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अशोक वाजपेयी का कॉलम कभी-कभार: ‘फिर मुझे… याद आया’

भारत भवन के पहले दशक में अपने कई मूर्धन्यों पर हमने बड़े आयोजन किए थे, जिनमें मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि शामिल थे।

भारत भवन के पहले दशक में अपने कई मूर्धन्यों पर हमने बड़े आयोजन किए थे, जिनमें मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि शामिल थे। कवि श्रीकांत वर्मा हमारे एक न्यासी थे और उनसे जब-तब इस सबको लेकर संवाद होता रहता था। हमारा आग्रह इस बात पर था कि समकालीनता की झोंक में हम अपने पुरखों को भुला दें और नितांत समसामयिकता में सीमित न हो जाएं। एक दिन श्रीकांतजी का फोन आया और उन्होंने कहा कि भारत भवन को जैनेंद्र कुमार पर केंद्रित कोई बड़ा आयोजन करना चाहिए। जैनेंद्रजी तब जीवित थे और उनकी मूर्धन्यता को ध्यान में रखते हुए ऐसा कुछ करने में हमें बिल्कुल हिचक नहीं थी। कुतूहलवश मैंने श्रीकांतजी से पूछा कि उन्हें यकायक जैनेंद्रजी का खयाल कैसे आया। तो उन्होंने कहा कि खयाल उन्हें नहीं, तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आया है। उन्होंने आगे बताया कि पिछली शाम श्रीमती गांधी ने इसका सुझाव दिया है। उनके यह कहने पर कि वे तो आपके विरुद्ध बोलते रहे हैं, इंदिराजी ने उनसे कहा कि वे बड़े लेखक हैं और उनके विरोध को आड़े नहीं आने देना चाहिए।

बहरहाल, आयोजन हुआ और उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी स्वयं जैनेंद्र कुमार की उपस्थिति और जम कर शिरकत। वे अपने ऊपर हुए सभी प्रहारों से अविचल रहे और हरेक का उन्होंने, बिना आवाज ऊंची या तीखी किए और आपा खोए, तर्कसंगत उत्तर दिया या प्रतिकार किया। सारा आयोजन दो दिनों में फैला था और उसमें निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, श्यामाचरण दुबे, रमेशचंद्र शाह, पुरुषोत्तम अग्रवाल, मदन सोनी, ध्रुव शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी आदि शामिल हुए थे। बाद में जब हमने रिकार्डिंग सुनी तो पता चला कि जैनेंद्रजी कुल मिलाकर लगभग दस घंटे, कई किस्तों में, बोले थे! यह उनके जीवन का सबसे बड़ा, लेकिन अंतिम सार्वजनिक आयोजन भी हुआ। अपनी तीखी आलोचना को पूरे धीरज से सुनना और उसका अनेक बार सम्यक बुद्धि से तार्किक प्रत्याख्यान करना जैनेंद्रजी से सीखा जा सकता था।

उन्हीं दिनों मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बड़ी संख्या में पुस्तकें खरीदी जा रही थीं। उसे लेकर कई विवाद भी होते रहे थे। एक बार हमारे तब के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को तब के कांग्रेस उपाध्यक्ष कमलापति त्रिपाठी का एक पत्र आया, जिसमें कहा गया था कि ऐसी पुस्तकें खरीदी गई हैं, जिनके लेखकों ने आपातकाल या इंदिरा गांधी का विरोध किया था। उसके साथ जो लंबी शिकायत थी उसमें भवानी प्रसाद मिश्र के आपातकाल के दौरान लिखे कविता संग्रह ‘त्रिकालसंध्या’ का जिक्र करते हुए उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा शिखर सम्मान दिए जाने का हवाला था, मध्यप्रदेश कला परिषद की पत्रिका ‘कलावार्ता’ के पिछले आवरण पर छपे नागार्जुन के छायाचित्र की प्रतिकृति थी। श्रीराम वर्मा के एक कविता संग्रह में छपी ‘वह औरत: 1978’ शीर्षक कविता की एक प्रति थी, जिसमें श्रीमती गांधी पर निंदात्मक व्यंग्य था।
मैंने शिक्षा और संस्कृति सचिव के रूप में इन आरोपों का ब्योरेवार खंडन करते हुए उत्तर का प्रारूप तैयार किया और उसे मुख्यमंत्री के पास ले गया। उन्होंने कहा कि इतने लंबे प्रत्याख्यान की कोई जरूरत नहीं है। ‘बस यह लिखिए कि मध्यप्रदेश में हम श्रीमती गांधी के निर्देशन में उनकी इच्छा के अनुरूप संस्कृति को राजनीति और विचारधारा से दूर रखते हुए काम कर रहे हैं।’

अंतर्विरोध
हर क्षेत्र में सिद्धांत और व्यवहार में कुछ न कुछ दूरी होती है। कविता में भी। बल्कि साहित्य में भी। इसका एक कारण तो यह है कि सिद्धांत-रचना साहित्य का बुनियादी काम नहीं है। उसका काम तो सच्चाई, आत्म, दुनिया, प्रकृति, मानवीय संबंध, प्रेम आदि को भाषा में खोजना-रचना है। इस रचने से ही कई बार सिद्धांत भी निकलते हैं। स्वयं लेखक भी सिद्धांत-निरूपण करते हैं। अज्ञेय अपने सैद्धांतिक व्यवहार में मौन पर आग्रह करते हैं, पर उनकी कविता शब्द-विपुल है। ऐसे कई और उदाहरण हैं।
इधर इस ओर ध्यान गया जब संभवत: ब्राजील के सबसे बड़े कवि कार्लोस द्रुमेंद द आंद्रादे की चुनी हुई कविताओं के अंगरेजी अनुवाद संग्रह ‘मल्टीट्यूडीनस हार्ट’ (पेंगुइन) हाथ लगा और उसमें दी गई कविता ‘कविता की खोज में’ पर निगाह अटकी। उसमें कवि कहता है कि ‘जो कुछ हुआ उसके बारे में कविताएं मत लिखो। अपनी भावनाएं मुझे मत बताओ, क्योंकि तुम जो सोचते और महसूस करते हो वह अभी कविता नहीं है। अपने उदास और लंबे अरसे से भुला दिए गए बचपन की पुनर्रचना मत करो। आईने और छीजती यादों के बीच दाएं-बाएं मत होओ।’ यों तो ये हिदायतें कवि स्वयं को दे रहा है, पर वही उसका पालन नहीं करता। उसकी कविता में घटनाएं हैं, चीजें और यादें हैं, भावनाएं और बचपन है। उसका इस पर इसरार जरूर है कि कविता शब्दों से बनती है, पर शब्दों को कविता में विन्यस्त करने के लिए यह सभी सामग्री यानी जिंदगी के ब्योरे चाहिए। निरे शब्दों से कविता नहीं बन सकती, उसके लिए जीवन और उसका अथक स्पंदन चाहिए।
यह कहने के पहले अपनी एक कविता में कि ‘मैं दुनिया के अपराधों को कैसे क्षमा कर दूं?/ मैंने कुछ में हिस्सा लिया और कुछ को छिपाया’ वे यह आत्मावलोकन दर्ज करते हैं:
और अगर मैंने इस शहर पर उचाट का वमन किया है!
चालीस वर्ष और एक भी समस्या
हल नहीं हुई, प्रस्तुत तक नहीं,
एक भी पत्र न लिखा या पाया गया
लोग सभी घर जा रहे हैं
वे कम स्वतंत्र हैं लेकिन अखबार लिए हुए हैं
दुनिया से नतीजे निकाल रहे हैं
यह जानते हुए कि वे उसे गंवा चुके हैं।
शुद्ध संयोग!
अपने पचहत्तरवें वर्ष में कुछ संयोग होते देख कर थोड़ी हंसी आ रही है। एक संगीतकार मित्र ने इस उपलक्ष्य में दुर्लभ संगीत पर एकाग्र एक तीन दिनों का समारोह भोपाल में आयोजित करने के लिए वहां के राष्ट्रीय मानव संग्रहालय को कई महीने पहले अपना सभागार देने के लिए राजी कर लिया। जब एकाध सप्ताह रह गया तो वहां कुछ तकनीकी खराबी आ गई और एक बेहद अशक्त मित्र को समारोह तीन से कम दो दिन का, अन्यत्र काफी खर्चा उठा कर, करना पड़ा। एक चित्रकार मित्र ने दिल्ली में उन कलाकारों के चित्रों की एक प्रदर्शनी करने का विचार किया, जिसमें मेरी रुचि और जिनसे मेरे संबंध रहे हैं। इंदिरा गांधी कला केंद्र ने अपनी कलावीथिका देने का आश्वासन भी दे दिया। अब वह वापस ले लिया गया है। चित्रकार मित्र और पद्म विभूषण से अलंकृत सैयद हैदर रज़ा अगली फरवरी में चौरानबे के हो जाएंगे। उनके ताजा चित्रों की एक प्रदर्शनी के लिए ललित कला अकादेमी की कलावीथिका महीनों पहले आरक्षित कर ली गई थी, अब वह नहीं मिल रही है, क्योंकि उसी समय अकादेमी को अपनी कोई प्रदर्शनी लगाने की जरूरत पड़ गई है।

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