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टैस्ट मैच के दिन

टैस्ट क्रिकेट में अव्वल दक्षिण अफ्रीका पर घरेलू शृंखला में शानदार जीत से भारतीय दर्शक भले ही गदगद हों, लेकिन मैच प्रायोजक, विज्ञापनदाता और ब्रॉडकास्टर खुश नहीं हैं। उन्हें घाटे का गम सता रहा है।

टैस्ट क्रिकेट में अव्वल दक्षिण अफ्रीका पर घरेलू शृंखला में शानदार जीत से भारतीय दर्शक भले ही गदगद हों, लेकिन मैच प्रायोजक, विज्ञापनदाता और ब्रॉडकास्टर खुश नहीं हैं। उन्हें घाटे का गम सता रहा है। चार मैच की इस शृंखला में बेंगलुरु मैच तो बारिश से धुल गया था जबकि मोहाली और नागपुर टैस्ट तीन दिन में निपट गए। इन दोनों शहरों की पिच पर मानो विकटों का पतझड़ लग गया था। केवल दिल्ली में हुआ अंतिम मुकाबला पांच दिन चला। एक मोटे अनुमान के अनुसार खेल जल्दी निपट जाने से प्रायोजकों, विज्ञापनदाताओं और ब्रॉडकास्टरों को करीब अस्सी करोड़ रुपए का घाटा हुआ।
दुनिया भर के देशों में टैस्ट मैच जल्दी समाप्त हो जाने का चलन बढ़ता जा रहा है। 2010 से अब तक दुनिया भर में 247 टैस्ट मैच खेले गए हैं, जिनमें से 186 में ही हार-जीत का फैसला हुआ और इकसठ अनिर्णीत रहे। जिन मैचों का परिणाम निकला, उनमें केवल 82 ही निर्धारित पांच दिन चले। बाकी चार दिन और तीन दिन में ही समाप्त हो गए। जो मैच तीन दिन में खत्म हो गए, उनमें से पांच की मेजबानी भारत ने की थी।
टैस्ट क्रिकेट खेलने वाले दुनिया के दस देशों में से आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और भारत ऐसे हैं, जहां मैच जल्दी निपट जाने का चलन तेजी से जोर पकड़ रहा है। इन मुल्कों में पिछले पांच साल में 48 फीसदी टैस्ट चार या तीन दिन में खत्म हो गए। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि साल दर साल यह प्रवृति जोर पकड़ रही है।
फटाफट क्रिकेट से टैस्ट मैचों की तासीर गड़बड़ा गई है। टैस्ट विधा को जीवित रखने के लिए आॅस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल ने अनोखा सुझाव दिया था। उसके अनुसार अब टैस्ट क्रिकेट का भविष्य तीन दिनी मैचों में है। खेल शुक्रवार से शुरू होकर रविवार तक चलने चाहिए क्योंकि ये दिन मैदान में आने वाले दर्शकों और घर में टेलीविजन पर खेल देखने वाले लोगों, दोनों के अनुकूल हैं। अगर मैच दिन-रात के कर दिए जाएं तो टैस्ट क्रिकेट को जीवनदान मिल जाएगा।
छह बरस पहले दिया चैपल का सुझाव अब रंग लाने लगा है। दिन-रात के टैस्ट मैच की शुरूआत हो चुकी है। मैदान और टेलीविजन पर दर्शकों की घटती संख्या से चिंतित आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड क्रिकेट बोर्ड ने अपनी ताजा शृंखला का तीसरा और अंतिम मैच दिन-रात खेला, जिसे मेजबान आॅस्ट्रेलिया ने आसानी से जीत लिया। 138 साल से टैस्ट इतिहास में यह सबसे बड़ा और क्रांतिकारी परिवर्तन माना जा रहा है। एडिलेड टैस्ट के पहले दिन मैदान में चालीस हजार दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा। यह मैच भी महज तीन दिन में निपट गया। मैदान में सवा लाख दर्शक पहुंचे, जबकि इसी ग्राउंड पर दोनों टीम के बीच 2008 में हुए मुकाबले को महज 16,000 दर्शक मिले थे। भारत जैसे क्रिकेट के गढ़ में भी आजकल टैस्ट मैच के दौरान स्टेडियम सूने रहते हैं। दक्षिण अफ्रीका से हुई शृंखला इसका प्रमाण है, जहां भारत की जीत के बावजूद स्टैंड लगभग खाली थे। मजबूरन कई जगह आयोजकों को प्रवेश निशुल्क करना पड़ा है। एडिलेड टैस्ट के बाद आयोजकों को लगाता है कि उनका साहसिक निर्णय सफल रहा। अब आस्ट्रेलिया बोर्ड की इच्छा है कि अगले साल गर्मियों में दौरे पर आ रही पाकिस्तान की क्रिकेट टीम भी दिन-रात का एक टैस्ट जरूर खेले।

टैस्ट ही क्रिकेट की सबसे पवित्र विधा मानी जाती है। अब बिना विश्राम के खेल पांच दिन चलता है। इसी प्रकार एक ओवर में अधिकतम दो बाउंसर गेंद फेंकने की बंदिश भी लंबी बहस के बाद लगाई गई है। अब बाजार की मेहरबानी से टैस्ट क्रिकेट ने एक झटके में दिन-रात की राह पकड़ ली है।
कृत्रिम दूधिया प्रकाश में क्रिकेट खेलना एक चुनौती है। गेंद बराबर नजर आए, इसीलिए एक दिवसीय और टी-20 मैच में खिलाड़ी रंगीन कपड़े पहनते हैं और गेंद का रंग सफेद होता है। क्योंकि दिन-रात के टैस्ट मैच में खिलाड़ियों की पोशाक अभी तक सफेद है, इसलिए गेंद सफेद नहीं रखी जा सकती। दो प्रहर के मिलन की बेला में लाल गेंद देखने में कठिनाई होती है, इसी वजह से एडिलेड में गुलाबी गेंद का इस्तेमाल हुआ। दिन-रात के इस टैस्ट को गुलाबी क्रांति का नाम दिया जा रहा है। पिछले दो दशक में क्रिकेट नियमों में जो बदलाव हुए हैं, उससे खेल का पलड़ा बल्लेबाजों के पक्ष में झुक गया। टैस्ट हो, एक दिवसीय मैच या फिर टी-20 मुकाबला,अक्सर हर जगह गेंदबाजों की जमकर धुनाई होती है। आजकल के मैचों में गेंदबाज की हैसियत मजदूर और बल्लेबाज का दर्जा मालिक जैसा होता है। पिछले विश्व कप को ही लें, जहां इक्का-दुक्का को छोड़ अधिकांश मुकाबले एकतरफा रहे। लगभग हर टीम ने ऊंचा स्कोर टांका, बड़े बल्लेबाजों ने छक्कों और चौकों की बरसात की, फिर भी परिणाम प्रत्याशित रहे। टूर्नामेंट से रोमांच नदारद था। न किसी टीम ने पहाड़ जैसे स्कोर का पीछा कर विपक्षी को धूल चटाई और न ही किसी गेंदबाज की बाजुओं में विरोधी खेमे में सन्नाटा फैलाने का दम दिखा। अगर आज टैस्ट क्रिकेट में मैच तीन-तीन दिन में निपट रहे हैं तो इसका कारण बल्लेबाजों में धीरज की कमी और तकनीक का अभाव है। वैसे तो हालात गेंदबाजों के प्रतिकूल हैं। हां, एडिलेड में हुए दिन-रात के टैस्ट मैच को देखकर जरूर लगा कि बरसों बाद गेंदबाजों को खेल में समान दर्जा मिला है। इस मैच के बाद आॅस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीव स्मिथ ने बयान दिया कि मुकाबले को गेंदबाजों ने डोमिनेट किया। अगर आगे भी टैस्ट इस तर्ज पर चले, तब निश्चय ही क्रिकेट में रोमांच का उफान देखने का मिलेगा।
इतना कुछ हो रहा है, फिर भी आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान रिकी पोंटिंग जैसे कई लोग हैं जो टैस्ट विधा में किसी बड़े बदलाव के सख्त खिलाफ हैं। वे लोग पांच दिनी खेल को दिन-रात का तमाशा बनाने को राजी नहीं हैं। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आइसीसी) और टैस्ट मैच खेलने वाले दस देशों के बोर्ड हैं, जिन्हें इन मैचों में गिरती कमाई खाए जा रही है। सीमित ओवर के खेल में हो रही छप्पर फाड़ आमदनी से उनकी आंखें चकाचौंध हैं।
आज उन्हें हर मैच से मुनाफा चाहिए, मोटा मुनाफा। इसके लिए वे बड़े से बड़े बदलाव को तैयार हैं। वे घाटे के किसी भी सौदे के खिलाफ हैं, इसीलिए टैस्ट क्रिकेट की परंपरओं की बलि चढ़ा दी गई है। एडिलेड टैस्ट की कामयाबी के बाद और बदलाव की तैयारी हो सकता है, भविष्य में टैस्ट मैच चार या तीन दिन के कर दिए जाएं। कहा जाता है कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है। फटाफट क्रिकेट का जन्म बाजार की कोख से हुआ था। 1979 में इंग्लैंड और आॅस्ट्रेलिया के बीच खेले जा रहे मेलबोर्न टैस्ट के पहले चार दिन बारिश से धुल गए थे।

ब चे एक दिन में खेलने पर कोई परिणाम नहीं निकलताए सो बेसब्र दर्शकों की तसल्ली के लिए दोनों टीम ने सीमित ओवर का एक मैच खेलना तय किया। इंग्लैंड एकादश बनाम आॅस्ट्रेलिया एकादश के बीच हुए इस मुकाबले की सफलता ने वन-डे क्रिकेट की नींव रख दी, लेकिन चौथाई सदी के भीतर ही दर्शकों को 50-50 ओवर (शुरू में मुकाबले 60-60 ओवर के थे) का मैच देखना वक्त की बर्बादी लगने लगा। इसी वजह से बीस-बीस ओवर के खेल का जन्म हुआ। 2005 में आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच पहला अधिकृत टी-20 मैच हुआ था। शुरू में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने इसका डटकर विरोध किया, लेकिन क्रिकेट के इस मिनी संस्करण से मिली बेशुमार दौलत का मजा चख लेने के बाद हमारा बोर्ड अब टी-20 का दीवाना है।
इंडियन प्रीमियम लीग (आइपीएल) के दामन पर सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग के दाग लग जाने के बावजूद बीसीसीआई के पदाधिकारी इसे बंद करने की मांग सुनकर सिहर जाते हैं। कमाई नहीं है इसलिए टैस्ट मैच आयोजित करने में उनकी रुचि नहीं है। हां,अब अगर एडिलेड का परीक्षण सफल हो चुका है इसलिए टैस्ट क्रिकेट भी कामधेनु की गाय बन जाएगी। तब हमारा बोर्ड जरूर पांच दिन के खेल पर मेहरबान हो जाएगा। बाजार का कायदा केवल मुनाफे की भाषा समझता है और हमारा बोर्ड केवल इस कायदे पर चलता है।
क्रिकेट इतिहास में आॅस्ट्रेलिया को जो सम्मान प्राप्त है, उसे कोई दूसरा देश टक्कर नहीं दे सकता। कंगारुओं ने मेलबोर्न के मैदान में अपने प्रबल प्रतिद्वंद्वी इंग्लैंड से 1877 में मैच खेल टैस्ट क्रिकेट की नींव रखी थी। इसी देश ने दुनिया का पहला एक दिवसीय मैच 1971 में इंग्लैंड के खिलाफ मेलबोर्न में और 1979 में पहला दिन-रात का एक दिनी मुकाबला सिडनी में वेस्टइंडीज के विरुद्ध खेला था। टी-20 का प्रथम मैच भी वहां के आॅकलैंड स्टेडियम में 2005 में न्यूजीलैंड से हुआ था।
पिछली 27 नवंबर से एडिलेड में न्यूजीलैंड से पहला दिन-रात का टैस्ट मैच भी वहां खेला गया। करीब ढाई दिन चले इस मैच को आॅस्ट्रेलिया ने तीन विकेट से जीत लिया।

 

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