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कैप्टन रुचि शर्मा : सेना की पहली पैराशूटधारी योद्धा

सेना में ऑपरेशनल पैराट्रूपर, यानी पैराशूट से कूदने और युद्ध के दौरान चौंकाने वाले हमले करने में माहिर सैन्यकर्मी। कैप्टन रुचि शर्मा वर्ष 1996 में सेना में शामिल हुईं और उन्होंने पहली महिला ऑपरेशनल पैराट्रूपर बनने की योग्यता हासिल की।

सेना में ऑपरेशनल पैराट्रूपर, यानी पैराशूट से कूदने और युद्ध के दौरान चौंकाने वाले हमले करने में माहिर सैन्यकर्मी।

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह ट्वीट सुर्खियों में रहा, जिसमें उन्होंने लिखा, ‘मैं इस महिला दिवस पर अपना सोशल मीडिया अकाउंट उन महिलाओं को सौंप रहा हूं, जिन्होंने हमें प्रेरित किया है।’ उन्होंने आगे लिखा कि अगर आप किसी ऐसी महिला को जानते हैं, जिन्होंने आपको प्रेरित किया हो, तो उनकी कहानी ‘हैशटैग शीइंसपायर्सअस’ के साथ साझा करें। प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद ट्विटर पर लगातार यह हैशटैग ट्रेंड करता रहा और विभिन्न संगठन एवं लोग महिलाओं को प्रेरित करने वाली कहानियां साझा की गईं। इसी क्रम में रक्षा मंत्रालय के प्रधान प्रवक्ता के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कैप्टन रुचि शर्मा की कहानी साझा की गई। रक्षा मंत्रालय ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘कैप्टन रुचि शर्मा भारतीय सेना की पहली ऑपरेशनल पैराट्रूपर हैं। वे अब भी सभी उम्र की महिलाओं को देश की सेवा के लिए प्रेरित करती हैं।’

सेना में ऑपरेशनल पैराट्रूपर, यानी पैराशूट से कूदने और युद्ध के दौरान चौंकाने वाले हमले करने में माहिर सैन्यकर्मी। कैप्टन रुचि शर्मा वर्ष 1996 में सेना में शामिल हुईं और उन्होंने पहली महिला ऑपरेशनल पैराट्रूपर बनने की योग्यता हासिल की। पैराट्रूपर को निर्धारित स्थान पर उतरने के लिए पैराशूट का उपयोग करके विमानों से कूदने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इनका का इस्तेमाल अक्सर युद्ध के दौरान चौंकाने वाले हमलों के लिए किया जाता है। युद्ध के दौरान इस तरह के प्रशिक्षित सैनिकों को बेहद अहम माना जाता है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान टंगाइल की लड़ाई भारतीय योद्धाओं ने ऑपरेशनल पैराट्रूपर का इस्तेमाल कर जीती थी। कैप्टन रुचि शर्मा (रिटायर) 1996 से 2003 तक भारतीय सेना का हिस्सा रहीं। वे कहती हैं, मैं हर तरह के मुकाबले के लिए व्यक्तिगत रूप से तैयार रहती हूं। मुझे लगता है कि महिलाओं को लड़ाकू हथियार उठाने का मौका दिया जाना चाहिए। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि पुरुषों और महिलाओं में समान शारीरिक शक्ति है। उन्हें यह मौका दिया जाना चाहिए। महिलाएं भी इस काम को अच्छे से कर सकती हैं। वे कहती हैं कि जब वे सेना में शामिल हुईं, तब महिलाओं के लिए शॉर्ट सर्विस कमीशन का ही प्रावधान था। अगर तब स्थायी कमीशन का फैसला होता तो मैं स्थायी कमीशन ही चुनती।

उन्होंने 2001-2002 के ऑपरेशन पराक्रम में हिस्सा लिया। महिलाओं की युद्ध के मैदान में भूमिका को लेकर वे कहती हैं कि अलग से इंतजाम की जो बातें कही जाती हैं, वे सिर्फ इतनी हैं कि महिलाओं के लिए अलग टेंट का इंतजाम किया जा सकता है। पुरुषों में शारीरिक शक्ति बेशक ज्यादा होती है, लेकिन महिलाएं हथियार उठा सकती हैं और बेहतर कर सकती हैं। इसी बुधवार को चंडीगढ़ स्थित उनके कॉलेज एमसीएम डीएवी कॉलेज की स्वर्ण जयंती के मौके पर कैप्टन शर्मा को सम्मानित किया गया। वे 1995 में इसी कॉलेज में विज्ञान की विद्यार्थी थीं। उनके कई साथी आइएएस बने। वे खुद सर्जन बनना चाहती थीं, लेकिन उनके कदम सेना की ओर मुड़ गए। शर्मा को सेना के ऑर्डिनेंस कोर में कमीशन मिला और बतौर पैराट्रूपर उन्होंने 1997 में पहली छलांग लगाई। उन्होंने एक सेना अधिकारी से शादी की है और उनकी 16 साल की बेटी वरिजा है, जो नौकरशाह बनना चाहती है।

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