Arvind Kejriwal News: आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को हटाने की याचिका के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में खुद उपस्थित हुए। सुनवाई के दौरान उन्होंने अपनी याचिका के समर्थन में 10 आधार प्रस्तुत किए और तर्क दिया कि उनके मन में यह वास्तविक गंभीर और उचित आशंका है कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी।

अरविंद केजरीवाल ने दलील देते हुए कहा कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा आरएसएस से जुड़ी संस्था के कार्यक्रमों में जाती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वकीलों की एक विंग है, जिसका नाम है अधिवक्ता परिषद। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा अधिवक्ता परिषद की कम से कम 4 मीटिंग्स में
अलग अलग समय पर हिस्सा ले चुकी हैं। इस मामले के जो आरोपी राजनीति से जुड़े हैं, वे सभी RSS की विचारधारा के मुखर विरोधी हैं, इसलिए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा, जो RSS के कार्यक्रमों में हिस्सा लेती हैं, क्या वो इस केस में न्याय कर पाएंगी?

केजरीवाल ने कहा कि 9 मार्च की हाईकोर्ट में सुनवाई में 23 में से कोई भी आरोपी कोर्ट में मौजूद नहीं था। कोर्ट में केवल CBI मौजूद थी। पहली सुनवाई में ही बिना किसी आरोपी को सुने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आदेश पारित कर दिया कि प्रथम दृष्टया सेशन कोर्ट का ऑर्डर गलत प्रतीत होता है। क्यों? कैसे? ऑर्डर का कौन सा हिस्सा गलत प्रतीत होता है? ये कुछ नहीं लिखा। बिना दूसरी साइड को सुने प्रथम दृष्टया ये राय जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कैसे बनाई? उस वक्त उनके सामने तो केवल सीबीआई की अपील थी और निचली अदालत का आदेश था।

केजरीवाल ने कहा कि अभी तो उन्होंने सेशन कोर्ट के सारे रिकार्ड भी नहीं मंगवाए थे। अभी तो दूसरी साइड ने अपना पक्ष भी नहीं रखा था।
इसके बावजूद उन्हें प्रथम दृष्टया सेशन कोर्ट का आदेश गलत कैसे लगा और ऐसी राय कैसे रखी? ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है। इससे प्रतीत होता है कि शायद जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा इस मामले में पहले से अपना मन बना चुकी हैं।

ईडी ने कोई केस भी फाइल नहीं किया था सेशन कोर्ट में ED के केस पर स्टे लगा दिया

दिल्ली के पूर्व सीएम ने दलील दी कि 9 मार्च को ही अपने आदेश में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इसी तथाकथित शराब घोटाले से संबंधित सेशन कोर्ट में चल रही ED की कार्रवाई पर भी रोक लगा दी। केजरीवाल ने कहा कि हम आपको बता दें कि कानूनन किसी भी मामले में पहले कोई अपराध होता है, जिसकी सीबीआई या पुलिस FIR करती है और उस अपराध में जो गलत पैसा इकट्ठा किया जाता है जैसे रिश्वत का पैसा इत्यादि, उस पैसे को किस तरह से मनी लॉन्ड्रिंग की गई, उसकी जांच फिर ईडी करती है। तो अगर CBI या पुलिस के केस में अपराध ही साबित नहीं हो पाए तो ED का केस अपने आप बंद हो जाता है।

केजरीवाल ने आगे दलील दी की कि इस केस में सेशन कोर्ट ने सीबीआई के केस को खत्म कर दिया था तो ईडी का केस अगली एक तारीख में खत्म हो जाता। लेकिन जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सेशन कोर्ट को ED का केस खत्म करने पे रोक लगा दी। सबसे बड़ी हैरानी की बात ये है कि केंद्र सरकार, ED या CBI ने ऐसा करने के लिए उनके सामने कोई प्रार्थना भी नहीं की थी। बिना प्रार्थना के अपनी तरफ से जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने रोक कैसे लगा दी? ये सोचने वाली बात है।

CBI के जांच अधिकारी ने कोर्ट में केस भी नहीं फाइल किया था- केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सीबीआई का केस इतना ज्यादा फर्जी था कि सेशन कोर्ट के जज ने सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। सेशन कोर्ट के जज के आदेश में लिखा है कि इस पूरे मामले में पहले तय कर लिया गया था कि कैसे और किसको फंसाना है और उसके बाद वो साबित करने के लिए सबूत बनाए गए। तो ये जांच नहीं थी ये एक पूर्व निर्धारित षड्यंत्र था। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने 9 तारीख के आदेश में CBI के जांच अधिकारी के खिलाफ सेशन कोट द्वारा पारित आदेश पर रोक लगा दी। ये भी बड़े अचंभे की बात है। क्योंकि सीबीआई के उस अधिकारी ने अभी तक कोर्ट में अपने खिलाफ पारित आदेश को रुकवाने के लिए कोई आवेदन नहीं किया।

आरोपियों को जवाब दाखिल करने के लिए सिर्फ एक हफ्ते का टाइम दिया

केजरीवाल ने दलील दी कि 9 मार्च को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सभी 23 आरोपियों को आदेश दिया है कि इस मामले में अपना जवाब एक हफ्ते में दाखिल करें। 600 पेज के आदेश और CBI की अपील के जवाब में इतने कम समय में रिप्लाई फाइल करना लगभग नामुमकिन है। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने इतना कम समय क्यों दिया? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्योंकि उनके सामने अन्य मामलों में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा कितना समय देती हैं, इस पर एक नजर डालनी चाहिए। उनके सामने अभी तक जितने मामले आए, हर मामले में वो तीन से लेकर सात महीनों तक की तारीख देती हैं।

केजरीवाल ने तर्क दिया कि जब इस मामले के कई आरोपी जेल में थे तो उनकी बेल एप्लिकेशन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने लगी थी। ऐसे पांच लोगों की बेल एप्लिकेशन में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पिछले साल आदेश पारित किए थे। अक्सर बेल एप्लिकेशन में केस की मेरिट्स पर टिप्पणी नहीं की जाती है। अपराध हुआ या नहीं हुआ, यह बात ट्रायल होने पर निचली अदालत तय करती है। बेल एप्लिकेशन में तो जज को केवल इतना बताना होता है कि बेल दी जाएगी या नहीं दी जाएगी।

केजरीवाल ने कहा कि बेल एप्लिकेशन की स्टेज पर किसी को भी दोषी करार नहीं किया जाता। यह सामान्य कानूनी प्रक्रिया है। इसके बावजूद जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पांचों मामलों में बेल की सुनवाई के वक्त ही उन पांचों आरोपियों की बेल खारिज करते हुए बड़े कठोर शब्दों में आदेश पारित किए कि ये सभी लोग उन अपराधों के दोषी हैं। इससे साफ जाहिर है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा शुरू सेही इस मामले में अपनी पूर्व-निर्धारित राय रखती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ सख्त टिप्पणी की- केजरीवाल

दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने दलील देते हुए कहा कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के ये सभी बेल ऑर्डर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर
दिए। उन्होंने ना केवल उनके ऑर्डर खारिज करके सभी आरोपियों को बेल दी, बल्कि कुछ मामलों में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ सख्त टिप्पणी भी है।

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा द्वारा पारित किए गए अभी तक के सभी आदेश दिखाते हैं कि वे CBI और ED की सभी दलीलें और मांगे मानती हैं। यहां तक कि जो भी वो मांगते हैं, उन से कहीं ज्यादा बढ़ चढ़ कर आदेश देती हैं। तुषार मेहता कोर्ट में मौखिक रूप से भी यदि कुछ बोल्ड दें तो तुरंत उसका आदेश पारित कर दिया जाता है। ऐसे में उनसे न्याय कैसे मिलेगा।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चें केंद्र के सरकारी वकील- केजरीवाल

केजरीवाल ने कहा कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के सरकारी वकील हैं और तुषार मेहता के अंडर में काम करते हैं। ऐसे में उनसे निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

केजरीवाल ने कहा कि अभी कुछ दिन पहले एक साक्षात्कार में गृह मंत्री अमित शाह ने बयान दिया है कि अरविंद केजरीवाल को हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा। उनका सीधे-सीधे इशारा है कि अरविंद केजरीवाल हाईकोर्ट में हारेंगे और हाईकोर्ट का
आदेश केजरीवाल के खिलाफ आएगा। गृहमंत्री ने ये बयान कैसे दिया?

आबकारी घोटाला क्या है?

आम आदमी पार्टी का कहना है कि बीजेपी के इशारे पर जांच एजेंसियों ने उसके नेताओं को फंसाया है और यह पूरा मामला फर्जी है। जबकि बीजेपी का कहना है कि केजरीवाल और अन्य आरोपी नेताओं ने घोटाला किया है और इसीलिए उन्हें लंबे वक्त तक जेल में रहना पड़ा है। ऐसे में समझना और जानना जरूरी है कि वास्तव में दिल्ली का यह कथित आबकारी घोटाला क्या है? आइए इसे समझते हैं। पढ़ें पूरी खबर…