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स्वच्छता मिशन के बाद गरीबों के आवास मामले में भी पिछड़ा राजस्थान

केंद्र सरकार से जुड़ी कई अहम योजनाओं में राजस्थान खासा फिसड्डी साबित हो रहा है। स्वच्छ मिशन के बाद अब शहरी क्षेत्रों में गरीबों को सस्ते आवास योजना में भी प्रदेश काफी पिछड़ गया है।

Author जयपुर | July 31, 2016 1:04 AM
ईपीएफओ अपने सदस्यों के लिये 2019 से पहले आवास योजना शुरू करेगी। (Representative Image)

केंद्र सरकार से जुड़ी कई अहम योजनाओं में राजस्थान खासा फिसड्डी साबित हो रहा है। स्वच्छ मिशन के बाद अब शहरी क्षेत्रों में गरीबों को सस्ते आवास योजना में भी प्रदेश काफी पिछड़ गया है। केंद्र और राज्य में एक ही दल भाजपा की सरकार होने के बावजूद आम जनता को योजनाओं का लाभ नहीं मिलने से सरकार की कार्यशैली पर सवालिया निशान उठने लगे हैं।

राज्य में भाजपा सरकार अपनी ही केंद्र सरकार की योजनाओं पर बहुत ही धीमी गति से काम कर रही है। इससे केंद्र सरकार की खासी किरकिरी हो रही है। गरीबों के आवास वाली योजना में तो चालू वित्तीय वर्ष के शुरुआती चार महीने में प्रदेश की एक भी योजना को मंजूरी नहीं मिल पाई है। इसके लिए प्रदेश सरकार की लचर प्रशासनिक व्यवस्था ही सामने आ रही है। राज्य के स्तर पर केंद्र प्रवर्तित योजनाओं के लिए किसी भी तरह की निगरानी व्यवस्था नहीं है। इसके कारण ही प्रदेश के कई प्रस्तावों को केंद्र से मंजूरी नहीं मिल पा रही है। शहरी गरीबों के लिए आवास के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे चल रहा है। केंद्र ने महाराष्ट्र के लिए 3600 करोड़ रुपए की योजना मंजूर की है जिससे करीब एक लाख आवासों का निर्माण होगा।

राजस्थान में मुख्यमंत्री जन आवास योजना के तहत नगरीय इलाकों में अफोरडेबल आवासों का निर्माण किया जा रहा है। यह काम अलग अलग शहरों विकास प्राधिकरण और स्थानीय निकाय करवा रहे है। केंद्र ने पिछले वर्ष प्रदेश के लिए 23 योजनाएं स्वीकृत, जिनमें करीब 22 हजार मकानों का निर्माण होना है। इसके बाद राजस्थान की तरफ से केंद्र को हाउसिंग फार आल के तहत कोई स्कीम नहीं भेजी गई। ऐसे में राजस्थान भाजपा शासित कई प्रदेशों से पिछड गया।

इस हालात पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी राज्य सरकार की कार्यशैली पर नाराजगी जताई है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू हाल में प्रदेश से ही राज्यसभा के सांसद बने हैं। उन्होंने अब राजस्थान के मामले को देखना शुरू किया है। उसके बाद ही गरीबों के आवास मामले में प्रदेश की कमजोरी उजागर हुई है। नायडू ने अपने ही दल की प्रदेश सरकार के अफसरों से पिछड़ने पर नाराजगी भी जताई थी। नौकरशाही ने इस पर सारा ठीकरा राजनीतिक तंत्र पर ही फोड़ा।

केंद्र की नाराजगी और दबावों के बाद राज्य सरकार के स्तर पर हाल में नगरीय विकास विभाग ने तीन योजनाएं मंजूर कर केंद्र को भेजी पर उसे केंद्र ने नाकाफी बताते हुए नामंजूर कर दिया। विभाग को अब छह शहरों की योजनाएं मिली है, इन्हें राज्य स्तर पर मंजूर कर केंद्र को प्रस्ताव भेजने की तैयारी की गई है। केंद्रीय मंत्रालय ने हाल ही अपनी बैठक में अन्य राज्यों के प्रस्तावों को मंजूरी प्रदान की है पर राजस्थान के मामलें नहीं होने से उन पर कोई विचार ही नहीं किया गया।

केंद्र की साझेदारी से चलने वाली इस योजना में सस्ता मकान और लाभार्थी के नेतृत्व में निर्माण के लिए डेढ़ लाख रुपए प्रति मकान और दूसरे तौर पर एक लाख रुपए की सहायता दी जाती है। इसके साथ ही अधूरे मकान को पूरा करने के तहत अभी राज्य की तरफ से एक भी प्रस्ताव केंद्र सरकार को नहीं भेजा गया है। इससे इसके तहत भी राज्य को केंद्र से कोई मदद नहीं मिल पाई है।

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