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मैक्सफोर्ट की दो शाखाएं सरकार के नियंत्रण में

केजरीवाल सरकार के स्कूलों के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े फैसले के अनुसार एक निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूल की दो शाखाओं को सरकार अपने नियंत्रण में ले रही है

Author नई दिल्ली | August 4, 2016 12:58 AM

केजरीवाल सरकार के स्कूलों के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े फैसले के अनुसार एक निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूल की दो शाखाओं को सरकार अपने नियंत्रण में ले रही है। इसके लिए उपराज्यपाल नजीब जंग ने मंजूरी दे दी है। वहीं बाद में बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी। स्कूल अधिकारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया जिसने कहा कि जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया जाए। अदालत ने एक स्थानीय आयुक्त को स्कूल का दौरा करने के लिए नियुक्त किया जो सरकार द्वारा संस्थान के कामकाज के सिलसिले में मांगे गए दस्तावेजों का रखरखाव करेंगे। सुनवाई की अगली तारीख सोमवार तक यथास्थिति रखने का निर्देश है।

सूत्रों के मुताबिक, उपराज्यपाल ने मंगलवार को स्कूल को नियंत्रण में लेने की मंजूरी दे दी है और मैक्सफोर्ट स्कूल की रोहिणी और पीतमपुरा शाखाओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई है। इनके खिलाफ कई तरह की अनियमितताओं की शिकायतें थीं जिसके आधार पर शिक्षा निदेशालय ने इस साल अप्रैल में स्कूल की दोनों शाखाओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा था। सरकार स्कूलों के दिए गए नोटिस के जवाब से संतुष्ट नहीं थी। स्कूल के खिलाफ दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम 1973 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के उल्लंघन का मामला बनता है।

दिल्ली में मैक्सफोर्ट स्कूल की चार शाखाएं हैं जिनका संचालन चड्ढा एजुकेशनल सोसायटी और एस जगत सिंह चड्ढा चैरिटेबल ट्रस्ट करता है। अभिभावक संगठन की तरफ से शिकायत मिलने के बाद शिक्षा निदेशालय (डीओई) ने मार्च में दोनों स्कूलों के प्रमुख को पत्र लिखकर उन छात्रों के परीक्षा परिणाम घोषित करने के लिए कहा जिनके अभिभावक शुल्क बढ़ोतरी का विरोध कर रहे थे। कोष में धोखाधड़ी की शिकायतों को दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को भेज दिया गया और सरकार ने दो समितियों का गठन किया था जिनमें एक शिक्षा विभाग और दूसरी उत्तर पश्चिम दिल्ली के जिलाधिकारी के तहत थी। रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल ने सर्विस रिकार्ड और शिक्षकों की निजी फाइल भी नहीं बनाई और कर्मियों के वेतन से संबंधित ब्योरा, कर्मियों की उपस्थिति पंजिका और अन्य जरूरी दस्तावेज भी नहीं दिए। यह भी पाया गया कि स्कूल ने कैपिटेशन फीस भी वसूला था और स्कूल प्रबंधन ने डीएसई अधिनियम 1973 की धारा 24 का उल्लंघन किया था जिसके मुताबिक हर मान्यता प्राप्त स्कूल का प्रत्येक वित्त वर्ष में कम से कम एक बार जांच किया जाना जरूरी है जो स्कूल समिति की तरफ से सहयोग नहीं करने के कारण नहीं हुआ।

सरकार के इस फैसले का दिल्ली स्टेट पब्लिक स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने कड़ा विरोध किया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष आर सी जैन ने कहा, ‘जब भी नियंत्रण किया गया है उसके बाद स्कूल बर्बाद हो गया है क्योंकि सरकार स्कूल चला नहीं पाती है। नियमों के अनुसार सरकार को अधिकतम पांच सालों बाद स्कूल को वापस प्रबंधन को लौटाना होता है, लेकिन उसके बाद स्कूल की स्थिति जर्जर हो चुकी होती है’। जैन ने सेंट्रल स्कूल, आरके पुरम और प्रीत पब्लिक स्कूल का उदाहरण रखा। जैन के मुताबिक सेंट्रल स्कूल को लगभग 13-14 साल पहले नियंत्रण में लिया गया था, जो आज बंद पड़ा है। उन्होंने सरकार पर स्कूल विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह जनता की वाहवाही लूटने के लिए उठाया गया राजनीतिक कदम है। जैन ने आशंका जताई कि सरकार जिन 82 निजी स्कूलों की जांच करवा रही है उन्हें भी किसी तरीके से नियंत्रण में लिया जा सकता है।

माउंट कार्मेल स्कूल के डीन डॉक्टर माइकेल विलियम ने कहा, ‘अनियमितताओं के लिए स्कूलों को दंडित करना तो ठीक है, लेकिन सरकार द्वारा नियंत्रण में लिया जाना अलग मुद्दा है। सरकार के पास इतने संसाधन और सुविधाएं नहीं हैं कि वह गुणवत्तापूणर् शिक्षा देते हुए स्कूल को चला सके। सरकार के इस प्रतिशोधी रवैये से शिक्षा का स्तर और नीचे जाएगा’।

शिक्षा निदेशालय के मुताबिक, सरकार निजी पक्ष से स्कूल प्रबंधन को अपने नियंत्रण में ले लेगी और इसके संचालन के लिए एक प्रशासन की नियुक्ति करेगी। यह प्रशासन सरकार के अंदर से हो सकता है या बाहर से, लेकिन उसकी नियुक्ति सरकार करेगी। हालांकि, स्कूल निजी ही रहेगा जहां छात्रों को शुल्क का भुगतान करना होगा। स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षक भी नहीं बदलेंगे और सरकार स्कूल के कर्मियों को वेतन देगी।

स्कूल ने दावा किया था कि यह कार्रवाई अवैध और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। स्कूल की दो शाखाएं और हैं और सरकार की इस कार्रवाई से इन दो शाखाओं के कर्मचारी भी थोड़े अनिश्चित और सहमे हुए हैं। फिलहाल अब नजर सोमवार पर है।

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