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दिनों-दिन कम हो रही डीटीसी की कमाई

यात्रियों को बेहतर परिवहन सुविधाएं मुहैया कराने के नाम दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) हमेशा से घाटे का रोना रोता रहा है लेकिन अब यह बात आंकड़ों के जरिए भी सामने आ गई है।

यात्रियों को बेहतर परिवहन सुविधाएं मुहैया कराने के नाम दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) हमेशा से घाटे का रोना रोता रहा है लेकिन अब यह बात आंकड़ों के जरिए भी सामने आ गई है। डीटीसी में बसों की आमदनी को लेकर जारी एक आंकड़ा बताता है कि 2012 के बाद डीटीसी बसों की आमदनी में लगातार गिरावट हुई है, जबकि इससे पहले आमदनी में उतार-चढ़ाव की स्थिति बरकरार थी। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आमदनी के पैमाने में साल 2008 से अप्रैल 2016 के बीच साल 2012 में बसों ने सबसे अधिक कमाई की है। 2012 में जहां डीटीसी की प्रत्येक बस की एक दिन की औसत कमाई 5524 रुपए थी, वहीं कुल बसों की रोजाना की औसत आमदनी 269.78 लाख रुपए थी। जो साल 2008 से लेकर अप्रैल 2016 तक के बीच सबसे ज्यादा था। डीटीसी में बसों के परिचालन पर एक नजर डालें तो 2012 के बाद अप्रैल 2016 तक बसों की आमदनी में लगातार गिरावट दर्ज हुई है, जबकि 2012 से पहले 2008 के बीच पांच सालों में बसों की आमदनी में उतार-चढ़ाव की स्थिति रही है।

यानी 2012 के बाद डीटीसी बसें लगातार अपनी आमदनी के निचले स्तर को छूती रही हैं। साल 2008 में एक बस की औसत आमदनी 2635 रुपए और एक दिन की कुल आमदनी 75.95 लाख रुपए थी। वहीं 2016 के पहले चार महीनों में एक बस की एक दिन की औसत कमाई 4640 रुपए और कुल बसों की एक दिन की औसत कमाई 171.50 लाख रुपए रही।
डीटीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि पिछले दस सालों में बस और कर्मचारियों के अनुपात में वृद्धि हुई है और यह ढाई से बढ़कर तीन गुना हो गई है। हालांकि इन सालों में डीटीसी की बसों की सड़क पर मौजूदगी बढ़ी है। साल 2008 में औसतन 3714 बसें रोजाना चलती थीं तो 2009 में 3739, 2010 में 5220, 2011 में 6172, 2012 में 5714, 2013 में 5403, 2014 में 5059 और 2015 में 4675 बसें सड़क पर मौजूद होने का आंकड़ा है।

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