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याकूब मेमन की अब एक और चाल

मुंबई में 1993 में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों में सजा ए मौत पाने वाले एकमात्र दोषी याकूब अब्दुल रजाक मेनन ने उसे 30 जुलाई को दी जाने वाली सजा की तामील..

शीर्ष अदालत ने 2 जून 2014 को मेमन की मौत की सजा के अनुपालन पर रोक लगा दी थी। (एक्सप्रेस आर्काइव)

मुंबई में 1993 में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों में सजा-ए-मौत पाने वाले एकमात्र दोषी याकूब अब्दुल रजाक मेमन ने खुद को 30 जुलाई को दी जाने वाली सजा की तामील पर रोक के लिए गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मेमन ने याचिका में कहा है कि अभी सभी कानूनी रास्ते बंद नहीं हुए हैं और उसने महाराष्ट्र के राज्यपाल को भी दया याचिका भेजी है। मेमन ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गत मंगलवार को उसकी उपचारात्मक याचिका खारिज कर दिए जाने के तत्काल बाद राज्यपाल को दया याचिका भेज दी थी।

प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ ने 21 जुलाई को मेमन की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि इसमें बताए गए आधार उपचारात्मक याचिका पर फैसले के लिए शीर्ष अदालत द्वारा 2002 में प्रतिपादित सिद्धांतों के दायरे में नहीं आते हैं। मेमन ने अपनी याचिका में कहा था कि वे 1996 से सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त हैं और करीब 20 साल से जेल की सलाखों के पीछे है। उसने मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने का अनुरोध करते हुए कहा था कि एक दोषी को एक ही अपराध के लिए उम्रकैद के साथ ही मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता।

शीर्ष अदालत ने इस साल नौ अप्रैल को मौत की सजा के फैसले पर पुनर्विचार के लिए दायर मेमन की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने 21 मार्च 2013 को उसकी मौत की सजा बरकरार रखी थी। संविधान पीठ की एक व्यवस्था के आलोक में शीर्ष अदालत के तीन जजों के पीठ ने मेमन की पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की थी। संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि पुनर्विचार याचिकाओं पर चैंबर में सुनवाई की परंपरा से हटकर मौत की सजा के मामलों में खुली अदालत में सुनवाई की जानी चाहिए।

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