पर चर्चा हुई। विदेशी संस्थानों में पत्रकारिता विभाग ने क्या-क्या समाहित कर रखा हैं? पाठ्यक्रम में तकनीकी-जानकारी का कितना हिस्सा हो? तय हुआ कि 50 फीसद केवल प्रायोगिक हो। अखबार और टीवी पत्रकारिता के अलावा वाल-पेपर, पोर्टल, सोशल मीडिया में दक्षता के लिए खाका बने।

इंटर्नशिप का ज्यादा हिस्सा हो। रचनात्कमता कैसे निखारी जाए, इस पर काम हो। प्लेसमेंट और शोध दोनों विकल्प छात्रों के पास हों। इसके अलावा वरिष्ठ पत्रकारों व न्यूज-रूम में लगे तकनीकी विशेषज्ञों का लाभ छात्रों को दिलवाने की पहल हो। इतना ही नहीं छात्रों को देश-विदेश के पत्रकारिता कानून, कॉपी राइट, समाजिक सरोकार, देशहित-जनहित और जोखिम की समझ बढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम में उपबंध शामिल करने पर सहमति बनी है।

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