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साहित्य में जगह

प्राचीनों ने जब साहित्य, कलाओं, सौंदर्य आदि के सिलसिले में देश-काल की अवधारणा की थी तो वह कोई ऊपर से लादा गया सिद्धांत नहीं था: वह सृजन और चिंतन व्यवहार से स्वाभाविक रूप से निकला सिद्धांत था।

प्राचीनों ने जब साहित्य, कलाओं, सौंदर्य आदि के सिलसिले में देश-काल की अवधारणा की थी तो वह कोई ऊपर से लादा गया सिद्धांत नहीं था: वह सृजन और चिंतन व्यवहार से स्वाभाविक रूप से निकला सिद्धांत था। अगर कोई कृति अपने को देश और काल में अवस्थित न करे तो वह प्रामाणिक या विश्वसनीय नहीं रह जाती, ऐसा माना जाता था। इसका एक आशय तो निश्चय ही यह रहा है कि प्रामाणिकता के लिए कृति में देश और काल का अंतर्ध्वनित होना अनिवार्य है। लेकिन सृजन की एक बाध्यता यह भी है कि वह देश और काल में रसा-बिंधा रह कर भी उनके पार जाने की आकांक्षा रखता और कोशिश करता है।

उसे इसका खयाल तो रहता है कि देश और काल के पार जाने का रास्ता देश और काल के भीतर से ही जाता है: वह देश-काल में रह कर ही उनके पार और परे जा सकता है। देशातीत और कालातीत देश-काल को भूल कर या उन्हें हाशिये पर डाल कर नहीं पाए जा सकते। दूसरे शब्दों में, बिना सामयिक हुए सीधे शाश्वत नहीं हुआ जा सकता, कम से कम किसी सार्थक रूप से।
हमारे समय की एक बड़ी कठिनाई यह है कि वह देश और काल से इस कदर आक्रांत है कि हम साहित्य और कलाओं में उसके पार और परे जाना या तो भूल जाते हैं या हमें उसकी जरूरत नहीं लगती। जैसे पत्रकारिता अब और अभी तक ही प्राय: सीमित रहती है वैसे ही इन दिनों अधिकांशत: साहित्य भी। लेकिन, दूसरी ओर, यह भी सही है कि यह पूरी सच्चाई नहीं है, हो ही नहीं सकती।
प्रसाद के साहित्य में बनारस है, क्योंकि वह ‘वरुणा की शांत कछार’ को याद करता ‘गुण्डे’ से चल कर ‘आकाशद्वीप’ और ‘हिमगिरि के उत्तुंग शिखर’ तक पहुंचता है। वह ‘किसी के राज्य’ में रहने के बजाय ‘बुद्धि के वैभव’ में रहने को अभीष्ट मानता है, पर उस वैभव की भी जगह होती है! निराला के यहां ‘इलाहाबाद के पथ पर’ चल कर उनकी कविता ‘सरोज-स्मृति’ में बैसवाड़े की अद्भुत स्थानीयता को उद्बुद्ध करती है: उनकी उदास कविता जो देखती है उनके ‘दिवस की सांध्यवेला’ में, उसमें जो चित्र हैं वह सामान्य लगते हुए भी एक विशेष जगह का बोध जगाता है, जहां कोई मेला नहीं है। पंत के यहां उनका पहाड़ों से गहरा संबंध लगातार प्रतिध्वनित होता है। महादेवी की कविता में भले जगह सामान्यीकृत है, उनके संस्मरणात्मक गद्य में स्थान स्पष्ट चित्रित-इंगित है।

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अज्ञेय के यहां भी पहाड़ी भूगोल से लेकर इलाहाबाद-दिल्ली का नागरिक परिवेश सुचित्रित है। शमशेर के यहां जगह के निशान प्राय: हर कविता में मिलते हैं। मुक्तिबोेध की क्लैसिक कविता ‘अंधेरे में’ का भूगोल तो बहुत ठोस ढंग से नागपुर का है। वे चंबल की घाटियों से इस नागरिक भूगोल तक अपनी कविता में पहुंचते हैं। रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और श्रीकांत वर्मा अपनी कविताओं में जगह को तरह-तरह से खोजते-पाते-दिखाते हैं।

धुंधली दिखती दुनिया
सही है कि बहुत सारी दुनिया हमें बनी-बनाई मिलती है और हम भरसक उसमें थोड़ा-बहुत जोड़ने की कोशिश करते हैं। कई बार सफल होते हैं और प्राय: विफल। बहुत सारी दुनिया तो अपने आप बदलती है- कुछ हमारे किए-धरे से भी शायद बदलती है। अपने पीछे हम वही दुनिया, अंतत:, नहीं छोड़ते, जो हमें मिली थी। जो व्यापक दुनिया के बारे में सही है, वह साहित्य की दुनिया के बारे में भी सही है। ऐसे समय रहे हैं जब आप अपनी अलग दुनिया बना कर उसी में अपने को सीमित और तुष्ट कर सकते थे- हमारा समय ऐसा नहीं है: आप पर व्यापक दुनिया, अपने सभी दबावों-तनावों-संभावनाओं के साथ, लगातार हावी रहती है।
लगभग छह दशक साहित्य में सक्रिय रूप से बिताने के बाद, अपने से गहरे असंतोष के बावजूद, यह नहीं कह सकता कि साहित्य की दुनिया वही है, जो हमें मिली थी। वह बहुत बदल गई है और कई बदलाव अच्छे या हितकर या स्वस्थ नहीं कहे जा सकते। हम उनके लिए जिम्मेदार भी हैं। पहली बात तो यह लगती है कि लेखकों के बीच सहज सौहार्द और परस्पर आदर की कमी हुई है। हमारी दृष्टि और विचार में बहुत खुलापन-नयापन आया है, लेकिन व्यवहार में हम विचित्र रूप से संकुचित हुए हैं। अपने अलावा हर दूसरे लेखक की नीयत और महत्त्वाकांक्षा पर संदेह करना लेखकीय स्वभाव ही बन गया है। दूसरी बात यह है कि व्यापक रूप से आलोचना-वृत्ति का ह्रास हुआ है: सारी आलोचना या तो प्रशंसा-निंदा के सरलीकरण में घटा दी जाती है या फिर उसे शत्रुता का ही एक संस्करण मानना आदत-सी बन गई है।

तीसरी बात यह कि ध्यान से पढ़ने-गुनने का धीरज और अभ्यास लेखकों में ही कम हो गए हैं और विडंबना यह है कि हम पाठकों से ऐसे धीरज और अभ्यास की अपेक्षा करते हैं। चौथे, लेखक-पाठक संवाद बहुत शिथिल हो गया है और उसे संभव-सक्रिय बनाए रखने के लिए जो संस्थागत प्रयत्न होते थे वे प्राय: सभी निस्स्पंद हो चुके हैं: हिंदी विभागों, संस्थाओं आदि में लेखक ही हैं, लेकिन वही इस प्रयत्न की निस्पंदता से बेखबर और इस सिलसिले में निष्क्रिय और उदासीन हैं। पांचवीं सच्चाई यह समझ में आती है कि गोष्ठियां-परिसंवाद-समारोह आदि तो बहुत होते हैं, पर साहित्य में विचार मंद पड़ गया है।

यह भी विडंबना है कि एक ओर तो हर रचना को उसके तथाकथित विचार में घटा कर उसे देखने-परखने का अतर्कित उत्साह है और दूसरी ओर साहित्य को स्वयं स्वतंत्र विचार मानने और उसके माध्यम से विचार-संपदा में कुछ जोड़ने के प्रति अनुत्साह है। भारतीय बौद्धिक संस्कृति में हमारी साहित्यिक शिरकत बहुत कम रही है। छठवां दुखद तथ्य यह है कि हम, कुल मिला कर, हिंदी में साहित्य के लिए एक भरापूरा, संवेदनशील और उत्सुक, रसिक और आलोचक पाठक-समाज बनाने में विफल रहे हैं।
हो सकता है कि कई लेखकों को यह आकलन अतिरंजित, व्यर्थ निराशाप्रद लगे: हो सकता है कि अपनी तंगनजरी और शायद तंगदिली में मुझे साहित्य की आज की दुनिया कुछ ज्यादा ही निराश करती हो। मैं कई बार गलत ठहराया गया हूं और हो सकता है कि इस बार नए वर्ष के आरंभ में ही गलतबयानी कर रहा हूं। पर इसका फैसला तो दूसरे ही कर सकते हैं, मैं नहीं!

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