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डिजाइनर इंसान बनाने की कोशिश कर रही भारत और अमेरिका की ये परियोजना

शिकागो स्थित प्रतिष्ठित फर्मी नेशनल एक्सीलेरेटर लैबोरेटरी के निदेशक और मौलिक कण ‘टॉप क्वार्क’ की खोज का नेतृत्व करने वाले नाइगेल लॉकयेर बताते हैं कि किस तरह से उनका संस्थान और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) (मुंबई) ने ऐसा नया एक्सीलेरेटर बनाने की शुरूआत की है, जो एक दिन डिजाइनर इंसान बनाने में सफल हो सकता है।

Author नई दिल्ली | August 1, 2016 12:35 AM
Nigel Lockyer, director of the iconic Fermi National Accelerator Lab (Source: Fermilab website)

भारत और अमेरिका के साझा प्रयासों के तहत शुरू हुई अरबों डॉलर की एक परियोजना फिलहाल ज्यादा चर्चित नहीं है लेकिन इसके परिणाम जिंदगी को देखने के हमारे नजरिए को बदलकर रख सकते हैं। इसके अलावा ये परिणाम कुछ बेहद मूलभूत सवालों के जवाब ढूंढने में भी मदद कर सकते हैं। शिकागो स्थित प्रतिष्ठित फर्मी नेशनल एक्सीलेरेटर लैबोरेटरी के निदेशक और मौलिक कण ‘टॉप क्वार्क’ की खोज का नेतृत्व करने वाले नाइगेल लॉकयेर बताते हैं कि किस तरह से उनका संस्थान और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) (मुंबई) ने ऐसा नया एक्सीलेरेटर बनाने की शुरूआत की है, जो एक दिन डिजाइनर इंसान बनाने में सफल हो सकता है। यह ऐक्सीलेरेटर स्वच्छ उर्जा उत्पादन के लिए भारत में थोरियम के अपार भंडारों के दोहन में भी मददगार हो सकता है।

नाइगेल के साक्षात्कार के कुछ अंश इस प्रकार हैं-
प्रश्न- अभी तक हम ब्रह्मांड को कितना समझ पाए हैं?
उत्तर- ब्रह्मांड को समझने की बात करें, तो अभी हमने इसकी सतह को ही कुरेदना शुरू किया है। भविष्य में विज्ञान के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवधि अगले 20-30 साल की है, जब बड़ी-बड़ी खोजें होने की संभावना है। इस समय, भारत, खासकर मुंबई स्थित बीएआरसी, एक नए किस्म के एक्सीलेरेटर को बनाने के लिए अमेरिका के साथ सहयोग कर रहा है। यह एक्सीलेरेटर सुपर-कंडक्टिंग (अति चालन) की प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करता है। इस नए एक्सीलेरेटर के कई इस्तेमाल होंगे। इनमें से एक है ‘मुक्त इलेक्ट्रॉन लेजर’। यह आपको बहुत छोटी अवधि में कोमल पदाथरें के व्यवहार का निरीक्षण करने का अवसर देता है। यह छोटी अवधि ‘फेम्टो सेकेंडों’ में यानी एक सेकेंड के 10 खरबवें हिस्से का 10 खरबवां हिस्से के बराबर हो सकती है। इस अवधि में आप किसी कोशिका के भीतर प्रोटीन को देख सकते हैं और इसकी संरचना का पता लगा सकते हैं।

प्रश्न- क्या इसका अर्थ जीवन को समझ लेना है?
उत्तर- हां, जीवन को समझना, कोशिका को समझना, जिंदगी के निर्माण घटक माने जाने वाले एंजाइमों को समझना, शरीर के अंदर होने वाली अभिक्रियाओं को समझना सबकुछ समझना। यह एक बड़े अभियान की शुरूआत है। इस अभियान के तहत शरीर को विस्तार से समझने के लिए सैंकड़ों वर्षों तक प्रयास जारी रह सकते हैं। तब जाकर आप जानेंगे कि वैज्ञानिक इसके क्या साथ करने वाले हैं?

प्रश्न- यह समझ हमें कहां तक लेकर जाएगी?
उत्तर- इस नई जानकारी का वे इस्तेमाल करने वाले हैं। जैसे आज हम पौधों की इंजीनियरिंग करते हैं, इसकी मदद से हम नए पदाथरें की इंजीनियरिंग करेंगे। यह जानकारी जिंदगी को बदलकर रख देगी। यह उर्जा प्राप्त करने के तरीके, शरीर के भीतर देखने के और जिंदगी को देखने के हमारे तरीके को बदलकर रख देंगे। हम शरीर की भी इंजीनियरिंग शुरू करेंगे। विज्ञान का भविष्य हमारी जिंदगियों को बेहतर बनाने में होगा और एक बड़ा बदलाव लाने के लिए हम भारत के साथ आज संयुक्त रूप से विकसित की जा रही प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करेंगे।

प्रश्न- क्या इसमें भविष्य में इंसानों की इंजीनियरिंग मतलब डिजाइनर इंसान भी शामिल होंगे?
उत्तर- हां, भविष्य में निश्चित तौर पर डिजाइनर कपड़े और डिजाइनर इंसान होने वाले हैं।

प्रश्न- क्या आपको लगता है कि भारतीय और अमेरिकी वैज्ञानिक एकसाथ मिलकर बेहतर इंसान बना सकते हैं?
उत्तर- भारतीय वैज्ञानिक और भारतीय कारोबारी पहले ही इस रास्ते पर चल रहे हैं और यह भविष्य में जारी रहने वाला है। युवा भारतीय इन संभावनाओं को लेकर उत्साहित होंगे।

प्रश्न- भारत और अमेरिका ऐसी कौन सी परियोजना शुरू कर रहे हैं, जो भारत के व्यापक थोरियम भंडारों के सदुपयोग को संभव बनाएगी?
उत्तर- यह परियोजना एक्सीलेरेटर प्रौद्योगिकी परियोजना है। यह भारत के परमाणु उर्जा विभाग और फर्मी लैब द्वारा संचालित होगी। वे आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से कुछ एक्सीलेरेटर डिजाइन कर रहे हैं, जो पदार्थ विज्ञान और उर्जा उत्पादन पर प्रभाव डालेगा।

प्रश्न- बीएआरसी और फर्मी लैब जिस एक्सीलेरेटर के निर्माण और फिर थोरियम से उर्जा प्राप्त करने की कोशिश करेंगे, क्या दुनिया में कहीं और उसका प्रयोग किया गया है?
उत्तर- यह अमेरिका और भारत की साझेदारी है। इस साझेदारी में भारतीय पक्ष का लक्ष्य थोरियम उर्जा का उपयोग कर पाने का सामथ्र्य विकसित करना है। इसमें अमेरिकी लक्ष्य अलग है। उसका लक्ष्य इन एक्सीलेरेटर्स के इस्तेमाल से पदार्थ के मौलिक कणों की मूल भौतिकी को समझना है। इस एक्सीलेरेटर में आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल होगा और कुछ अतिरिक्त प्रौद्योगिकियों के विकास की भी जरूरत होगी। ऐसे में अनुसंधान एवं विकास भारत को एक नए क्षेत्र में लेकर जाएगा, जिसका नाम है ‘एक्सीलेरेटर ड्रिवन सिस्टम्स’ (एडीएस)। भविष्य में अत्याधुनिक एक्सीलेरेटर प्रयोग होंगे, जो अतिचालक चुंबकों की मदद से उर्जा उत्पादन करेंगे।

प्रश्न- जिन एडीएस मशीनों की आप बात कर रहे हैं, मैंने सुना है उनके कई लाभ हैं। जैसे उन्हें ऑन और ऑफ किया जा सकता है और इनमें फुकुशिमा जैसी परमाणु दुर्घटना नहीं हो सकती।
उत्तर- निश्चित तौर पर ये बेहद सुरक्षित हैं क्योंकि जब आप एक्सीलेरेटर को बंद कर देते हैं, तो सबकुछ बंद हो जाता है। यह इसका मूल विचार है। थोरियम एक ऐसा तत्व है, जो भारत में प्रचुर मात्रा में है। और आप एक्सीलेरेटर के इस्तेमाल से थोरियम में न्यूट्रॉन डाल सकते हैं ताकि इससे उर्जा और बिजली पैदा हो जाए।

प्रश्न- क्या भारत और अमेरिका उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं?
उत्तर- भारत और अमेरिका दो बड़े लोकतंत्र हैं और यहां शिक्षा, विशेषकर विज्ञान शिक्षा में व्यापक दिलचस्पी है और हर चीज की शुरूआत मूलभूत विज्ञान से ही होती है। दोनों देशों में विज्ञान के प्रति युवाओं के आकषर्ण को देखकर यह साबित होता है कि भविष्य की ज्ञान की अर्थव्यवस्था है। यह प्राकृतिक संसाधनों के बारे में बहुत कम और बुद्धिमत्ता के बारे में ज्यादा होगी।

प्रश्न- क्या भारत और अमेरिका में ऐसी पूरक प्रतिभाएं हैं, जो भविष्य में फल-फूल सकती हैं?
उत्तर- मुझे लगता है कि ऐसा संभव है। यदि आप आकलन करें तो अमेरिकी लोग बेसबॉल खेलते हैं और भारतीय क्रिकेट खेलते हैं। भारत से बड़े-बड़े भौतिकशास्त्री हुए हैं और अमेरिका में बड़े भौतिकशास्त्री हैं। भारत के भौतिकशास्त्रियों में मेरे पसंदीदा डॉ एस एन बोस हैं। बोसोन कण का नाम उन्हीं के नाम पर है। दोनों ही देशों की संस्कृतियां काफी मेल खाती हैं। अमेरिकी कॉफी पीते हैं, भारतीय चाय पीते हैं। ये मेरे हिसाब से पूरक चीजें हैं। हम अपनी चाय भारत से लेते हैं और शायद स्टारबक्स भारत में फले-फूलेगा। जैसा कि आप जानते हैं, अमेरिका में बहुत बड़े निगम भारतीयों द्वारा चलाए जाते हैं और अमेरिका में भारत की संस्कृति का असर व्यापक है। इसके अलावा अमेरिकी लोग भारतीय भोजन को पसंद करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस में अपने भाषण के बाद अमेरिका में एक गहरी छाप छोड़ी और राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ उनके अच्छे रिश्ते भारत और अमेरिका को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी करीब लाएंगे।

प्रश्न- तो क्या भारतीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों के लिए भविष्य उज्ज्वल है?
उत्तर- इस बात में कोई संदेह नहीं है, इनके लिए भविष्य बेहद उज्ज्वल है।

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