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घटना किसी भी जगह हो, पुलिस कार्रवाई तुरंत शुरू कराने के लिए अचूक विकल्प है Zero FIR

यह बात भले ही मजाक लगे लेकिन समय के साथ कानून के हाथ और ज्यादा लंबे हुए हैं। एक वक्त था जब किसी पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र में ही घटे अपराधों की एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट या प्राथमिकी) दर्ज की जा सकती थी, लेकिन आज ऐसा नहीं है। अपराध भले ही किसी भी थाने के अधिकार क्षेत्र में घटा हो, उसकी एफआईआर दर्ज की जा सकती है।

यह बात भले ही मजाक लगे लेकिन समय के साथ कानून के हाथ और ज्यादा लंबे हुए हैं। एक वक्त था जब किसी पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र में ही घटे अपराधों की एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट या प्राथमिकी) दर्ज की जा सकती थी, लेकिन आज ऐसा नहीं है। अपराध भले ही किसी भी थाने के अधिकार क्षेत्र में घटा हो, उसकी एफआईआर दर्ज की जा सकती है। ऐसी स्थिति में दर्ज की जाने वाली एफआईआर को जीरो एफआईआर कहते हैं। जीरो एफआईआर दर्ज करने से कोई भी पुलिस थाना मना नहीं कर सकता है। एफआईआर हो या जीरो एफआईआर, यह तभी दर्ज की जा सकती है जब मामला इसके मापदंडों के मुताबिक हो, यानी कब और कैसे दर्ज की जाती है एफआईआर, यह जान लेना पहले जरूरी है। पुलिस दरअसल संज्ञेय अपराधों में एफआईआर दर्ज करती है।

अपराध दो तरीके के होते हैं- संज्ञेय और असंज्ञेय। संज्ञेय अपराध जैसे की हत्या, बलात्कार, जान से मारने की कोशिश करने जैसे संगीन अपराधों को कहते हैं जबकि असंज्ञेय अपराधों में मामूली मारपीट जैसे घटनाएं गिनी जाती है। असंज्ञेय अपराधों में एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है, ऐसे में पुलिस साधारण शिकायत दर्ज कर उसे मजिस्ट्रेट के पास भेजती है और फिर आरोपी के खिलाफ समन जारी होता है। दंड प्रकिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 154 के तहत एफआईआर का प्रावधान आता है लेकिन जीरो एफआईआर का प्रावधान दिसंबर 2012 के निर्भया गैंगरेप मामले के बाद कानून में जोड़ा गया। निर्भया मामले के बाद नया आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 आया। जस्टिस वर्मा कमेटी ने इसकी सिफारिश की थी। देश भर में निर्भया मामले पर मचे आक्रोश को देखते हुए इस प्रावधान की आवश्यकता महसूस की गई थी।

ऐसे दर्ज होती है जीरो एफआईआर: घटना किसी भी जिले के किसी भी स्थान पर हुई हो, अगर वह संज्ञेय अपराधों में आती है तो किसी भी पुलिस थाने में जीरो एफआईआर दर्ज कराएं। चूंकि यह एफआईआर वारदात वाली जगह वाले थाने के अधिकार क्षेत्र में दर्ज नहीं होती है इसलिए इसमें अपराध संख्या नहीं लिखी जाती है। बाद में पुलिस संबंधित थाने को जीरो एफआईआर स्थानांतरित कर देती है और उसमें अपराध संख्या जोड़ दी जाती है। इसका फायदा यह है कि जीरो एफआईआर दर्ज कराने से तत्काल प्रभाव से पुलिसिया कार्रवाई शुरू होने और मौका-ए-वारदात से सुबूत वगैरह इकट्ठा करने में सफलता मिलती है। कई बार एफआईआर में देरी के कारण अपराधी सबूत मिटाने में कामयाब देखे गए हैं। जीरो एफआईआर हो या एफआईआर, शिकायतकर्ता को यह अधिकार होता है कि वह उसे पढ़कर या सुन लेने के बाद हस्ताक्षर करे।

पुलिस मना करे तो क्या करें? कई बार पुलिस के द्वारा एफआईआर दर्ज न करने की खबरें सुर्खियां बन चुकी हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है तो मायूस न हों। जीरो एफआईआर न लिखे जाने पर सीधे पुलिस अधिक्षक (एसपी) को शिकायत करें। एसपी को अधिकार होता है कि वह खुद मामले में चाहे तो जांच कर सकते हैं या किसी दूसरे अधिकारी को इसके लिए निर्देश दे सकते हैं। शीर्ष अदालत यह साफ कर चुकी है कि पुलिस अधिकारी अगर एफआईआर या जीरो एफआईआर लिखने से मना करे तो उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। आखिरी उपाय यह है कि शिकायतकर्ता अपनी अर्जी लेकर मानवाधिकार आयोग का रुख कर सकता है।

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